PANKAJ SINGH AND 5 OTHERS v. STATE OF U.P. AND ANOTHER
NA528/43426/2026 · 2026-10-06
Gautam Chowdhary
body2026
DailyLaw.ai
[ 2026 DAILYLAW 12441 (ALL) · dailylaw.ai ]
DailyLaw.ai
[ 2026 DAILYLAW 12441 (ALL) · dailylaw.ai ]
Judgment text
Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 43426 of 2026 Court No. - 73 HON'BLE DR. GAUTAM CHOWDHARY, J.
1. आवेदकगण के िवद्वान अिधवक्ता एवं िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना तथा पत्रावली का पिरशीलन िकया।
2. आवेदकगण सं० 1. पंकज िसह, 2. िवनोद िसह, 3. अनमोल िसह, 4. उपेन्द्र िसह, 5. प्रशांत िसह उफर् नीरज िसह एवं 6. दीपक िसह की ओर से धारा 528 बी.एऩ.एस.एस. के अन्तगर्त यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 133 वषर् 2020 अंतगर्त धारा 3(1) उ०प्र० िगरोहबंद एवं समाज िवरोधी िक्रयाकलाप (िनवारण) अिधिनयम, थाना कोतवाली बांसी, िजला िसद्धाथर्नगर में प्रेिषत आरोपपत्र िदनांिकत 04.12.2020 से उद्भूत गैंगेस्टर परीक्षण सं० 1086, वषर् 2020 (राज्य बनाम िवनोद िसह एवं अन्य), जो अपर सत्र न्यायाधीश, एफ.टी.सी.-II/िवशेष न्यायाधीश (गैंगेस्टर एक्ट), िसद्धाथर्नगर के न्यायालय में लिम्बत है, में पािरत प्रश्नगत प्रसंज्ञान/तलबी आदेश एवं इस वाद की सम्पूणर् कायर्वाही को अिभखंिडत िकये जाने हेतु योिजत िकया गया है।
3.
प्रकरण के संिक्षप्त एवं प्रासंिगक तथ्य यह हैं िक थाना कोतवाली बांसी, िजला िसद्धाथर्नगर में मु०अ०सं० 133 वषर् 2020 के अंतगर्त धारा 3(1) उ०प्र० िगरोहबंद एवं समाज िवरोधी िक्रयाकलाप (िनवारण) अिधिनयम, प्रथम सूचना िरपोटर् दजर् की गई, िजसमें यह आरोप लगाया गया है िक आवेदकगण ने सह-अिभयुक्तगण के साथ िमलकर एक संगिठत आपरािधक िगरोह गिठत िकया है, जो अपने व्यिक्तगत लाभ के िलए जनपद की क्षेत्रीय सीमा के भीतर सामूिहक अथवा व्यिक्तगत रूप से बार-बार समाज िवरोधी एवं िहसक गितिविधयों में संिलप्त रहे हैं। यह भी आरोिपत िकया गया है िक आवेदकगण एवं सह-अिभयुक्तगण द्वारा क्षेत्र में आतंक एवं भय का वातावरण उत्पन्न कर लोक-शांित भंग की गई तथा ऐसी दहशत एवं भय की िस्थित उत्पन्न की गई िक सामान्य जनमानस उनके िवरुद्ध िशकायत करने अथवा उनके िवरुद्ध साक्ष्य देने के िलए साधारण िविधक प्रिक्रया का सहारा लेने से भी भयभीत हो जाते हैं। आवेदकगण के िवरुद्ध लंिबत आपरािधक मामलों का िववरण दशार्ते हुए एक गैंग चाटर् तैयार िकया गया। संबंिधत अिधकािरयों द्वारा उक्त गैंग चाटर् को अनुमोिदत िकए जाने के पश्चात आवेदकगण एवं सह-अिभयुक्तगण के िवरुद्ध Versus Counsel for Applicant(s) : Alok Chandra, Karunesh Pratap Singh Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Pankaj Singh And 5 Others .....Applicant(s) State of U.P. and Another .....Opposite Party(s)
अिधिनयम के अंतगर्त प्रथम सूचना िरपोटर् दजर् की गई। प्रकरण की िववेचना की गई और िववेचक द्वारा मौिखक एवं दस्तावेजी साक्ष्य सिहत उपलब्ध साक्ष्यों का संकलन िकए जाने के उपरांत आवेदकगण की िगरोह के सिक्रय सदस्य के रूप में प्रथमदृष्टया संिलप्तता प्रदिशत पाए जाने पर िववेचना पूणर् करते हुए आरोप-पत्र प्रेिषत िकये गये। उक्त आरोप-पत्र के आधार पर िवद्वान िवचारण न्यायालय ने आक्षेिपत आदेश द्वारा संज्ञान िलया। अतः आवेदकगण द्वारा इस न्यायालय के समक्ष उपयुर्क्तानुसार समस्त कायर्वाही, आरोप-पत्र एवं संज्ञान/तलबी आदेश को चुनौती दी गई है।
4.
