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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 45074 of 2025 Court No. - 73 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता और राज्य की ओर से िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना एवं पत्रावली का पिरशीलन िकया।
2. आवेदक की ओर से धारा 528 भारतीय नागिरक सुरक्षा संिहता के अंतगर्त प्रस्तुत यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 83/2023, अन्तगर्त धारा 431, 432 भा०दं०िव० व धारा 4/21 खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम 1957 एवं धारा 3(1), 58, 72(1) उ०प्र० उपखिनज ( पिरहान) िनयमावली 2021 तथा धारा 2/3 सावर्जिनक संपित्त नुकसान िनवारण अिधिनयम, थाना कु रारा, िजला हमीरपुर में प्रेिषत आरोप पत्र, िदनांिकत 13.01.2024 से उद्भूत दािण्डक वाद सं० 2270/2024 (State Vs. Kamlesh Kumar Sahu), जो मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट झांसी के न्यायालय में लंिबत है, में पािरत प्रसंज्ञान/तलबी आदेश िदनांक 17.09.2024 एवं इस वाद की संपूणर् कायर्वाही को अपास्त करने हेतु योिजत िकया गया है।
3. आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा यह तकर् िदया गया है िक आक्षेिपत आरोप-पत्र दािखल िकए जाने के अनुसरण में, िवद्वान मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट ने अपने िववेक का िबना कोई प्रयोग िकए, िदनांक 17.09.2024 के आदेश के माध्यम से आरोप-पत्र पर प्रसंज्ञान लेते हुए आवेदक के िवरुद्ध उपरोक्त धाराओं के अंतगर्त अपराधों के िलए समन जारी कर िदया, जबिक यहां प्रासंिगक है िक इस मामलें में एम.एम.आर.डी.
अिधिनयम की धारा 22 के तहत िनधार्िरत प्रिक्रया का पालन नहीं िकया गया है तथा प्रािधकृ त अिधकारी की िशकायत के अभाव में, िवद्वान मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट द्वारा पािरत आदेश िदनांक 17.11.2022 अवैध है और कानून की दृिष्ट में पोषणीय नहीं है। आगे यह तकर् िदया गया है िक यद्यिप उ०प्र० खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम की धारा 22 के अनुसार, न्यायालय अिधिनयम, 1957 के तहत दंडनीय िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक िक अिधकृ त व्यिक्त द्वारा िलिखत में िशकायत (पिरवाद) न की गई हो। यह भी तकर् िदया गया है िक पुिलस द्वारा प्रस्तुत आरोप-पत्र के आधार पर संज्ञान तब तक नहीं िलया जा सकता, जब तक िक अिधकृ त व्यिक्त द्वारा िशकायत दजर् न की गई हो और अिधक Versus Counsel for Applicant(s) : Niraj Tiwari, Rohit Tiwari Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Kamlesh Kumar Sahu .....Applicant(s) State of U.P. and Another .....Opposite Party(s)
से अिधक दंड प्रिक्रया संिहता की धारा 2(d) के अनुसार, यिद अिधकृ त व्यिक्त द्वारा पुिलस िरपोटर् प्रस्तुत की जाती है, तो उसे िशकायत माना जा सकता है। अपने तकर् के समथर्न में, आवेदक के िवद्वान अिधवक्ता ने इस न्यायालय और माननीय उच्चतम न्यायालय के िनणर्यों पर भरोसा िकया है, िजनमें यह िवचार व्यक्त िकया गया है िक पुिलस िरपोटर् (आरोप-पत्र) के आधार पर संज्ञान लेना उ०प्र० खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम की धारा 22 के द्वारा विजत है।
4. इसके िवपरीत, िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता ने प्राथर्ना का पुरजोर िवरोध िकया और प्रस्तुत िकया िक प्रश्नगत आक्षेिपत आदेश में कोई अवैधता नहीं है। हालाँिक, उनके द्वारा उ०प्र० खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम की धारा 22 में िनिहत प्रावधानों का खण्डन नहीं िकया जा सका।
5.
