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विहित अवधि के अन्दर कर वाहन अधिनियम: 1988 (अधिनियम 59, बाहन के देय कर का भुगतान विहित अवधि के माह 3 कर T का Ay e गी किया गा e के नम g साधिका मे था भाग 2० को v दि ऊची श सं क्षुब्ध कोई व्यक्ति धारा 22 को उपधारा ) विहित शुल्क भुगतान कर विहित प्राधिकारी के रिंग समय के अन्दर और निहित रीति से इसके (2) अपील को सुनवाई एवं निस्तार विहित तरीके से ' ~ - धानों किया जायगा। L L (3) धारा 27 के प्रावधानों के अध्यधीन ऐसे ः में इस पर विवाद नहीं उठाया जायेगा। ऐसे अपील का निर्णय अन्तिम होगा और किसी न्यायालय (4) अपीलीय प्राधिकारी अपने स्वविवेक पर i या धारा 22 के अधीन वाहन जप्ती अथवा मुक्त क्ति से उबर रा हर पारित देश, आर मामले में यदि वह यायेगा कि प्रश्नगत बिना अधिकारिता के या अवैध है तो वह जैसा उचित व . 2@}1\"?&1017.- अधिनियम की धारा 26 के अधीन अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश सें क्षुब्ध कोई व्यक्ति आदेश की तिथि से विहित समय के अन्दर और -विहित शुल्क का शुगतान कर विहित तरीके से विहित प्राधिकारी के समक्ष पुनरीक्षण दायर कर सकेगा जिसमें इस आधार पर ऐसे आदेश % पुनरीक्षण हेतु प्रार्थना कर सकेगा कि आश्षेपित निर्णय विधि-सम्मत नहीं है तथा उक्त पुनरीक्षण प्राधिकारी पुनरीक्षण में ऐसा आदेश पारित करेगा जैसा कि वह उचित समझे; परन्तु यह कि पुनरीक्षण प्राधिकारी इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई हानिकारक आदेश उसे सुनवाई हेतु समुचित अवसर दिये बिना पारित नहीं करेगा। "28. शास्तिः (1) ( (क) यदि कोई व्यक्ति किसी मोटर वाहन को कर का भुगतान किये बिना उपयोग करता है या में लोने के लिये रखता है, तो गहरा मना का भागी होगा जो प्रथम अपराध की दशा में वाहन के वार्षिक कर की रकम के दुगुना और दस या बाद के प्रत्येक अपराध की दशा तिगुना होगा। .. में 'परिवचन दाखिल ! गले अनविक स जान बुझकर मोटर वाहन के संबंध में कोई आोषणा सत्र झठ कहा गया हैं तो करता है, जिसमें इस अधिनियम कौ अनुसार अपेक्षित विवरण असर. दि कर इुगना से अनधिक दोष सिद्ध होने पर वैसा व्यक्ति प्रथम अपराध की दशा में उस वाहन के oy o एवं बाद के प्रत्येक अपराध के लिए तिगुनी राशि के अनधिक तक जानते हुए या ऐसी जानकारी के (2) जो भी. व्यक्ति कर भुगतान के लिये स्वयं दायी नहीं है, यह जान हों किया गया है, ऐसे विश्वास ने का कारण होते हुए भी कि संबंधित वाहन को कर के लिए 300 % और वाहन को चलता है तो इसके लिए दोष सिद्ध होने पर रन का भागी होगा। ही करता हैं के अपराध के लिए 500 रु० तक के आकर प्रतीक 'का प्रदर्शन नहीं करता , वह 3) जो भी व्यक्ति धारा 20 के अन्तगर्त जुर्माना का मांगी होगा। कर इस अप ये के oy अधिकतम 500 रुपये तक गे पी स्विच के आधार पर सित दी ता दाद होगे पर विद भी व्यक्ति धारा 17 या 18 के परिवचन तथ्य का हुर्यप्रदश विमुक्ति की दावा राशि को 3 के लिये दावा करे और यदि उक्त it AR - वैसा व्यक्ति प्रथम अपराध की दशा में अधिकतम जुर्म के चौगुना तक हों सकता वि पता बराबर एवं बाद के प्रत्येक अपराध के लिये — ZOOG.W जोड़ा Al Scanned by CamScanner 0] बिहार मोटरवाहन करारोपण अधिनियम, 1994 Tt 25.3, - उल्लंघन करता है वह दोष सिद्ध होने पर 6 माह तक ड o का जुर्माना या दोनों से दंड का 'भागी होगा तथा वाहन के साधारण कारावास या 1000 रुपये तक, का o के भी अधिनियम या इसके अधीन निर्मित नियमावली प्रावधानों का उल्लंघन के लिये वा उप-धाराओं में दण्ड विहित नहीं किया गया है, तो प्रथा नि अपराध की दशा में 500 रुपये तक मुर्ववरी प्रत्येक अपराध के लिए 1,000 रुपये तक की उबम A रजिस्ट्रीकत वाहन, बिना विहित कर भुगतान किये अथवा बिना 4y के चदि O e जावे जायेंगे, तो भुगतेय | एवं फीस