आवेदकगण के िवद्वान अिधवक्ता ने तकर् प्रस्तुत िकया िक के वल गैंग चाटर् में आवेदकगण के िवरुद्ध दशार्ए गए मुकदमों के आधार पर ही आवेदकगण पर गैंगस्टर एक्ट आरोिपत कर िदया गया है। िवद्वान अिधवक्ता द्वारा अिग्रम यह भी कथन िकया गया है िक आवेदकगण न तो िकसी िगरोह के नेता हैं और न ही िकसी िगरोह के सदस्य हैं तथा उन्होंने कभी भी इस प्रकार का आचरण या कृ त्य नहीं िकया है। यह भी तकर् प्रस्तुत िकया गया िक अिधिनयम 1986 के वल ऐसे अिभयुक्त-आवेदक की िस्थित को पिरभािषत करता है, जो अिधिनयम की पिरभाषा में िनिदष्ट अपराध में संिलप्त हो और िजसे धारा 2 के उपखंड (ख) एवं (ग) में क्रमशः "गैंग" तथा "गैंगस्टर" के रूप में पिरभािषत िकया गया है। िवद्वान अिधवक्ता द्वारा कथन िकया गया िक अिधिनयम 1986 स्वयं कोई अपराध/ दंडनीय कृ त्य को सृिजत नहीं करता है। आगे यह तकर् िदया गया िक गैंग चाटर् मात्र आवेदकगण की ऐसे अपराध में संिलप्तता को दशार्ता है, जो अिधिनयम 1986 की धारा 2(ख) के िविभन्न खंडों में िनिदष्ट हैं और िजसके िलए संबंिधत मूल िविध में पहले से ही दंड का प्रावधान है। अतः यह तकर् िदया गया िक आवेदकगण पर गैंगस्टर एक्ट ऐसे िकसी स्वतंत्र अपराध के अभाव में आरोिपत िकया गया है, िजसे उक्त अिधिनयम द्वारा सृिजत िकया गया हो। िविध का सुस्थािपत िसद्धांत है िक िविध में िकसी अपराध का सृजन िकए िबना उसके िलए दंड िनधार्िरत नहीं िकया जा सकता। इस संबंध में आवेदकगण के िवद्वान अिधवक्ता ने मा० सवोर्च्च न्यायालय द्वारा िनणीर्त दािण्डक अपील संख्या 3979/2026, िशव प्रताप िसह उफर् िचनू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य: 2026 INSC 894, की तरफ न्यायालय का ध्यान आकृ ष्ट िकया।
5.
इसके िवपरीत, िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता ने प्राथर्नापत्र का िवरोध करते हुए तकर् प्रस्तुत िकया िक िवस्तृत, िनष्पक्ष एवं समुिचत िववेचना के उपरांत आवेदकगण के िवरुद्ध आरोप-पत्र प्रेिषत िकया गया है और िववेचना के दौरान ऐसे पयार्प्त एवं िवश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध उपलब्ध पाए गये हैं, जो आवेदकगण की संगिठत आपरािधक िगरोह की गितिविधयों में संिलप्तता को प्रथमदृष्टया स्थािपत करती हैं। उनके द्वारा यह भी तकर् िदया गया िक अिधिनयम तथा वषर् 2021 के िनयमों के अंतगर्त िनधार्िरत सभी वैधािनक आवश्यकताओं का िविधवत अनुपालन िकया गया है। गैंग चाटर् िगरोह के सदस्यों के िवरुद्ध उपलब्ध मूल/आधारभूत मामलों को सामूिहक रूप से सिम्मिलत करते हुए तैयार िकया गया तथा सक्षम प्रशासिनक अिधकािरयों द्वारा संयुक्त संतुिष्ट के आधार पर िविधवत अनुमोिदत िकया गया। NA528 No. 43426 of 2026 2
6. िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्त ने अिग्रम कथन िकया िक एक मात्र आपरािधक पूवर्वृत्त अथवा िगरोह के सदस्यों के िवरुद्ध उपलब्ध सामूिहक आधारभूत मामले भी अिधिनयम की धारा 2(ख) के अंतगर्त आवश्यक सीमा को पूणर् करने के िलए पयार्प्त हैं। यह भी तकर् िदया गया िक िवद्वान िवचारण न्यायालय ने प्रथमदृष्टया अपराध के घिटत होने का पयार्प्त आधार पाए जाने पर िविध- सम्मत रूप से संज्ञान लेते हुए आवेदकगण को तलब िकया है, िजसमें इस न्यायालय द्वारा अंतगर्त धारा 528, भारतीय नागिरक सुरक्षा संिहता (BNSS) के अंतगर्त प्रदत्त अिधकािरता का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप िकए जाने का कोई औिचत्य पिरलिक्षत नहीं हो रहा है। हालांिक, िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता द्वारा मा० सवोर्च्च न्यायालय द्वारा िनणीर्त िशव प्रताप िसह उफर् िचनू (उपयुर्क्त ) के मामले में प्रितपािदत िविध-व्यवस्थाओं का खंडन नहीं कर सके ।
7. मैंने आवेदकगण के िवद्वान अिधवक्ता तथा िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना एवं पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का पिरशीलन िकया।
8. मा० सवोर्च्च न्यायालय ने िशव प्रताप िसह उफर् िचनू (उपयुर्क्त) के मामले में उ० प्र० अिधिनयम, 1986 की मूलभूत वैधािनक संरचना का िवस्तृत परीक्षण करते हुए अपने उक्त िनणर्य के प्रस्तर सं० 43, 52 एवं 54 में िनम्नवत् प्रितपािदत िकया है:-
