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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 41034 of 2026 Court No. - 75 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय सुरक्षा संिहता के अंतगर्त यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 121/1997, अंतगर्त धारा 8/21 स्वापक औषिध और मनः प्रभावी पदाथर् अिधिनयम, थाना जैतपुरा, िजला वाराणसी में प्रेिषत आरोप पत्र, िदनांिकत 08.08.1997 से उद्भूत दािण्डक वाद सं० -पुराना/3003484 वषर् 2012 (State U.P. Vs. Rakesh Kumar Dubey), जो अपर मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट, कोटर् सं० 8, वाराणसी द्वारा पािरत तलबी आदेश िद० 23.08.1997 तथा इस वाद की संपूणर् कायर्वाही को अिभखिण्डत करने हेतु योिजत िकया गया है।
2. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता एवं िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना तथा पत्रावली का पिरशीलन िकया।
3. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता का तकर् है िक आवेदक के िवरुद्ध कोई अपराध प्रकट नहीं होता है और वतर्मान अिभयोजन दुभार्वनापूणर् इरादे से उत्पीड़न करने के उद्देश्य से संिस्थत िकया गया है। यहां प्रासंिगक है िक इस मामलें को िदनांक 28.07.1997 को प्रथम सूचना िरपोटर् पंजीकृ त की गई, िजसे के स क्राइम नंबर 121/1997, अंतगर्त धारा 8/21 स्वापक औषिध और मनःप्रभावी पदाथर् अिधिनयम, 1985 (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985), पुिलस थाना जैतपुरा, िजला वाराणसी में उसी ितिथ की एक घटना के संबंध में दजर् िकया गया था। इसमें यह आरोप लगाया गया िक उप-िनरीक्षक (Sub- Inspector) पुिलस श्री एन.के .
ओझा, गश्त (patrolling) के दौरान, सूचना प्राप्त करते हैं िक दो व्यिक्त नकी घाट क्रॉिसग, मिस्जद के पास "हेरोइन" नामक नशीला पदाथर् बेच रहे हैं और उक्त सूचना के आधार पर, श्री िदनेश कु मार उपाध्याय को श्री मुख्तार अहमद पुत्र इद्रीस अहमद के साथ िगरफ्तार िकया गया तथा श्री िदनेश कु मार उपाध्याय के कब्जे से एक मािचस में हेरोइन बरामद होना बताया गया। तथािप, श्री िदनेश कु मार उपाध्याय, जो आवेदक के पड़ोसी गांव के िनवासी थे, एक आदतन मादक द्रव्य व्यसनी (drug addict) होने के साथ-साथ ड्रग Versus Counsel for Applicant(s) : Nikhil Kumar Yadav, Vagish Yadav Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Rakesh Dubey .....Applicant(s) State of U.P. and Another .....Opposite Party(s)
पेडलर भी थे, लेिकन िगरफ्तारी के बाद पुिलस द्वारा पूछताछ िकए जाने पर उन्होंने अपना नाम राके श कु मार दुबे उफर् िदनेश कु मार पुत्र आद्या प्रसाद बताया और तदनुसार, बरामदगी मेमो और िगरफ्तारी मेमो (arrest memo) तैयार िकए गए, िजन्हें अंततः प्रथम सूचना िरपोटर् में पिरवितत कर िदया गया। यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंिगक है िक श्री िदनेश कु मार उपाध्याय को एन.डी.पी.एस. अिधिनयम के तहत अपराध करते हुए कई बार िगरफ्तार िकया गया था और जब भी उन्हें िगरफ्तार िकया गया, उन्होंने अपना नाम राके श कु मार दुबे उफर् िदनेश कु मार पुत्र आद्या प्रसाद दुबे बताया। संयोगवश, आवेदक यानी राके श दुबे का नाम वही है जो वास्तिवक आरोपी श्री िदनेश कु मार उपाध्याय द्वारा बताया गया था, िकतु आवेदक के िपता का नाम फू ल चंद दुबे है, जबिक िदनेश कु मार उपाध्याय ने यह दावा िकया था िक उनके िपता का नाम आद्या प्रसाद दुबे है। इस प्रसंग पर, आवेदक को उक्त प्रथम सूचना िरपोटर् के अनुसरण में कभी भी पुिलस द्वारा िगरफ्तार नहीं िकया गया था, परंतु अनुसंधान अिधकारी ने, वास्तिवक आरोपी श्री िदनेश कु मार उपाध्याय पुत्र स्व.
