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Allahabad High Court · body

2026 DAILYLAW 6554 (ALL)

THE ORIENTAL INSURANCE COMPANY LIMITED v. PERMANENT LOK ADALAT ETAH AND 2 OTHERS

WRIC/36606/2026 · 2026-09-13

Saurabh Shyam Shamshery

body2026

Judgment text

Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD WRIT - C No. - 36606 of 2026 Court No. - 36 HON'BLE SAURABH SHYAM SHAMSHERY, J. 1. Heard Sri. Anubhav Sinha, learned counsel for the petitioner and Sri Shyam Singh, learned Standing Counsel for State-Respondents. . 2. It has been rightly pointed out by learned counsel for petitioner that requirement for process of conciliation as provided under Section 22-C of Legal Services Authority Act, 1987, was not carried out by Permanent Lok Adalat in impugned order, except a general reference which is not sufficient as held by this Court in the case of Manager Life Insurance Corporation of India, Basti vs. Permanent Lok Adalat, Basti and others, 2021:AHC:151400 and relevant paragraphs of the judgment are reproduced hereinafter: “6. िवश्लेषण (क) वतर्मान प्रकरण में उत्पन्न िविधक प्रश्न, िजसका उल्लेख इस िनणर्य के प्रस्तर 1 में िकया गया है, उस पर दोनों पक्षों की बहस के मद्देनजर, िनणर्य लेने के िलये, सवर्प्रथम िविधक सेवा प्रािधकरण अिधिनयम1983, के अिधिनयिमत करने के उद्देश्य का उल्लेख करना अित आवश्यक है, जो िनम्निलिखत है- “समाज के दुबर्ल वगोर्ं को िनःशुल्क और सक्षम िविधक सेवा यह सुिनिश्चत करने हेतु उपलब्ध कराने के िलए िक आिथक या अन्य िनयोर्ग्यताओं के कारण कोई भी नािगरक न्याय पाने के अवसर से वंिचत न रह जाए, िविधक सेवा प्रािधकरणों का गठन करने के िलए और यह Versus Counsel for Petitioner(s) : Anubhav Sinha Counsel for Respondent(s) : C.S.C. The Oriental Insurance Company Limited .....Petitioner(s) Permanent Lok Adalat Etah And 2 Others .....Respondent(s) सुिनिश्चत करने हेतु िक िविधक पद्धित के प्रवतर्न से समान अवसर के आधार पर न्याय का संवधनर् हो, लोक अदालतें संिगठत करने के िलए अिधिनयम” (ख) उपरोक्त उद्देश्य की प्रािप्त के हेतू 'लोक अदालतों के आयोजन’ का प्रावधान उक्त अिधिनयम के अध्याय 6 में िकया गया है। अध्याय 6क, के धारा 22 (ख) की उपधारा (1) में ' स्थायी लोक अदालत' की स्थापना का प्रावधान है। 'लोक अदालत’ व ’स्थायी लोक अदालत’ में एक महत्वपूणर् बुिनयादी अंतर है। जहाँ लोक अदालत पक्षकारों के बीच समझौता या पिरिनधार्रण करने का प्रयास करेगा और यिद ऐसा न हो पाये तो वाद िविध के अनुसार िनपटाने के िलये लौटा िदया जायेगा। (देखे उक्त अिधिनयम की धारा 20 व उसकी उपधारा) परन्तु उक्त अिधिनयम की धारा 22 ग के अनुसार 'स्थायी लोक अदालत’ मामलों का संज्ञान लेने के उपरान्त सवर्प्रथम पक्षकारों के बीच सुलह कायर्वाही करेगी और स्वतंत्र और िनष्पक्ष रीित से सौहाद्रर्पूणर् समझौते पर पहुँचने के िलए, पक्षकारों के प्रयास में सहायता करेगी। परन्तु यिद पक्षकार िकसी करार पर पहुंचने में असफल रहते हैं और यिद िववाद