43. "....... what is obviously absent in the U.P. Act is a provision determining the offence as one created under the Act. After defining gang, which includes commission of the offences listed under sub-clauses (i) to (xxv) and defining gangster as a member or leader or organiser of a gang, the punishment is prescribed for a gangster without an offence being created by statute; which makes the penal act, stillborn."
"52.
Article 20(1) encapsulates the principle of "nullum crimen nulla poena sine lege", (No crime or punishment can exist without a penal law); there can be no punishment without an offence in law. As we found, the Act of 1986 does not create a crime/offence and it merely defines the status of a person indulging in a crime, specified in the definition clause, as a 'gangster' going by the definition of 'gang' and 'gangster' provided respectively under sub-sections (b) and (c) of Section 2. The status is also determined not by a procedure in the enactment but a prescription made in the Rules. The power to frame Rules is found from the Act, in Section 23, which enables the State Government to make rules for carrying out the purposes of this Act and to provide any contravention of the Rules to be punishable with a term of imprisonment not exceeding 6 months, with or without fine, NA528 No. 43426 of 2026 3
not exceeding Rs.1,000/-. The Rules provided for a Gang Chart to be prepared by the police, recommended through its hierarchy and approved in a joint meeting of the higher authorities of the Police and the head of the District Administration. The preparation of the Gang Chart and the involvement in a crime, as specified under the clauses of Section 2(b) determines the status of a person, as a gangster, for which punishment is prescribed, as we time and again observed in this very same judgment; without an offence being created."
"54. A 'gangster' is defined under the Act and the determination of who a gangster is, for the purpose of punishment, is as prescribed in the Rules, left to the ipsi dixit of the Executive. The creation of crime, or to make an act or omission subject to penal consequences as an offence, is essentially a legislative function and it cannot be thrown away and left to sprout in the thickets of subordinate legislation.
As we noticed, the provisions of the Act could lead to a detention of the accused without trial for long, which is akin to a statute enjoining preventive detention. Though preventive detention has been held to be permissible even in the teeth of Article 21, the same is hedged with safeguards, which are held to be sacrosanct and even a minor procedural violation would entail release of the detenu. The safeguards in preventive detention are numerous, since it is the subjective satisfaction of the Administration and the Police that leads to a detention, the period in which such detention continues being the exclusive premise of the State Government, who also has the authority to release the detenu at any point of time. The period provided in which such detention order has to be forwarded to the State Government; the materials to be supplied to the detenu; the right of representation to the various authorities, at every stage, as granted to the detenu; the reference to an Advisory Board constituted by statute and the decision to be arrived there at within a time frame, mitigates and erases to an extent the rigour & malice of subjectivity, which subjectivity pervades a preventive detention order. The subject enactment, the U.P. Act not only permits detention for a period without anything more than the inclusion in a Gang Chart but also enables a trial and punishment on the basis of the very same Gang Chart, in addition to the pre-trial incarceration, but without an NA528 No. 43426 of 2026 4
offence being created by the Act itself. It is akin to the English proverb: 'Give a dog a bad name and hang him". 9.
