KM FARIDA ANSARI AND ANOTHER v. STATE OF U.P. AND 5 OTHERS
WRIC/36224/2026 · 2026-09-13
Gautam Chowdhary
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DailyLaw.ai
[ 2026 DAILYLAW 7607 (ALL) · dailylaw.ai ]
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Judgment text
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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD WRIT - C No. - 36224 of 2026 A.F.R Court No. - 75 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J. 1- याचीगण की ओर से इस यािचका के माध्यम से, याचीगण एक परमादेश िरट जारी करने की मांग कर रहे हैं, िजसमें प्रत्युत्तरदातागण को याचीगण के शांितपूणर् जीवन (िलव इन िरलेशनिशप) में हस्तक्षेप न करने का िनदेर्श िदया जाए एवं संबंिधत अिधकािरयों को यह िनदेर्श देने की मांग की गयी है िक वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान करें। 2- याचीगण के िवद्वान अिधवक्ता श्री अमर नाथ िसह एवं उनके सहयोगी अिधवक्ता श्री अक्षांश, अंजू यादव एवं िवद्वान स्थायी अिधवक्ता श्री प्रिमत कु मार पाल एवं योगेश कु मार को सुना एवं पत्रावली का पिरशीलन िकया। 3- इस न्यायपीठ के पूवर् आदेश िदनांक 10.09.2026 द्वारा याचीगण को अिग्रम िनयत ितिथ पर न्यायालय में उपिस्थत होने का आदेश िकया गया था िजसके अनुपालन में आज न्यायालय में याची सं. 01 कु मारी फरीदा अंसारी एवं याची सं.
02 प्रगित कु शवाहा उपिस्थत हैं िजनकी पहचान उनके अिधवक्ता द्वारा िकया गया। 4- याचीगण के िवद्वान अिधवक्ता का कथन है िक दोनों याचीगण समलैंिगक है और बािलग हैं उम्र के सम्बंध में उन्होंने अपने अपने हाईस्कू ल की माकर् शीट की छाया प्रितिलिप संलग्न की है िजनके अवलोकन से स्पष्ट होता है िक वे बािलग हैं। िवद्वान अिधवक्ता का यह भी कथन है िक वे अिववािहत हैं और िलव-इन िरलेशनिशप में रह रहीं हैं। याचीगण के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा कथन िकया गया िक वयस्क व्यिक्तयों के बीच सहमित से िलव-इन संबंध िकसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। यह भी िनवेदन िकया गया िक भारत के संिवधान का अनुच्छेद 14 भारत के भीतर कानून की समान सुरक्षा की गारंटी देता है और अनुच्छेद 21 जीवन और व्यिक्तगत स्वतंत्रता के अिधकार की रक्षा करता है। वतर्मान मामले में याचीगण जो िक Versus Counsel for Petitioner(s) : Amar Nath Singh, Anadi Srivastava, Anju Yadav, Mahendra Yadav, Poonam Yadav, Prajjwal Yadav Counsel for Respondent(s) : C.S.C. Km Farida Ansari And Another .....Petitioner(s) State Of U.P. And 5 Others .....Respondent(s) अंतरधािमक एवं समलैंिगक हैं और िलव-इन संबंध में होने का दावा करते हैं जो िक उन्हें संिवधान के अनुच्छेद 21 जीवन और व्यिक्तगत स्वतंत्रता के अिधकार द्वारा प्रदत्त है। उक्त के अितिरक्त यह भी कथन िकया गया है िक िनजी प्रितवाद और पिरवार के अन्य सदस्य नाराज हो गए हैं और उनके जीवन को गंभीर खतरा है क्योंिक उन्हें धमकी दी जा रही है और परेशान िकया जा रहा है। इसिलए, याचीगण ने िनजी प्रितवािदयों से अपने जीवन की रक्षा के िलए पुिलस अिधकािरयों को िनदेर्श जारी करने के िलए भारत के संिवधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह िरट यािचका दायर की है। 