को अतिरिक्त, उनके मर ा (i) यदि कोई व्यक्ति गलत या झूठा घोषणापत्र समर्पित करता है, तो दोष सिद्ध होने पर एक के का भागी होगा। सार | यू कोई व्यस्तिजिहिग रोति से कर प्रतीक का प्रदर्शन नहीं करता है, तो दोष सिद्ध हक चार सौ रुपये तक दण्ड का | . व्यक्ति अपना वर्तमान पता में परिवर्त्त की सूचना नहीं देता है, तो दोष सिद्ध पर ही के दण्ड का भागी होगा। हो व्यक्ति मोटर वाहन कर की जाँच के लिए रोकने के आदेश पर वाहन को कर नहीं पद दी कल सिड कल पर वह एक हजार रुपये तक के अर्थदण्ड का भागी होगा। री यदि कोई व्यक्ति किसी पदाधिकारी को उसके कर्त्तव्य निर्वहन में बाधा डालता है, तो वह एक हजार रुपये तक के दण्ड का भागी होगा। के अधीन देव किये बिना मोटर vi) यदि कोई व्यक्ति उस अधिनियम के अधीन देय कर का भुगतान 1 मोटर वाहन का परिचा् सता है अथवा गलत तथा जाली टैक्स-टोकन के आधार पर परिचालन करने के लिए अनुमति देता है, तो वह दो हजार रुपये तक के दण्ड का भागी होगा। 29, अपराध का शमन।-यदि कोई व्यक्ति धारा 28 की उप-धारा (5) से भिन्न धारा 28 के अन्तर्गत अभियुक्त है तो उसके लिये यह विधि-सम्मत होगा कि वह बकाया कर तथा अर्थ-दंड की राशि, दि कोई हो, के साथ ऐसी गशि जो विहित की जाय, को विहिंत पाथकारी के गास ऐसे अपराध करार , अधिकारिता का वर्जन।- इस अधिनियम या इसके अधीन निर्मित्त नियमावली के उपबंधों - से घिनन किसी व्यक्ति के कर भुगतान के दायित्व को किसी अधिकारी द्वारा किसी प्रकार आश्षेपित या अवधारित नहीं किया जायेगा। किसी भी सरकारी पदाधिकारी के विरुद्ध इस अधिनियम या इसके अधीन निर्पिह्ठ नियमावली के अधीन सद्भावपूर्वक किये जाने के .लिये आशयित किसी कार्य के संबंध में कोई अधियोजन, अन्य कार्यवाही नहीं ः 31: नियम घने की शीक्त ला सी तन अधिनियम के प्रावधानों B Mnflmm, ही प्रावधान के कार्यालसन को लिये, नियम बना सकेगी। व कर, इस नियम . ) 1 ()filflnmm पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रभाव डाले बिना ऐसे पत्र, उसमें से फिसा निक्य क मकतइसर,पतिकल जा सकेंगे, यथा- जाने वाले परिवचन के प्रपत्र, तथा उसमें वर्णित विशिष्ट होने वाले कागजात एवं सबूत तथा उसे दाखिल Scanned by CamScanner बिहार मोटरवाहन आरर्पुगी 1 करारोपण अधिनियम, 1994 (v) करारोपणं पदाधिकारी के शक्तियों एवं (vi) कर वापसी, कटौती या माफी के दबा को विहित करना; विनियमित करना; TR करने एवं उसके निष्पादन की (vii) धारा 21 'एवं 22 के अन्तर्गत वाहनों की जप्ती, निरोध गति को (ला) अपील या पुनरीक्षण प्रस्तुत करने की रीति, समर - नीलामी, बिक्री एवं सुनवाई ई और निष्पादन को विहित करना; , समय-सीमा तथा (ix) कर-प्रतीक की दूसरी प्रति एवं करारोपण पदाधिकारी ..... निर्गमन के लिऐ देय शुल्क; 00 करारोपण से संबंधित मामलों के निष्पादन की रीति विहित करना; () धारा 9 के अन्तर्गत अनापत्ति प्रमाण-पत्र के प्रपत्र एवं निर्गमन कौ रीति (xii) अन्य मामले जो विहित किये जायें या किये जाने योग्य हों। (3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाये जाने के तुरंत बाद राज्य विधान मंडल को प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो कुल चौदह दिनों की अवधि के लिए रखा जायेगा जो एक ही सत्र में हो अथवा एक से अधिक सत्र में हो, जिस सत्र में इसे प्रस्तुत किया जाय उस सत्र में या उसके तुरंत बाद वाले सत्र में दोनों सदन नियम में जो उपान्तरण करने को सहमत हो अथवा यदि इस बात पर सहमत हो कि नियम बनाया ही नहीं जाना चाहिये तो उसके बाद वह नियम यथास्थिति, या तो रूपान्तरित रूप में प्रभावी होगा या प्रभावी नहीं होगा, किन्तु नियम के ऐसे रूपान्तरण या वातिल होने से उस नियम के अधीन पहले किये गये किसी कार्य की मान्यता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।