िकसी अपराध से संबंिधत नहीं है, उस दशा में ही स्थाई लोक अदालत िववाद का िविनश्चय कर सकती है (देखे उक्त अिधिनयम की धारा-22 (ख) व उसकी उपधारा) (ग) सुलभता के िलए िविधक सेवा प्रािधकरण अिधिनयम 1983 की धारा 22 ग व उसकी सभी उपधारा िनम्न उल्लेिखत की जा रही है। “22 ग. स्थायी लोक अदालत द्वारा मामलों का संज्ञान- (1) िकसी िववाद का कोई पक्षकार, िववाद को िकसी न्यायालय के समक्ष लाने से पूवर्, िववाद के िनपटारे के िलए स्थायी लोक अदालत को आवेदन कर सके गा परन्तु स्थायी लोक अदालत को ऐसे अपराध से, जो िकसी िविध के अधीन शमनीय नहीं है, संबंिधत िकसी िवषय के संबंध में कोई अिधकािरता नहीं होगी परन्तु यह और िक स्थायी लोक अदालत को ऐसे मामले में भी अिधकािरता नहीं होगी िजसमें वादग्रस्त संपित्त का मूल्य दस लाख रुपए से अिधक है परन्तु यह भी िक के न्द्रीय सरकार राजपत्र में अिधसूचना द्वारा, के न्द्रीय प्रािधकरण से परामशर् करके दूसरे परंतुक में िविनिदष्ट दस लाख रुपए की सीमा को बढ़ा सके गी। (2) स्थायी लोक अदालत को उपधारा (1) के अधीन आवेदन िकए जाने के पश्चात्, उस आवेदन का कोई पक्षकार उसी िववाद के िलए िकसी न्यायालय की अिधकािरता का अवलंब नहीं लेगा। (3) जहां िकसी स्थायी लोक अदालत को उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन िकया जाता है वहां वह,- WRIC No. 36606 of 2026 2 क) आवेदन के प्रत्येक पक्षकार को उसके समक्ष िलिखत कथन फाइल करने का िनदेर्श देगी िजसमें आवेदन के अधीन िववाद के तथ्यों और प्रकृ ित, ऐसे िववाद के मुद्दों या िववाद्यकों और, यथािस्थित, ऐसे मुद्दों या िववाद्यकों के समथनर् में या उसके िवरोध में अवलंिबत आधारों का कथन होगा और ऐसा पक्षकार ऐसे कथन की अनुपूित में ऐसा कोई दस्तावेज या अन्य साक्ष्य दे सके गा िजसे ऐसा पक्षकार ऐसे तथ्यों और आधारों के सबूत में समुिचत समझता है और ऐसे कथन की एक प्रित ऐसे दस्तावेज या अन्य साक्ष्य, यिद कोई हो, के साथ आवेदन के प्रत्येक पक्षकार को भेजेगी; (ख) आवेदन के िकसी पक्षकार से सुलह कायर्वािहयों के िकसी प्रक्रम पर उसके समक्ष अितिरक्त कथन फाइल करने की अपेक्षा कर सके गी; (ग) आवेदन के िकसी पक्षकार से, उसे प्राप्त िकसी दस्तावेज या कथन को, अन्य पक्षकार को, उसका उत्तर देने के िलए समथर् बनाने हेतु संसूिचत करेगी । (4) जब कोई कथन, अितिरक्त कथन और उत्तर, यिद कोई हो, उपधारा (3) के अधीन स्थायी लोक अदालत के समाधानप्रद रूप में फाइल िकया गया है तब वह आवेदन के पक्षकारों के बीच सुलह कायर्वािहयां ऐसी रीित से करेगी िजसे वह िववाद की पिरिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए उिचत समझे। (5) स्थायी लोक अदालत उपधारा (4) के अधीन सुलह कायर्वािहयां करने के दौरान पक्षकारों को िववाद के स्वतंत्र और िनष्पक्ष रीित में सौहाद्रर्पूणर् समझौते पर पहुंचने के िलए, उनके प्रयास में सहायता करेगी। (6) आवेदन के प्रत्येक पक्षकार का यह कतर्व्य होगा िक वह आवेदन से संबंिधत िववाद की सुलह कराने में स्थायी लोक अदालत के साथ सद्भावनापूवर्क सहयोग करे और स्थायी लोक अदालत के , उसके समक्ष साक्ष्य और अन्य संबंिधत दस्तावेज प्रस्तुत करने के िनदेर्श का अनुपालन करे। (7) जब स्थायी लोक अदालत की पूवोर्क्त सुलह