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Allahabad High Court · body

2026 DAILYLAW 10237 (ALL)

CHANDRAWATI DEVI @ CHANARAUTA v. STATE OF U.P. AND ANOTHER

NA528/34086/2026 · 2026-09-27

Saurabh Srivastava

body2026

Judgment text

Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD APPLICATION U/S 528 BNSS No. - 34086 of 2026 Court No. - 79 HON'BLE SAURABH SRIVASTAVA, J. 1. आवेिदका के िवद्वान अिधवक्ता, िवपक्षी सं० 2 के िवद्वान अिधवक्ता एवं राज्य की तरफ से िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता को सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन िकया गया। 2. आवेिदका की ओर से धारा 528 बी.एऩ.एस.एस. के अन्तगर्त यह आवेदन पत्र, मु०अ०सं० 436/2025 से उद्भूत दािण्डक वाद सं० 478/2026 (State vs. Chandrawati Devi), अन्तगर्त धारा 316(2) बी.एन.एस., थाना बांसगांव, िजला गोरखपुर, जो िवद्वान अपर मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट, बांसगांव गोरखपुर के न्यायालय में लिम्बत है, में प्रेिषत आरोपपत्र िदनांिकत 18.09.2025 एवं प्रसंज्ञान/तलबी आदेश िदनांिकत 24.03.2026 की कायर्वाही को अपास्त िकये जाने हेतु योिजत िकया गया है। 3. आवेिदका के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा कथन िकया गया िक िवपक्षी संख्या 2 द्वारा आवेिदका को के वल प्रतािड़त करने के उद्देश्य से वतर्मान प्रकरण में झूठा एवं दुभार्वनापूणर् ढंग से अिभयुक्त बनाया गया है, जबिक आवेिदका द्वारा उक्त आरोिपत अपराध कािरत नहीं िकया गया है। आवेिदका के िवद्वान अिधवक्ता का यह भी तकर् है िक प्रस्तुत िववाद मूलतः दीवानी प्रकृ ित का है, िवपक्षी संख्या-2 द्वारा उसे िसफर् अनुिचत उद्देश्य से, ब्लैकमेल करने, उत्पीिड़त करने तथा धन की अवैध वसूली करने के उद्देश्य से वतर्मान मामले में झूठा फँ साया गया है। वास्तिवक तथ्य यह है िक आवेिदका एक अिशिक्षत एवं श्रिमक वगर् से संबंिधत मिहला है। वह दैिनक मजदूरी करके अपना एवं अपने पिरवार का जीवन-यापन करती है तथा मनरेगा योजना के अंतगर्त मजदूरी करती रही है। पूवर्वतीर् ग्राम पंचायत चुनाव में अिभयोजन साक्षी िवकास िसह की पत्नी ग्राम प्रधान थीं। िवकास िसह ने ही आवेिदका का बैंक खाता खुलवाने में भी सहायता की थी, तािक मनरेगा योजना के अंतगर्त प्राप्त होने वाली मजदूरी की धनरािश उसके खाते में स्थानांतिरत की जा सके । िवकास िसह द्वारा सूचनाकतार् से उपरोक्त िववािदत धनरािश आवेिदका के बैंक खाते में स्थानांतिरत करवा दी। आवेिदका के बैंक खाते का िववरण िवकास Versus Counsel for Applicant(s) : Gopal Das Srivastava Counsel for Opposite Party(s) : Ajit Kumar Mishra, Atul Kumar Shahi, G.A. Chandrawati Devi @ Chanarauta .....Applicant(s) State of U.P. and Another .....Opposite Party(s) िसह के पास पूवर्वतीर् ग्राम पंचायत कायर्काल के दौरान ही उपलब्ध था। उक्त धनरािश स्थानांतिरत िकए जाने के पश्चात िवकास िसह ने आवेिदका से संपकर् कर उसे बताया िक उसके िमत्र ने अपनी आवश्यकता के िलए उक्त धनरािश आवेिदका के बैंक खाते में स्थानांतिरत की है और आवेिदका से उक्त धनरािश बैंक से िनकालकर उसे नकद रूप में सौंपने के िलए कहा। अिग्रम आवेिदका के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा कथन िकया गया िक आवेिदका द्वारा अपने खाते में धनरािश रु० 1,00,000/- प्राप्त की गयी थी, िकन्तु उसके द्वारा िवकास िसह को उक्त धनरािश नकद रूप में वापस कर दी गयी है। सूचनाकतार् िकसी दूरस्थ ग्राम का िनवासी है तथा आवेिदका से उसकी जान-पहचान नहीं है। अतः आवेिदका द्वारा उसके घर जाकर उपचार हेतु धनरािश