सरजू प्रसाद उपाध्याय की वास्तिवक पहचान का सत्यापन िकए िबना, िदनांक 08.08.1997 को राके श कु मार दुबे @ िदनेश कु मार पुत्र आद्या प्रसाद दुबे, िनवासी कं सराईपुर, थाना भदोही, िजला भदोही के नाम से आरोप-पत्र दािखल कर िदया। श्री राके श कु मार दुबे उफर् िदनेश कु मार को िवद्वान सत्र न्यायाधीश द्वारा िदनांक 10.09.1997 के आदेश से जमानत पर िरहा िकया गया था, और िदनांक 10.09.1997 के उक्त आदेश के अनुसरण में, जेल में एक िरहाई वारंट भेजा गया था, जहाँ से श्री िदनेश कु मार उपाध्याय को िरहा िकया गया था। आवेदक को न तो िगरफ्तार िकया गया था, और न ही िरहा िकया गया था। िदनांक 10.09.1997 के आदेश द्वारा जेल से िरहा होने के बाद, वास्तिवक आरोपी कभी भी िवचारण न्यायालय (Trial Court) के समक्ष उपिस्थत नहीं हुआ, िजसके कारण िवचारण न्यायालय को सम्मन (Summons), तदुपरांत जमानती वारंट (Bailable Warrants), गैर- जमानती वारंट (Non-Bailable Warrants), और िफर मुचल्काधारकों (Sureties) को नोिटस सिहत बाध्यकारी उपाय (coercive measures) जारी करने पड़े। उपयुर्क्त तथ्यों से पिरलिक्षत हो रहा है िक आवेदक, वास्तव में वह व्यिक्त नहीं है, जो इस मामलें में मूल अपराधी है। पुनः उनके द्वारा अपने तकर् के समथर्न में कु छ दस्तावेजों और बयानों की ओर ध्यान आकिषत िकया।
4. िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता ने कथन िकया िक इस मामलें आवेदक/अिभयुक्त की ओर से िवचारण न्यायालय के समक्षय उन्मोचन प्राथर्ना पत्र योिजत िकया गया है, िजसे िवचारण न्यायालय द्वारा गुण-दोष के आधार पर िनरस्तािरत िकया जा चुका है। इसिलए, इस स्तर पर वािछंत प्राथर्ना स्वीकार िकये जाने योग्य नहीं है।
5. इस चरण पर, आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा उठाए गए तकर् प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का बनना पाया गया है, िजसके आधार पर अन्वेषण अिधकारी द्वारा आरोप-पत्र प्रेिषत िकया गया और संबंिधत न्यायालय द्वारा संज्ञान लेते हुए तलबी आदेश पािरत िकया गया। अिभयुक्त NA528 No. 41034 of 2026 2
की पहचान, नाम में िभन्नता और अन्य तथ्यात्मक िववाद, िजनका उल्लेख आवेदक द्वारा िकया गया है, वे पूणर्तः साक्ष्य के प्रश्न (Questions of Fact) हैं, िजनका िनधार्रण के वल िवचारण न्यायालय (Trial Court) के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत िकए जाने के उपरांत ही िकया जा सकता है। वतर्मान प्रकरण में अिभयुक्त की पहचान का िववाद और पूवर् में उन्मोचन प्राथर्ना पत्र का िनरस्त होना यह दशार्ता है िक इस स्तर पर समूची कायर्वाही को अिभखिण्डत करना न्यायसंगत नहीं है।
6.
उपयुर्क्त तथ्यात्मक एवं िविधक पिरिस्थितयों को दृिष्टगत रखते हुए, यह नहीं कहा जा सकता िक आवेदक के िवरुद्ध कोई अपराध नहीं बनता है। इस चरण पर के वल प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला देखा जाना है, जैसा िक माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आर.पी. कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1960 एस.सी. 866, हिरयाणा राज्य बनाम भजन लाल, 1992 एससीसी (िक्रिमनल) 426, िबहार राज्य बनाम पी.पी. शमार्, 1992 एससीसी (िक्रिमनल) 192 और अंत में झंडू फामार्स्युिटकल वक्सर् िलिमटेड बनाम मोहम्मद शराफु ल हक एवं अन्य (पैरा-10) 2005 एससीसी (िक्रिमनल) 283 के मामलों में प्रितपािदत कानून के आलोक में स्पष्ट िकया गया है। इसिलए, इस मामले की संपूणर् कायर्वाही को िनरस्त करने की प्राथर्ना को अस्वीकार िकया जाता है।
7. तद्नुसार, यह आवेदन पत्र िनरस्त िकया जाता है।
8. कायार्लय को िनदेर्श िदया जाता है िक इस आदेश की एक प्रितिलिप संबंिधत अवर न्यायालय को अिवलम्ब भेजना सुिनिश्चत िकया जाय। September 24, 2026 CP.sahani NA528 No. 41034 of 2026 3 (Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- CHANDRA PRAKASH SAHANI High Court of Judicature at Allahabad