कायर्वािहयों में यह राय है िक ऐसी कायर्वािहयों में समझौते के ऐसे तत्व िवद्यमान हैं जो पक्षकारों को स्वीकायर् हो सकें गे, तब वह िववाद के संभाव्य समझौते के िनबंधन िवरिचत कर सके गी और संबंिधत पक्षकार को उनके संप्रेक्षण के िलए देगी और यिद पक्षकार िववाद के समझौते के िलए सहमत हो जाते हैं तो वे समझौता करार पर हस्ताक्षर करेंगे तथा स्थायी लोक अदालत उसके िनबंधनानुसार अिधिनणर्य पािरत करेगी और उसकी एक-एक प्रित प्रत्येक संबंिधत पक्षकार को देगी। (8) जहां पक्षकार उपधारा (7) के अधीन िकसी करार पर पहुंचने में असफल रहते हैं, वहां यिद WRIC No. 36606 of 2026 3 िववाद िकसी अपराध से संबंिधत नहीं है तो स्थायी लोक अदालत, िववाद का िविनश्चय कर देगी।” (घ) इस उच्च न्यायालय की एक समवतीर् न्यायपीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य प्रित श्रीमती कािमनी देवी व अन्य; 2017 (9) ए.डी.जे. 44, के िनणर्य में अन्य उच्च न्यायालयों के कई िनणर्यों को आधार मानते हुए यह िनधार्िरत िकया िक स्थाई लोक अदालत का यह एक पिवत्र कतर्व्य है िक , वो अपनी बुिद्धमत्ता, ज्ञान व अनुभव का सद्प्रयोग करते हुए पक्षकारों के मध्य समझौता करने का भरसक प्रयास करेंगे और ऐसे प्रयासों में असफल होने की दशा में ही िववाद का िविनिश्चय गुण-दोष पर कर सकें गे। समझौते की प्रिक्रया को िकये िबना स्थाई लोक अदालत सीधे गुण- दोष पर िनणर्य नहीं दे सकते हैं। (ङ) इस न्यायालय की एक और समवतीर् न्यायपीठ ने नेशनल इंश्योरेन्स कं 0 िल0 प्रित स्थाई लोक अदालत (िरट सी नं0 34170/2012 िनणर्य ितिथ 02.05.2014) में प्रितपािदत िकया है िक- “वो सभी मामले जो इस न्यायालय के समक्ष आते हैं, िनरअपवाद रुप से न्यायालय यह पाया जाता है िक भले ही अिधिनयम की धारा- 22 ग की उप-धारा (5) और उप-धारा (6), स्थायी लोक अदालत, पर सुलह की कायर्वाही के दौरान समझौता कराने का दाियत्व होता है और िफर उप-धारा (7) के संदभर् में एक राय बनाना होता हैं, िक ऐसी कायर्वाही में समझौते के तत्व मौजूद हैं, जो पक्षकार को स्वीकायर् हो सकते हैं, तो संभािवत समझौते के िनबन्धन िवचिरत कर सकते हैं और पक्षकारों से िटप्पिणयां आमंित्रत की जा सकती है। लेिकन ऐसा प्रतीत होता है िक स्थायी लोक अदालतें, उक्त वैधािनक प्रावधानों के पुणर्त्य िवपरीत में गुण-दोष के आधार पर इस मुद्दे पर िनणर्य लेने से पहले के वल "समाधान का प्रयास िकया परन्तु िवफल रहा” का पाठ कर रही है। इस बारे में कोई सामग्री नहीं है िक यह सुलह कब की गयी, िकस तरीके से और िकस तरह से समझौते की शतेर् तैयार की गई तािक संबंिधत पक्षों की िटप्पिणयां आमंित्रत की जा सकें । यह न तो प्रावधान की भावना है और न ही इसे सावर्जिनक उपयोिगता सेवा प्रदाता में शािमल करने के िलए एक छल के रुप में इस्तेमाल िकया जा सकता है। यह कोई औपचािरकता नहीं है, िजसे यंत्रवत् रुप से िनवर्हन िकया जाना है। पत्रावली से यह प्रितिबिबत होना चािहए िक एक संभािवत समझौते तक पहुँचने के िलये, एक प्रस्तािवत समझौता बनाने के िलए वास्तिवक और ईमानदार प्रयास िकये गये थे और के वल जब प्रस्तािवत समझौते को वांिछत प्रितिक्रया नहीं िमलती है, तब ही स्थायी लोक अदालत को गुण-दोष के आधार पर िनणर्य लेने के िलये आगे बढ़ना