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High Court of Chhattisgarh · body

2025 DAILYLAW 48892 (CHH)

GANESH KUMAR SAKAT v. STATE OF CHHATTISGARH

ACQA/431/2025 · 2025-12-07

Shri Sanjay Kumar Jaiswal

body2025

Judgment text

Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.

1 / 5 {Acq. A. No.-431 of 2025} 2025:CGHC:59471 अप्रतिवेद्य छत्ती सगढ़ उच्च न्यायालया , तिलसपुर दोषमुति अपु ल क्रमु!क -431 /2025  गणेश क मुर सक तिपु-चरमु सक, उम्र-लगभग 49 वेष0, ति1वेस -झाफल, जि5ल-मु!गल , छत्ती सगढ़ -----अपु लर्थी7/तिशकयाक0 तिवेरूद्घ 1. छत्ती सगढ़ रज्या, द्वार जि5ल दोण्डाजि>कर , मु!गल , जि5ल-मु!गल , छत्ती सगढ़, (रज्या) 2. 5या! उफ0 5यान्द्र जिस!ह र5पुC तिपु-स्वेग7या रक श र5पुC, उम्र-लगभग 24 वेष0, ति1वेस -झाफल, पुजिलस र्थी1-लरमु , जि5ल-मु!गल , छत्ती सगढ़ (अतिभया) -----उत्तीरवेदो गणे अपु लर्थी7/तिशकयाक0 द्वार : श्री र5न्द्र पुटेल, अजि>वे । रज्या/उत्तीरवेदो क्रमु!क-1 : श्री गरलल उईक , पुJ1ल अजि>वे । अतिभया/उत्तीरवेदो क्रमु!क-2 : सCच1 प्रतिष 1हK मु11 या न्यायामुCति0 श्री स!5या क मुर 5यासवेल , न्याया> श !! ति1णे0या पु ठ पुर पुरिर !! 08/12/2025 1. अपु ल कP ग्राह्य पुर स1 गया । POMAN DEWANGAN Digitally signed by POMAN DEWANGAN Date: 2025.12.08 14:09:30 +0530 2 / 5 {Acq. A. No.-431 of 2025} 2. प्रकरणे क थ्या स!क्षेपु मुU इस प्रकर हW तिक कतिमु1 घेल कल स!कया मुU स्1क तिद्वा या वेष0 कP छत्रा र्थी और अतिभया 5या! क सर्थी प्रमु-स!!> मुU र्थी । दो1[ ह ग्रामु झाफल, र्थी1 लरमु , जि5ल मु!गल (छत्ती सगढ़) क ति1वेस र्थी र्थी उ1क मुक1 एक-दोCसर क लगभग आमु1-समु1 स्थिस्र्थी र्थी । तिदो1!क 26 अप्रJल 2021 क अतिभया 5या! 1 कतिमु1 घेल स तिवेवेह कर1 स इ!कर कर तिदोया । इसस क्षेब्> एवे! मु1जिसक रूपु स व्याजिर्थी हकर कतिमु1 घेल अतिभया क घेर पुहbcच और वेहc स्वेया! पुर तिमुट्टी -ल उड़ेलकर आग लग ल । उसक पुरिर51[ द्वार उस त्कल उपुचर ह शसकPया तिचतिकत्सलया, लरमु ल 5या गया । शसकPया तिचतिकत्सक पुष्पुल जिस!ह जिसदोर (अ.स.-12) द्वार घेटे1 कP सCच1 र्थी1 लरमु क तिदोए 51 पुर सहयाक उपुति1र क्षेक कi ष्णेपुल 5यासवेल (अ.स.-9) अस्पुल पुहbcच और कतिमु1 घेल क या1 जिलया । उसक तिचतिकत्सकPया पुर क्षेणे एवे! उपुचर कP कया0वेह करई गई । तिचतिकत्सक द्वार उस कर्थी1 दो1 याग्या पुए 51 पुर 1या हस लदोर मुहश्वेर जिस!ह (अ.स.-5) 1 उसक मुiत्या-कजिलक कर्थी1 (प्रदोश0 पु -7) तिवेजि>वे अतिभजिलजिm तिकया । कतिमु1 घेल लगभग 80 स 90 प्रतिश क ( 1 स चर तिडाग्रा ) क 5ल चकP र्थी । उपुचर क दोnर1 उसकP मुiत्या ह 51 पुर मुग0 कयामु तिकया गया, शवे-पु!च1मु Jयार तिकया गया र्थी शवे क पुर क्षेणे करया गया । घेटे1-स्र्थील क 1क्श Jयार तिकया गया, सतिक्षेया[ क कर्थी1 जिलए गए, र्थी मुग0-5cच क उपुर! अपुर> पु!5 द्ध तिकया गया । मुnक स तिमुट्टी -ल क तिडाब्, मुतिचस कP तिडाब् एवे! तितिqयाc, अ>5ल र आतिदो वेस्ओं! कP 5ब् कP गई । मुiक कतिमु1 घेल क कमुर स आ> पुiष्ठ क मुiत्या-कजिलक पुत्रा (प्रदोश0 पु -26) क प्रदोश0 पु -20 क अ1सर 5ब् तिकया गया । उसक हस्लm क 1मुC1 वेल पु!5 भ 3 / 5 {Acq. A. No.-431 of 2025} 5ब् कर र5कPया दोस्वेज़ पुर क्षेक स पुर क्षेणे करया गया, जि5समुU दो1[ लm एक ह व्याति द्वार जिलm पुए गए । स!पुCणे0 तिवेवेच1 उपुर! अतिभयाग-पुत्रा प्रस् तिकया गया । 3. आरपु प्रमुणे1 ह अतिभया51 पुक्षे द्वार अपु1 समुर्थी01 मुU 15 सतिक्षेया[ क पुर क्षेणे करया गया र्थी 26 दोस्वे5 प्रदोश0 तिचन्ह!तिक करया गया । >र 313 दोण्डा प्रतिक्रया स!