की मांग िकए जाने का कोई अवसर ही उत्पन्न नहीं होता। आवेिदका के िवद्वान अिधवक्ता ने आगे तकर् प्रस्तुत िकया िक दीवानी िववाद को आपरािधक रूप प्रदान करते हुए तथा आवेिदका पर अनुिचत दबाव बनाने एवं उसे प्रतािड़त करने के उद्देश्य से िवपक्षी संख्या 2 द्वारा उसे वतर्मान आपरािधक वाद में अिभयुक्त बनाया गया है। यह भी कथन िकया गया िक किथत घटना के संबंध में आवेिदका के िवरुद्ध ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, िजससे उसके िवरुद्ध लगाए गए आरोपों की पुिष्ट हो सके । आवेिदका के िवद्वान अिधवक्ता ने यह भी तकर् प्रस्तुत िकया िक िनष्पक्ष एवं समुिचत िववेचना िकए िबना ही संबंिधत िववेचक द्वारा आवेिदका के िवरुद्ध आरोप-पत्र प्रस्तुत कर िदया गया, िजस पर संबंिधत िवचारण न्यायालय ने न्याियक िववेक का समुिचत प्रयोग िकए िबना संज्ञान िलया। अतः उक्त कायर्वाही िविध की प्रिक्रया का दुरुपयोग है और न्यायिहत में आरोप-पत्र, संज्ञान आदेश तथा तत्संबंधी समस्त कायर्वाही को िनरस्त िकया जाना न्यायोिचत है। 4. इसके िवपरीत, िवपक्षी संख्या 2 के िवद्वान अिधवक्ता तथा िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता ने आवेिदका द्वारा प्रस्तुत प्राथर्नापत्र का प्रबल िवरोध करते हुए कथन िकया है िक आवेिदका की ओर से उठाए गए प्रश्न वस्तुतः िववािदत तथ्यों से संबंिधत हैं, िजनके िनराकरण हेतु साक्ष्यों का मूल्यांकन अपेिक्षत होगा। यह भी तकर् प्रस्तुत िकया गया िक संज्ञान िलये जाने के स्तर पर न्यायालय द्वारा प्रथमदृष्टया मामला िवद्यमान है अथवा नहीं, मात्र इस पर िवचार करना होता है तथा इस स्तर पर न्यायालय से लघु िवचारण (Mini Trial) िकए जाने की अपेक्षा नहीं की जाती है। 5. उभयपक्ष के िवद्वान अिधवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत परस्पर िवरोधी तकोर्ं पर िवचार करने तथा अिभलेख पर उपलब्ध समस्त साक्ष्यों के अवलोकन के पश्चात् यह स्पष्ट है िक आवेिदका के िवरुद्ध लगाए गए आरोप मूलतः िववािदत धनरािश की देयता अथवा वसूली का िनधार्रण सक्षम दीवानी न्यायालय द्वारा िकया जाना प्रासंिगक है। उभयपक्ष के मध्य वास्तिवक धनरािश के लेन- देन का िववाद मूलतः दीवानी प्रकृ ित का है, िजसे आपरािधक रूप प्रदान िकया गया है। माननीय सवोर्च्च न्यायालय ने A.M. Mohan Vs. State Represented by SHO and another, [2024 SCC OnLine SC 339] के मामले में यह प्रितपािदत िकया है िक िवशेष रूप से दीवानी प्रकृ ित के वाद को आपरािधक प्रकरण में पिरवितत करने की प्रवृित्त NA528 No. 34086 of 2026 2 िनरंतर बढ़ रही है। इसी प्रकार, G. Sagar Suri Vs. State of U.P., [(2000) 2 SCC 636] के मामले में माननीय सवोर्च्च न्यायालय द्वारा की गई िनम्निलिखत िटप्पिणयां भी इस संदभर् में प्रासंिगक हैं, जो िनम्नवत् हैं:- "8. It is to be seen if a matter, which is essentially of a civil nature, has been given a cloak of criminal offence. Criminal proceedings are not a short cut of other remedies available in law. Before issuing process a criminal court has to exercise a great deal of caution. For the accused it is a serious matter. This Court has laid certain principles on the basis of which the High Court is to exercise its jurisdiction under Section 482 of the Code. Jurisdiction under this section has to be exercised to prevent abuse of the process of any court or otherwise to secure the ends of justice." 