उभय पक्षों के तकोर्ं को सुना है और अिभलेख का अवलोकन िकया है, िजसके पिरलिक्षत है िक आवेदकगण के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा मुख्य रूप से यह िविधक तकर् प्रस्तुत िकया गया है िक अिधिनयम, 1957 की धारा 22 के वैधािनक प्रावधानों के अनुसार, न्यायालय इस अिधिनयम या इसके िनयमों के तहत दंडनीय िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं ले सकता, जब तक िक कें द्र सरकार, राज्य सरकार या िकसी अिधसूिचत अिधकृ त व्यिक्त द्वारा िलिखत में िशकायत (Complaint/पिरवाद) दािखल न की गई हो। संदभर् के िलए उ०प्र० खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 की धारा 22 को नीचे उद्धृत िकया जा रहा है:-
"22. कोई भी न्यायालय इस अिधिनयम या इसके तहत बनाए गए िकसी भी िनयम के तहत दंडनीय िकसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक िक कें द्र सरकार या राज्य सरकार या इस संबंध में अिधकृ त िकसी व्यिक्त द्वारा िलिखत में िशकायत (Complaint) न की गई हो।"
6. उ०प्र० खान और खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 की पूवोर्क्त धारा 22 अत्यंत स्पष्ट है जो यह प्रावधान करती है िक कोई भी न्यायालय उपरोक्त अिधिनयम के तहत िकसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा, जब तक िक कें द्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा अिधकृ त अिधकारी द्वारा िलिखत में िशकायत दजर् न की गई हो।
7. कं वर पाल िसह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य, (2020) 14 SCC 331 में िरपोटर् िकए गए मामले में, माननीय शीषर् अदालत ने यह व्यवस्था दी िक मिजस्ट्रेट आरोप-पत्र के आधार पर के वल भारतीय दंड संिहता के तहत अपराधों के िलए संज्ञान ले सकते हैं, लेिकन अिधिनयम, 1957 के तहत अपराध का संज्ञान के वल अिधिनयम, 1957 के प्रावधानों के अनुसार अिधकृ त अिधकारी द्वारा दायर िशकायत के आधार पर ही िलया जा सकता है।
8.
सवोर्च्च न्यायालय ने पुनः जयंत एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2021) 2 SCC 670 के िनणर्य में यह व्यवस्था दी िक यिद पुिलस द्वारा िववेचना के पश्चात आरोप-पत्र दािखल िकया जाता NA528 No. 45074 of 2025 2
है, तो िवद्वान मिजस्ट्रेट भारतीय दंड संिहता के तहत अपराध के िलए संज्ञान ले सकते हैं, लेिकन अिधिनयम, 1957 के तहत अपराध के िलए िवद्वान मिजस्ट्रेट उस आरोप-पत्र के आधार पर संज्ञान नहीं ले सकते। और यह आगे देखा गया िक मिजस्ट्रेट संज्ञान के वल तभी ले सकते हैं जब अिधिनयम, 1957 के तहत अपराध के िलए उस आरोप-पत्र के साथ अिधकृ त अिधकारी द्वारा िशकायत दजर् की गई हो। उपरोक्त िनणर्य के पैराग्राफ 21.3और 21.5 को नीचे उद्धृत िकया जा रहा है:-
"21.3. भारतीय दंड संिहता के तहत अपराध कािरत होने पर, पुिलस िरपोटर् प्राप्त होने पर, क्षेत्रािधकार रखने वाले मिजस्ट्रेट खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम और उसके तहत बनाए गए िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में संज्ञान लेने के िलए अिधकृ त अिधकारी द्वारा दायर की जाने वाली िशकायत की प्रािप्त की प्रतीक्षा िकए िबना उक्त अपराध का संज्ञान ले सकते हैं।
21.4.