5- याचीगण के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा आगे यह भी कथन िकया गया िक संवैधािनक नैितकता एवं मूल अिधकारों का सार है िक िकसी भी बािलग नागिरक का अपनी स्वेच्छा से जीवन साथी चुनना अथवा सहजीवन का चयन करना उसकी व्यिक्तगत स्वायत्तता, गिरमा और िनजता के अिधकार का अिभन्न िहस्सा है। भारत के संिवधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और वैयिक्तक स्वतंत्रता का अिधकार हमारे संवैधािनक लोकतंत्र का सवोर्च्च आधारस्तम्भ है। साथ ही उन्होंने न्यायालय का ध्यान माननीय उच्चतम न्यायालय की िविभन्न नजीरों पर आकृ ष्ट करते हुए नवतेज िसह जौहर व अन्य बनाम भारत संघ [(2018) 10 SCC 1] का हवाला िदया िजसमें माननीय उच्चतम न्यायालय ने वयस्क व्यिक्तयों के मध्य सहमितजन्य संबंधों को अपराधमुक्त करते
हुए यह सुस्पष्ट िकया था िक लैंिगक रुझान (sexual orientation) व्यिक्त की स्वतंत्रता, गिरमा, िनजता और व्यिक्तगत स्वायत्तता का अंतिनिहत पहलू है, और न्यायपािलका का यह परम दाियत्व है िक वह लोक नैितकता के स्थान पर संवैधािनक नैितकता का संरक्षण सुिनिश्चत करे। 6- िवद्वान स्थायी अिधवक्ता ने तकर् िदया है िक समलैंिगक िरश्ते की सामािजक स्वीकायर्ता नहीं है। िकसी व्यिक्त को अपनी पसंद का साथी चुनने का अिधकार अनुच्छेद 21 के तहत संरिक्षत है। हालाँिक, इस तरह के चुनाव की िवधायी मान्यता एक मौिलक अिधकार नहीं है। आगे उन्होंने िवरोध प्रकट करते हुए तकर् प्रस्तुत िकया िक समाज का एक पारंपिरक वगर् यह मानता है िक िववाह और पिरवार की व्यवस्था पुरुष और मिहला के बीच होती है, िजससे वंश आगे बढ़ता है। उनका तकर् है िक समलैंिगक संबंध इस प्राकृ ितक और पारंपिरक ढांचे को प्रभािवत करते हैं। 7- दोनों याचीगण (याची सं. 01 कु .फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगित कु शवाहा) व्यिक्तगत रूप से आज इस न्यायालय के समक्ष उपिस्थत हुईं। न्यायालय द्वारा पूछे जाने पर दोनों ने स्पष्ट, सुदृढ़ एवं िनभीर्क शब्दों में यह बयान दजर् कराया िक वे बािलग हैं और उन्होंने िकसी भी दबाव, भय अथवा अनुिचत प्रभाव के िबना अपनी स्वतंत्र इच्छा व समलैंिगक अिभरुिच से एक साथ रहने का िनणर्य िलया है। उन्होंने न्यायालय को अवगत कराया िक वे एक-दूसरे के साथ ही सहजीवन (िलव-इन िरलेशनिशप) में रहना चाहती हैं तथा भिवष्य में भी WRIC No. 36224 of 2026 2
साथ ही रहेंगी। न्यायालय ने उनका व्यिक्तगत साक्षात्कार कर यह पाया िक दोनों वयस्क हैं, अपने भले-बुरे को समझने में पूणर्तः सक्षम हैं और उनका यह िनणर्य स्वतंत्र सहमित पर आधािरत है।
8. याची सं. 01 कु .फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगित कु शवाहा द्वारा एक सफे द कागज में बयान अंिकत िकया गया िजसको पत्रावली पर रखा गया िजसका सार िनम्नवत है।
"िजसमें याची सं.