6. इस संदभर् में माननीय सवोर्च्च न्यायालय द्वारा Naresh Kumar and another Vs. The State of Karnataka and another, [2024 INSC 196] में पािरत िनणर्य के िनम्निलिखत अनुच्छेद का उल्लेख करना समीचीन होगा, िजसमें समान पिरिस्थितयों में िनिहत अिधकािरता का प्रयोग िकए जाने के संबंध में िविधक िस्थित प्रितपािदत की गई है। जो िनम्नवत् हैः- "6. In the case of Paramjeet Batra v. State of Uttarakhand (2013) 11 SCC 673, this Court recognized that although the inherent powers of a High Court under Section 482 of the Code of Criminal Procedure should be exercised sparingly, yet the High Court must not hesitate in quashing such criminal proceedings which are essentially of a civil nature. This is what was held: "12. While exercising its jurisdiction under Section 482 of the Code the High Court has to be cautious. This power is to be used sparingly and only for the purpose of preventing abuse of the process of any court or otherwise to secure ends of justice. Whether a complaint discloses a criminal offence or not depends upon the nature of facts alleged therein. Whether essential ingredients of criminal offence are present or not has to be judged by the High Court. A complaint disclosing civil transactions may also have a criminal texture. But the High Court must see whether a dispute which is essentially of a civil nature is given a cloak of criminal offence. In such a situation, if a civil remedy is available and is, in NA528 No. 34086 of 2026 3 fact, adopted as has happened in this case, the High Court should not hesitate to quash the criminal proceedings to prevent abuse of process of the court." 7. उपयुर्क्त िविधक िस्थित पर इस न्यायालय की समकक्ष न्यायपीठ द्वारा Kamlesh Singh Vs. State of U.P. and others [(2024) 6 ILRA 15] के मामले में भी िनणर्य प्रितपािदत िकया जा चुका है। 8. प्रस्तुत प्रकरण में इस न्यायालय द्वारा भारतीय नागिरक सुरक्षा संिहता, 2023 की धारा 528 के अंतिनिहत अिधकािरता का प्रयोग करते हुए प्रश्नगत आरोप-पत्र तथा उसके आधार पर पािरत संज्ञान/समन आदेश तथा वतर्मान वाद की समस्त कायर्वाही को िनरस्त िकया जाना न्यायोिचत होगा। चूंिक वतर्मान वाद उभयपक्ष के मध्य पैसों के लेन-देन से संबंिधत है तथा उभयपक्ष के मध्य िववाद मूलतः धनरािश के लेन-देन एवं उसकी वसूली से संबंिधत है। िववािदत धनरािश की देयता अथवा वसूली का िनधार्रण साक्ष्य के आधार पर सक्षम दीवानी न्यायालय द्वारा िकया जाना अपेिक्षत है। अतः धनरािश की वसूली हेतु सक्षम न्यायालय के समक्ष िववािदत धनरािश की वसूली हेतु (Money Recovery Suit) संिस्थत िकया जाना उपयुक्त िविधक उपचार होगा। महज धनरािश की वसूली से संबंिधत दीवानी वाद को, मात्र आवेिदका को प्रतािड़त करने के उद्देश्य से आपरािधक रूप नहीं िदया जा सकता। 9. उपयुर्क्त तथ्यों, पिरिस्थितयों एवं माननीय सवोर्च्च न्यायालय द्वारा प्रितपािदत िविध-िसद्धांतों के आलोक में, मु०अ०सं० 436/2025 से उद्भूत दािण्डक वाद सं० 478/2026 (State vs. Chandrawati Devi), अन्तगर्त धारा 316(2) बी.एन.एस., थाना बांसगांव, िजला गोरखपुर, जो िवद्वान अपर मुख्य न्याियक मिजस्ट्रेट, बांसगांव गोरखपुर के न्यायालय में लिम्बत है, में प्रेिषत आरोपपत्र िदनांिकत 18.09.2025 एवं प्रसंज्ञान/तलबी आदेश िदनांिकत 24.03.2026 की कायर्वाही को अपास्त िकया जाता है। 10. तदनुसार, वतर्मान प्राथर्नापत्र अंतगर्त धारा 528 बी.एन.एस.एस. स्वीकार िकया जाता है। September 28, 2026 Pawan Kumar NA528 No. 34086 of 2026 4 (Saurabh Srivastava,J.) Digitally signed by :- PAWAN KUMAR High Court of Judicature at Allahabad