चािहए।” (अनुवाद न्यायालय द्वारा िकया गया है) (च) इसके अितिरक्त एक और समवतीर् न्यायपीठ द्वारा लाइफ इंश्योरेन्स कॉरपोरेशन ऑफ इंिडया प्रित सैयद जैइघम व अन्य; 2015 (8) एडीजे 668, के मामले में इस संदभर् में स्थाई WRIC No. 36606 of 2026 4 लोक अदालतों को कु छ िदशा िनदेर्श भी िदये गये थे, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है िक वो िदशा िनदेर्श स्थाई लोक अदालतों द्वारा पूणर् रुप से अपनाये नहीं जा रहे हैं। प्रमुख िनदेर्श हैं िक “स्थाई लोक अदालत का मुख्य कायर् पिरिनधारण कराना है परन्तु पक्षकार जब िकसी करार तक नहीं पहुँच पाते हैं तब स्थाई लोक अदालत न्याय िनणार्यक िनकाय में रुपान्तिरत हो जाता है” तथा "स्थाई लोक अदालत को िववाद के पक्षकारों को यह धारणा नहीं बनाने देना चािहये िक, आरम्भ से ही उसका कायर् न्याय िनणार्यक का है” (अनुवाद न्यायालय द्वारा िकया गया है) (छ) जैसा िक उक्त अिधिनयम की धारा 22 ग की उपधारा 3 व 4 में विणत है, िक पक्षकारों के िलिखत कथन व िववाद के मुद्दों के िववाधकों को ध्यान में रखते हुए, पक्षकारों की बीच स्थाई लोक अदालत, सुलह कायर्वािहयां द्वारा पक्षकारों को िववाद के स्वंतत्र और िनष्पक्ष रीित में सौहाद्रर्पूणर् समझौते पर पहुँचने के िलए उनके प्रयास में सहायता करेगी। अतः यह आवश्यक है िक स्थाई लोक अदालत, उक्त प्रयासों का संक्षेप में अपने आदेश में उल्लेख करे क्योंिक उपधारा (8) के अनुसार यिद पक्षकार िकसी करार पर पहुँचने से असफल रहते हैं, उस दशा में ही, स्थायी लोक अदालत िववाद का िविनश्चय कर सकती हैं (यिद िववाद िकसी अपराध से संबंिधत नहीं है)। उपधारा (8) तक की िस्थित तक पहुँचने से पहले उपधारा (3), (4), (5) व ( 6) में िकये गये प्रयास व उपधारा (7) में समझौते पर न पहुँचने की िस्थित के उपरान्त ही, स्थाई लोक अदालत, उपधारा (8) के अन्तगर्त गुण-दोष पर िनणर्य ले सकती है। अतः उक्त कायर्वाही का उल्लेख, संिक्षप्त में ही सही, परन्तु अवश्य होना चािहये। (ज) उपरोक्त िवश्लेषण से यह पूणर्तः िविदत होता है िक, स्थाई लोक अदालत, को सवर्प्रथम पक्षकारों को सौहाद्रर्पूणर् समझौते पर पहुँचाने के िलये अपनी बुिद्धमत्ता, ज्ञान व अनुभव का उपयोग करके प्रयास करना चािहए। जो उसका सवर्प्रथम कतर्व्य है। इस प्रयास में असफल होने के उपरान्त ही िववाद का िविनश्चय करना चािहये। परन्तु उपरोक्त कायर्वािहयों का उल्लेख ( संक्षेप में) पंचाट में अवश्य होना चािहए, िजसमें उसके द्वारा िववाद का िविनश्चय करने का कारण पता चल सके । ऐसा उल्लेिखत न होने से यह प्रतीत होगा िक स्थाई लोक अदालत, द्वारा पक्षकारों के बीच समझौता कराने का कोई प्रयास नहीं िकया गया, जो उक्त अिधिनयम के प्रावधानों का हनन करने के समकक्ष होगा। अतः ऐसी दशा में 'पंचाट’ िविधक रुप से मान्य नहीं माना जायेगा। प्रकरण में उत्पन्न िविधक प्रश्न का िनधार्रण उपरोक्त वणर्न द्वारा िकया जाता है। (झ) वतर्मान प्रकरण में पंचाट में समझौते के प्रयास के संबंध में कोई उल्लेख नहीं िकया गया है, के वल एक स्थान पर समझौते के िलए तारीख िनधार्िरत की गयी, ऐसा उल्लेिखत है, परन्तु उक्त तारीख पर क्या प्रयास िकये गये व क्यों पक्षकार समझौता नहीं कर पाये, ऐसा कु छ भी नहीं िलखा गया