01 कु मारी फरीदा अंसारी द्वारा बयान में कथन िकया िक वह याची सं. 02 के साथ समलैंिगक संबंध में हैं और साथ रह रहे हैं। हम दोनों वयस्क हैं और हम दोनों को एक दूसरे के साथ रहने में कोई आपित्त नहीं है उन्होंने आगे यह भी कथन िकया िक प्रितवादी संख्या 5 (शाहबुद्दीन अंसारी) और प्रितवादी संख्या 6 (प्रेम कु शवाहा) द्वारा उनके शांितपूणर् जीवन में बाधा उत्पन्न की जा रही हैं, इसिलए प्रितवािदयों को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध िकया गया है। याची सं. 02 कु मारी प्रगित कु शवाहा द्वारा बयान में कथन िकया िक वह याची सं. 01 के साथ समलैंिगक संबंध में हैं और साथ रह रहे हैं। हम दोनों वयस्क हैं और हम दोनों को एक दूसरे के साथ रहने में कोई आपित्त नहीं है उन्होंने आगे यह भी कथन िकया िक प्रितवादी संख्या 5 (शाहबुद्दीन अंसारी) और प्रितवादी संख्या 6 (प्रेम कु शवाहा) द्वारा उनके शांितपूणर् जीवन में बाधा उत्पन्न की जा रही हैं, इसिलए प्रितवािदयों को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध िकया गया है।" 9- माननीय उच्चतम न्यायालय का िनणर्य: समलैंिगक युगलों तथा क्वीयर समुदाय के अिधकारों एवं उनकी िविधक िस्थित पर माननीय सवोर्च्च न्यायालय की संिवधान पीठ द्वारा सुिप्रयो उफर् सुिप्रया चक्रवतीर् व अन्य बनाम भारत संघ [(2023) SCC OnLine SC 1348] में िवस्तृत िवचार-िवमशर् िकया गया के िनणर्य के “प्रस्तर 149” में शीषर् अदालत ने अपने िनष्कषोर्ं एवं िविधक िस्थित को िनम्नानुसार समािहत िकया है:
“149. This court hereby summarizes its conclusions and directions as follows: i. There is no unqualified right to marriage except that recognised by statute including space left by custom. ii. An entitlement to legal recognition of the right to union – akin to marriage or civil union, or conferring legal status upon the parties to the relationship can be only through enacted law. A sequitur of this is that the WRIC No. 36224 of 2026 3
court cannot enjoin or direct the creation of such regulatory framework resulting in legal status. iii. The finding in (i) and (ii) should not be read as to preclude queer persons from celebrating their commitment to each other, or relationship, in whichever way they wish, within the social realm. iv.
Previous judgments of this court have established that queer and LGBTQ+ couples too have the right to union or relationship (under Article 21) – 'be it mental, emotional or sexual' flowing from the right to privacy, right to choice, and autonomy. This, however, does not extend to a right to claim entitlement to any legal status for the said union or relationship. v. The challenge to the SMA on the ground of under classification is not made out. Further, the petitioner's prayer to read various provisions in a 'gender neutral' manner so as to enable same-sex marriage, is unsustainable. vi. Equality and non-discrimination are basic foundational rights. The indirect discriminatory impacts in relation to earned or compensatory benefits, or social welfare entitlements for which marital status is a relevant eligibility factor, for queer couples who in their exercise of choice form relationships, have to be suitably redressed and removed by the State.
