Research › Search › Judgment

Allahabad High Court · body

2026 DAILYLAW 10360 (ALL)

SUMIT SHUKLA AND 4 OTHERS v. STATE OF U.P. AND ANOTHER

NA528/34077/2026 · 2026-09-27

Saurabh Srivastava

body2026

Judgment text

Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 34077 of 2026 Court No. - 79 HON'BLE SAURABH SRIVASTAVA, J. 1. आवेदकगण की िवद्वान अिधवक्ता ऋचा श्रीवास्तव एवं राज्य की तरफ से िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन िकया गया। 2. आवेदकगण की ओर से धारा 528 बी.एऩ.एस.एस. के अन्तगर्त यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 0506/2024 (State vs. Sumit Shukla and others), अन्तगर्त धारा 147, 352, 504, 506, 465, 447, 448, 427 भा.दं.सं., थाना नौबस्ता, िजला कानपुर नगर, जो िवद्वान िवशेष मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट, कानपुर नगर के न्यायालय में लिम्बत है, में प्रेिषत आरोपपत्र िदनांिकत 24.08.2025 एवं प्रसंज्ञान/तलबी आदेश िदनांिकत 03.04.2026 की कायर्वाही को अपास्त िकये जाने हेतु योिजत िकया गया है। 3. आवेदकगण की ओर से िवद्वान अिधवक्ता द्वारा एकमात्र कथन िकया गया है िक आरोप-पत्र में आवेदकगण को भारतीय दण्ड संिहता की धारा 447 के अंतगर्त आरोिपत िकया जाना िविध- िवरुद्ध है, क्योंिक उत्तर प्रदेश संशोधन अिधिनयम, 1961 द्वारा िकए गए संशोधन के पिरप्रेक्ष्य में धारा 447 भारतीय दण्ड संिहता के अंतगर्त अिभयोजन हेतु पूवर् सूचना िदया जाना अिनवायर् है। अपने तकर् के समथर्न में िवद्वान अिधवक्ता ने इस न्यायालय द्वारा प्राथर्नापत्र अंतगर्त धारा 482 दं.प्र.सं. संख्या-1421/2004, (Rahtu Lal @ Rahtu Ram @ Divyanand & Others Vs. State of U.P. & Another) में पािरत िनणर्य की तरफ न्यायालय का ध्यान आकृ ष्ट िकया है। उक्त िनणर्य का प्रासंिगक अंश िनम्नवत् उद्धृत हैः- "5.7 In the above facts and circumstances, applicants cannot be termed as trespassers nor they can be tried under the provisions of Section 447 I.P.C., because no offence under that section is made out against the applicants. Since notice under amended Section 441 I.P.C. is mandatory requirement but the same has not been completed, because no notice under Section 441 I.P.C. is ever sent to applicants. Due to non compliance of this mandatory provision, offence of "criminal trespass" which has been defined in Section Versus Counsel for Applicant(s) : Richa Srivastav Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Sumit Shukla And 4 Others .....Applicant(s) State of U.P. and Another .....Opposite Party(s) 441 I.P.C. has not been made out, therefore, charge sheet filed against applicants under Section 447 I.P.C. is legally not sustainable." 4. इसके िवपरीत, िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता ने आवेदकगण की ओर से प्रस्तुत उक्त कथन का प्रबलतापूवर्क िवरोध करते हुए कथन िकया िक संशोिधत धारा 441 भारतीय दण्ड संिहता के अंतगर्त सूचना न िदए जाने के प्रभाव का परीक्षण सक्षम िवचारण न्यायालय द्वारा िकया जाना अपेिक्षत है तथा आवेदकगण को सक्षम न्यायालय के समक्ष उन्मोचन (discharge) हेतु प्राथर्नापत्र प्रस्तुत करने की िविधक स्वतंत्रता उपलब्ध है। 5. चूँिक आवेदकगण की ओर से एक िविधक प्रश्न उद्धृत िकया गया है, अतः िवपक्षी संख्या-2 को नोिटस जारी करने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती है। 