है। अतः यह प्रतीत होता है 'स्थाई लोक अदालत' ने सौहाद्रर्पूणर् समझौते के िलए कोई भी प्रयास नहीं िकया होगा या युिक्त युक्त प्रयास की कमी रही होगी तथा वो सीधे WRIC No. 36606 of 2026 5 िववाद में िविनश्चय की िस्थित पर पहुँच गये जो, उपरोक्त िवश्लेषण के पूणर्तः िवपरीत है। अतः आक्षेिपत पंचाट इसी कारणवश, अिविधक व दूिषत हो जाता है। क्यों िक यह न्यायालय इस िनष्कषर् पर पहुँचता है िक स्थाई लोक अदालत द्वारा समझौते की प्रिक्रया का प्रयास िकये िबना िववाद पर गुण-दोष पर िनणर्य देना अवैधािनक है, अतः इस स्तर पर पंचाट की गुण-दोष पर जाँच करने की आवश्यकता नहीं है। 7. िनष्कषर् उपरोक्त िवश्लेषण के फलस्वरुप, आक्षेिपत 'पंचाट' िनरस्त िकया जाता है तथा वाद 'स्थाई लोक अदालत' को प्रितप्रेिषत िकया जाता है और िनदेर्िशत िकया जाता है िक वो समझौता कराने की प्रिक्रया को अपना कर पक्षकारों के मध्य सुलह कराने का युिक्तयुक्त प्रयास करेगी व उसके असफल होने के उपरांत ही वाद का गुण-दोष पर िविनश्चय करेगी तथा समझौते के प्रयास असफल होने का संक्षेप में उल्लेख पंचाट में भी करेगी। उपरोक्त िनदेर्श के साथ यह यािचका आंिशक रुप से स्वीकार की जाती है।" 3. Learned Standing Counsel appearing for State-Respondents is not able to dispute the above referred position of law as well as consideration made by Permanent Lok Adalat which was not sufficient, therefore, Court finds that a case for interference is made out. 4. In the present case, only consideration made by Permanent Lok Adalat, as reiterated in impugned order, is as follows: "8. After completion of pleadings and evidence in support of respective case of the parties this PLA fixed the matter for conciliation proceedings as required under Section 21-C (4),(5) & (6) of The Legal Services Authorities Act, 1987. Number of dates were fixed for conciliation but none of the competent officer / official of the insurer ever appeared, though the petitioner and representative of State remained present on all such dates. Ultimately on 27-01-2025 the learned counsel for the insurer on the basis of an email received from the insurer made an endorsement on order sheet that amicable settlement was not possible hence no alternative was left except to decide the dispute on merit Under Section 22.C (8) of the 1987 Act." 5. Court finds that aforesaid consideration is not legally sufficient, WRIC No. 36606 of 2026 6 therefore, impugned order dated 30.03.2026 passed in P.L.A. Case No. 08 of 2022 by Permanent Lok Adalat, Etah is set aside and matter is remitted to concerned respondent to pass a fresh order taking note of aforesaid judgment in Manager Life Insurance Corporation of India, Basti (supra). 6. The writ petition is accordingly disposed of. September 14, 2026 AK WRIC No. 36606 of 2026 7 (Saurabh Shyam Shamshery,J.) Digitally signed by :- AWADESH KUMAR High Court of Judicature at Allahabad