यह िक खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम और उसके तहत बनाए गए िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में, जब कोई मिजस्ट्रेट संिहता की धारा 156(3) के तहत आदेश पािरत करता है और संबंिधत थाना प्रभारी/ स्टेशन हाऊस ऑिफसर को अिधिनयम और िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में अपराध मामला/अिभयोग दजर् करने का िनदेर्श देता है और तत्पश्चात िववेचना के बाद थाना प्रभारी/िववेचना अिधकारी एक िरपोटर् प्रस्तुत करता है, तो उसे संबंिधत मिजस्ट्रेट के साथ-साथ खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम की धारा 22 में उिल्लिखत संबंिधत अिधकृ त अिधकारी को भेजा जा सकता है और उसके बाद संबंिधत अिधकृ त अिधकारी िववेचना अिधकारी द्वारा प्रस्तुत िरपोटर् के साथ िवद्वान मिजस्ट्रेट के समक्ष िशकायत दजर् कर सकता है और उसके बाद िवद्वान मिजस्ट्रेट के िलए िनयत प्रिक्रया का पालन करने के बाद संज्ञान लेना, खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम और उसके तहत बनाए गए िनयमों के िविभन्न प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में प्रिक्रया/समन जारी करना खुला होगा और उस चरण में यह कहा जा सकता है िक िवद्वान मिजस्ट्रेट द्वारा संज्ञान िलया गया है।
9. उपरोक्त िविधक िस्थित को देखते हुए, यह स्पष्ट है िक खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन ) अिधिनयम, 1957 की धारा 21(4) का संबंध है, कानून की िस्थित अत्यंत स्पष्ट और सुस्थािपत है। िबना िकसी सक्षम या अिधकृ त अिधकारी की िलिखत वैधािनक िशकायत के , पुिलस द्वारा दािखल सामान्य आरोप-पत्र के आधार पर मिजस्ट्रेट सीधे इस िवशेष अिधिनयम के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकते। वतर्मान मामले में िवद्वान मिजस्ट्रेट ने यह सुिनिश्चत िकए िबना िक क्या िरकॉडर् पर धारा 22 के अनुकू ल वैध िलिखत िशकायत मौजूद थी, सीधे पुिलस के आरोप-पत्र पर ही खान एवं खिनज (िवकास का िविनयमन) अिधिनयम, 1957 की धारा 4/21 के तहत संज्ञान ले NA528 No. 45074 of 2025 3
िलया, जो िविधक िसद्धांतों के िवपरीत होने के कारण िनरस्त िकए जाने योग्य है।
10.
पिरणामतः, उपरोक्त तथ्यों और स्थािपत नजीरों के आलोक में, यह यािचका आंिशक रूप से स्वीकार की जाती है तथा िवद्वान मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट, झांसी द्वारा पािरत आक्षेिपत आदेश िदनांिकत 17.09.2024 का वह अंश, िजसके द्वारा खान एवं खिनज (िवकास और िविनयमन) अिधिनयम, 1957 की धारा 21(4) के अंतगर्त अपराध पर प्रसंज्ञान िलया गया है, को अपास्त (Quash) िकया जाता है।
11. हालांिक, आक्षेिपत प्रसंज्ञान आदेश िदनांिकत 17.09.2024 एवं वाद की शेष कायर्वाही धारा 431, 432 भा०दं०िव० एवं धारा 3(1), 58, 72(1) उ०प्र० उपखिनज (पिरहान) िनयमावली 2021 तथा धारा 2/3 सावर्जिनक संपित्त नुकसान िनवारण अिधिनयम के संदभर् में िविध अनुसार जारी रहेगी।
12. यह भी स्पष्ट िकया जाता है िक राज्य सरकार या संबंिधत अिधकृ त प्रािधकारी, यिद आवश्यक समझे, तो अिधिनयम, 1957 की धारा 22 के तहत िनधार्िरत िविधक प्रिक्रया का पालन करते हुए आवेदकों के िवरुद्ध सक्षम न्यायालय के समक्ष नए िसरे से िलिखत िशकायत (पिरवाद) दजर् कराने के िलए स्वतंत्र है। October 6, 2026 CP.sahani NA528 No. 45074 of 2025 4 (Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- CHANDRA PRAKASH SAHANI High Court of Judicature at Allahabad