माननीय सवोर्च्च न्यायालय ने प्रामािणक रूप से यह प्रितपािदत िकया है िक उत्तर प्रदेश अिधिनयम, 1986 में ऐसी मूलभूत एवं अपूणीर्य वैधािनक त्रुिट िवद्यमान है, िजसमें धारा 3 के अंतगर्त "गैंगस्टर" होने मात्र के िलए दंडात्मक पिरणाम का प्रावधान िकया गया है, जबिक अिधिनयम के अंतगर्त िकसी स्वतंत्र मूल अपराध को वास्तव में अिधिनयिमत, सृिजत अथवा पिरभािषत नहीं िकया गया है। कायर्पािलका अथवा अधीनस्थ िनयमों के माध्यम से उस दंडनीय अपराध की पूित अथवा सृजन नहीं िकया जा सकता, िजसे मूल अिधिनयम द्वारा सृिजत ही नहीं िकया गया है। इसके अितिरक्त, ऐसे समग्र गैंग चाटर् की तैयारी, िजसमें िविभन्न मामलों को सामूिहक रूप से सिम्मिलत कर कायर्पािलका के अिधकािरयों द्वारा िनयिमत रूप से अनुमोिदत िकया जाता है, अपने आप में ऐसी अिभयोजन कायर्वाही को वैधता प्रदान नहीं कर सकती, िजसका आधार ही िविधक रूप से दोषपूणर् हो। जब मूल अिधिनयम में ही ऐसी वैधािनक कमी पाई गई है िजसके कारण उसके अंतगर्त व्यिक्तयों के िवरुद्ध धारा 2 एवं धारा 3 के आधार पर अिभयोजन को िविधसम्मत रूप से कायम नहीं रखा जा सकता, तब के वल िकसी अिभयुक्त का प्रशासिनक गैंग चाटर् में सिम्मिलत होना उसके िवरुद्ध आपरािधक िवचारण प्रारंभ करने अथवा जारी रखने का वैध आधार नहीं हो सकता। अतः माननीय सवोर्च्च न्यायालय द्वारा िशव प्रताप िसह उफर् िचनू (उपयुर्क्त) के मामले में प्रितपािदत िविध-व्यवस्था के आलोक में, आवेदक के िवरुद्ध अिधिनयम के प्रावधानों के अंतगर्त लंिबत आपरािधक कायर्वाही को िविध की दृिष्ट से बनाए रखना संभव नहीं है। उक्त कायर्वाही का कोई वैधािनक आधार शेष नहीं रह जाता और उसका जारी रहना िविधक प्रिक्रया का दुरुपयोग होगा। अतः आवेदकगण के िवरुद्ध उपरोक्त कायर्वाही को अपास्त िकया जाना न्यायोिचत है।
10. तद्नुसार, धारा 528 बी.एन.एस.एस. के अंतगर्त प्रस्तुत यह आवेदन पत्र स्वीकार िकया जाता है।
11.
उपयुर्क्त तकोर्ं, पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों, तथ्यों एवं िविधक पिरिस्थितयों के दृिष्टगत, मु०अ०सं० 133 वषर् 2020 अंतगर्त धारा 3(1) उ०प्र० िगरोहबंद एवं समाज िवरोधी िक्रयाकलाप ( िनवारण) अिधिनयम, थाना कोतवाली बांसी, िजला िसद्धाथर्नगर में प्रेिषत आरोपपत्र िदनांिकत 04.12.2020 से उद्भूत गैंगेस्टर परीक्षण सं० 1086, वषर् 2020 (राज्य बनाम िवनोद िसह एवं अन्य), जो अपर सत्र न्यायाधीश, एफ.टी.सी.-II/िवशेष न्यायाधीश (गैंगेस्टर एक्ट), िसद्धाथर्नगर के न्यायालय में लिम्बत है, की संपूणर् कायर्वाही अिभखंिडत (Quash) की जाती है।
12. हालांिक, यह स्पष्ट िकया जाता है िक इस आदेश का आवेदकगण के िवरुद्ध सामान्य दंड िविध के अंतगर्त लंिबत मूल/आधारभूत मुकदमों में चल रहे िकसी भी िवचारण, िववेचना अथवा अन्य कायर्वाही पर कोई प्रितकू ल प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही यह आदेश उन्हें बािधत या पूवार्ग्रिहत NA528 No. 43426 of 2026 5
करेगा। उक्त मूल/आधारभूत मामलों में कायर्वाही िविध के अनुसार अपने स्वतंत्र गुण-दोष के आधार पर अपने तािकक िनष्कषर् तक जारी रहेगी। October 7, 2026 CP.sahani NA528 No. 43426 of 2026 6 (Dr. Gautam Chowdhary,J.) Digitally signed by :- CHANDRA PRAKASH SAHANI High Court of Judicature at Allahabad