6. पक्षकारों की ओर से प्रस्तुत परस्पर िवरोधी तकोर्ं के समुिचत परीक्षण हेतु संशोिधत धारा 441 एवं धारा 447 भारतीय दण्ड संिहता प्रासंिगक हैं। उक्त धाराएँ िनम्नवत् हैं:- "441. Criminal trespass. Whoever enters into or upon property in possession of another with intent to commit an offence or to intimidate, insult or annoy any person in possession of such property or, having lawfully entered into or upon such property, unlawfully remains there with intent thereby to intimidate, insult or annoy any such person, or with intent to commit an offence, or, having entered into or upon such property, whether before or after the coming into force of the Criminal Law (I.P. Amendment) Act, 1961, with the intention of taking unauthorised possession or making unauthorised use of such property fails to withdraw from such property, or its possession or use when called upon to do so by that another person by notice in writing, duly served upon him, by the date specified in the notice, is said to commit "criminal trespass" "447. Punishment for criminal trespass. Whoever commits criminal trespass shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three months, or with fine which may extend to five hundred rupees, or with both." 7. उपयुर्क्त संशोिधत धारा 441 भारतीय दण्ड संिहता के अवलोकन से यह स्पष्ट है िक यिद कोई व्यिक्त िकसी अन्य व्यिक्त की संपित्त में, दण्ड िविध (उत्तर प्रदेश संशोधन) अिधिनयम, 1961 के लागू होने से पूवर् अथवा उसके पश्चात्, अनिधकृ त कब्जा करने अथवा उक्त संपित्त का अनिधकृ त उपयोग करने के आशय से प्रवेश करता है तथा उक्त संपित्त अथवा उसके कब्जे या उपयोग से उस समय तक हटने में असफल रहता है, जब तक िक संपित्त के कब्जाधारी अन्य व्यिक्त द्वारा उसे िविधवत् तामील की गई िलिखत सूचना के माध्यम से िनिदष्ट ितिथ तक हट जाने के िलए नहीं कहा जाता, तब ही उक्त कृ त्य को 'आपरािधक अितचार' की श्रेणी में रखा जा सकता है। NA528 No. 34077 of 2026 2 8. वतर्मान प्रकरण में यह िनिववाद है िक िवपक्षी संख्या-2 द्वारा आवेदकों को संशोिधत धारा 441 भारतीय दण्ड संिहता में अपेिक्षत ऐसी कोई िलिखत सूचना नहीं दी गई, िजसके द्वारा उन्हें किथत रूप से िवपक्षी संख्या-2 की संपित्त मानी गई भूिम से अथवा उसके कब्जे या उपयोग से हटने के िलए कहा गया हो। फलतः आवेदकगण के समक्ष ऐसी िकसी सूचना का अनुपालन करने का अवसर ही उत्पन्न नहीं हुआ और न ही सूचना में िनिदष्ट ितिथ तक उससे अनुपालन न करने का प्रश्न उत्पन्न होता है। ऐसी िस्थित में आवेदकगण के िवरुद्ध 'आपरािधक अितचार' का अपराध गिठत नहीं कहा जा सकता। इन तथ्यों एवं िविधक िस्थित की उपेक्षा करते हुए आवेदक के िवरुद्ध भारतीय दण्ड संिहता की धारा 447 के अंतगर्त आरोप-पत्र प्रस्तुत िकया गया तथा सक्षम न्यायालय द्वारा उक्त अपराध का संज्ञान िलया गया, जो िविधक दृिष्ट से पोषणीय नहीं है। 9. तद्नुसार, वतर्मान आवेदकगण के िवरुद्ध मात्र अंतगर्त धारा 447 भा.दं.सं. के पिरप्रेक्ष्य में पािरत आदेश िदनांिकत 03.04.2026, एतद्द्वारा अपास्त िकया जाता है। 10. जहाँ तक भारतीय दण्ड संिहता की धारा 147, 352, 504, 506, 465, 448, 427 के अंतगर्त अपराध का प्रश्न है, वह िवचारण का िवषय है। अतः सक्षम िवचारण न्यायालय को िनदेर्िशत िकया जाता है िक वह आवेदकगण के िवरुद्ध अंतगर्त धारा 147, 352, 504, 506, 465, 448, 427 भारतीय दण्ड संिहता के संबंध में अिग्रम कायर्वाही जारी रखेंगे, िकन्तु धारा 447 भारतीय दण्ड संिहता के संबंध में आवेदकगण के िवरुद्ध आगे कोई कायर्वाही नहीं की जाएगी। 11. उपयुर्क्त िटप्पणी के साथ, वतर्मान प्राथर्नापत्र आंिशक रूप से स्वीकार िकया जाता है। September 28, 2026 Pawan Kumar NA528 No. 34077 of 2026 3 (Saurabh Srivastava,J.) Digitally signed by :- PAWAN KUMAR High Court of Judicature at Allahabad