These measures have to be taken by the Union and State governments.” 10- सुिप्रयो (उपरोक्त) के “प्रस्तर 149” के उप-खंड (iv) से यह पूणर्तः स्थािपत और िनिववाद है िक क्वीयर तथा एलजीबीटीक्यू+ युगलों को भारत के संिवधान के अनुच्छेद 21 के अंतगर्त संबंध या सहजीवन (union or relationship) स्थािपत करने का अक्षुण्ण मौिलक अिधकार प्राप्त है—चाहे वह मानिसक, भावनात्मक अथवा शारीिरक सहचयर् हो जो िनजता के अिधकार, पसंद की स्वतंत्रता और व्यिक्तगत स्वायत्तता से सीधे उद्भूत होता है। यद्यिप ऐसे संबंधों को िविध के तहत वैवािहक दजार् प्रदान करना िवधाियका के क्षेत्रािधकार में है, तथािप दो वयस्क नागिरकों के साथ रहने और शांितपूणर् सहजीवन व्यतीत करने के मूल अिधकार को संिवधान का संपूणर् संरक्षण प्राप्त है। WRIC No. 36224 of 2026 4 11- उक्त के संदभर् में यह स्पष्ट िकया िक जब दो वयस्क व्यिक्त स्वेच्छा से साथ रह रहे हों, तो उनकी लैंिगक पहचान या सामािजक िवरोध के आधार पर उनके जीवन और स्वतंत्रता पर कोई आंच नहीं आने दी जा सकती। 12- उभय पक्षों के तकोर्ं एवं याचीगण के बयानों एवं सवोर्च्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की द्वयपीठ की प्रमुख नजीरो को ध्यान में रखते हुए न्यायालय इस िनष्कषर् पर पहुंचती है िक जब दो वयस्क नागिरक अपनी व्यिक्तगत स्वायत्तता और पसंद से एक साथ रहने का िनणर्य लेते हैं, तो भारत के संिवधान के अनुच्छेद 21 के अंतगर्त सहजीवन (िलव-इन िरलेशनिशप) में रहना उनका मौिलक अिधकार है। पिरवार के सदस्यों, संबंिधयों अथवा समाज के िकसी भी वगर् को उनके इस शांितपूणर् सहजीवन में िवघ्न डालने, उन्हें डराने-धमकाने अथवा उनकी शारीिरक स्वतंत्रता का हनन करने का कोई िविधक अिधकार नहीं है। वैवािहक मान्यता का अभाव िकसी भी तीसरे पक्ष या प्रशासिनक तंत्र को वयस्क नागिरकों की गिरमा और शारीिरक सुरक्षा पर प्रहार करने की छू ट नहीं देता। जीवन और वैयिक्तक स्वतंत्रता का अिधकार संवैधािनक व्यवस्था में सवोर्पिर है। साथ ही सहजीवन एवं स्वायत्तता का अिधकार (अनुच्छेद 21): नवतेज िसह जौहर एवं सुिप्रयो बनाम भारत संघ के िनणर्यों का संदभर् लेते हुए यह स्पष्ट िकया गया है िक दो बािलग व्यिक्तयों को आपसी सहमित से भावनात्मक, मानिसक और शारीिरक संबंध बनाने का मौिलक अिधकार प्राप्त है। अपनी पसंद का साथी चुनना व्यिक्त की िनजता, स्वायत्तता और गिरमा का अिभन्न िहस्सा है। सुिप्रयो मामले (प्रस्तर 149) के अनुसार, यद्यिप समलैंिगक िववाह को िविधक मान्यता देना िवधाियका के अिधकार क्षेत्र में है, िकतु दो बािलग व्यिक्तयों के शांितपूणर् सहजीवन (िलव-इन संबंध) पर कोई कानूनी रोक नहीं है और इसे संिवधान
का पूणर् संरक्षण प्राप्त है। 13- उपरोक्त िविधक िस्थित एवं संवैधािनक अिधदेशों के दृिष्टगत इस न्यायालय का अिभमत है िक याचीगण, अनुच्छेद 21 के अंतगर्त पूणर्तः संरिक्षत हैं, याचीगण बािलग है, समलैंिगक हैं, िशिक्षत हैं, अपना भला-बुरा समझने में पूणर्तः सक्षम है, खूब सोच-िवचार करने के पश्चात एक साथ रहने का िनणर्य िलया है िजस पर िकसी के द्वारा जोर जबरदस्ती नहीं की गयी है अतः याचीगण द्वारा िलव इन िरलेशनिशप में एक साथ रहने का िवरोध करने का िकसी को कोई अिधकार नहीं है तथा न्यायालय को उनकी सुरक्षा प्रदान करने की प्राथर्ना को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं िदखता तथा उनकी यह यािचका स्वीकार िकये जाने योग्य है। 14- तद्नुसार यह यािचका स्वीकार की जाती है। याचीगण को शांितपूणर् ढंग से एक साथ रहने की स्वतंत्रता है तथा उनके पिरवारीजन या अन्य िकसी व्यिक्त को उनके एक साथ िलव-इन िरलेशनिशप में रहने में हस्तक्षेप करने की अनुमित नहीं दी जाएगी। 15- यिद याचीगण के शांितपूणर् जीवन में िकसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो याचीगण इस आदेश की प्रमािणत प्रित के साथ संबंिधत पुिलस आयुक्त/एसएसपी/एसपी से संपकर् करेंगे WRIC No. 36224 of 2026 5 और पुिलस अिधकारी यह सुिनिश्चत करने के बाद िक याचीगण वयस्क हैं और स्वेच्छा से एक साथ रह रहे हैं, याचीगण को तत्काल सुरक्षा प्रदान करेंगे। 16- िनजी प्रत्युत्तरदाता को यह स्वतंत्रता प्रदान की जाती है िक यिद याचीगण द्वारा अिभलेख पर लाए गए दस्तावेज मनगढ़न्त या फजीर् हैं तो वे इस आदेश को वापस लेने के िलए िरकॉल आवेदन दायर करने के िलए स्वतंत्र होंगे। 17- इस िनणर्य को समाप्त करते हुए, मेैं अपनी िरसचर् एसोिसएट सुश्री जाह्न्वी िसह के समिपत शोध प्रयासों के प्रित अपना आभार व्यक्त करता हूं। September 14, 2026 S.Mishra WRIC No. 36224 of 2026 6 (Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- SHASHI MISHRA High Court of Judicature at Allahabad