तिह क अ!ग0 अपु1 कर्थी1 मुU अतिभया 1 अतिभया51 सतिक्षेया[ क तिवेपुर कर्थी1[ स इ!कर कर हbए कह तिक उस झाCठ फc सया गया हJ और वेह ति1दोuष हJ । चवे पुक्षे द्वार उस गcवे क ति1वेस स!5या जिस!ह र5पुC (.स.–1) क पुर क्षेणे करया गया । उभयापुक्षे क स11 क उपुर! तिवेचरणे न्यायालया 1 याह पुया तिक कतिमु1 घेल कP मुiत्या आत्मुहत्यात्मुक हJ, तिकन् र5कPया दोस्वे5 पुर क्षेक क पुर क्षेणे 1 ह1 स कजिर्थी पुत्रा प्रमुतिणे 1हK पुया गया । अन्या सक्ष्या क आ>र पुर भ याह प्रमुतिणे 1हK पुया गया तिक अतिभया, मुiक स प्रमु कर र्थी अर्थीवे कतिमु1 घेल क आत्मुहत्या क जिलए दोष्प्ररिर तिकया र्थी । उ आ>र पुर तिवेचरणे न्यायालया 1 “प्रश्1> 1 ति1णे0या” पुरिर कर हbए अतिभया क >र 306 भर या दोण्डा स!तिह क अपुर> स दोषमु तिकया, जि5स दोषमुति क इस अपु ल मुU च1n दो गई हJ । 4. न्यायादृष्टां! Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 मुU मु11 या उच्चमु न्यायालया द्वार दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रस् अपु ल क ति1रकरणे ह क छ न्यातियाक जिसद्घ! प्रतिपुतिदो तिकए गए हW 5 कस्थिण्डाक-42 मुU ति1म्11सर हJ}- “42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the promise that no innocent shall be condemned as guilty. All the safeguards and the jurisprudential values of criminal 4 / 5 {Acq. A. No.-431 of 2025} law, are intended to prevent any failure of justice. The principles which come into play while deciding an appeal from acquittal could be summarised as: (i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary; (ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge; (iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed; (iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal; (v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts; (vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, perversity or error of law or fact in the decision of the trial court.” 5. उपुर न्यायादृष्टां! क प्रकश मुU, अतिभलm क स!पुCणे0 पुरिरश ल1 र्थी सक्ष्या क मुCल्या!क1 स याह थ्या स्पुष्टां हJ तिक कतिमु1 घेल 1 आत्मुहत्या कP र्थी । 1या हस लदोर मुहश्वेर जिस!ह (अ.स.–5) द्वार दो50 मुiत्याकजिलक कर्थी1 मुU याह अवेश्या उqजिm हJ तिक मुiक 1 आत्मुहत्या क जिलए अतिभया 5या! क उत्तीरदोया या हJ, तिकन् प्रदोश0 पु –7 मुरणेसन्न कर्थी1 मुU कहK भ याह उqm 1हK तिमुल तिक अतिभया 5या! भ उसस प्रमु कर र्थी या 5 / 5 {Acq. A. No.-431 of 2025} उस1 ऐस क्या दोष्प्ररणे कi त्या तिकया ह, 5 उस आत्मुहत्या क जिलए उकस1 कP श्रीणे मुU आ ह । अर्थी0•, अतिभया क ऐस कई आपुरजि>क कi त्या वेतिणे0 1हK हJ, जि5सक आ>र पुर याह ति1ष्कष0 ति1कल 5 सक तिक कतिमु1 घेल क आत्मुहत्या क जिलए दोष्प्ररिर कर1 क जिलए अतिभया 5या! उफ0 5यान्द्र जिस!ह र5पुC तिवेजि>क रूपु स उत्तीरदोया हJ । इसक अलवे दोष्प्ररणे क अन्या सक्ष्या भ उपुलब्> 1हK हJ । 6. न्यायादृष्टां! क प्रकश मुU उपुर सक्ष्या तिवेवेच1 क फलस्वेरूपु याह न्यायालया पु हJ तिक तिवेचरणे न्यायालया द्वार 5 दोषमुति क ति1ष्कष0 अ!तिक तिकया गया हJ वेह अतिभलm मुU उपुलब्> थ्या और सक्ष्या क तिवेपुर या तिवेर>भस 1हK हJ र्थी प्रश्1> 1 दोषमुति क ति1णे0या मुU कई अवेJ> या अशद्घ पुरिरलतिक्षे 1हK ह । इसजिलए उसमुU हस्क्षेपु कP आवेश्याक 1हK पुया 5 । 7. अ} दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रस् याह अपु ल ग्राह्य याग्या 1 ह1 स प्रर!तिभक स्र पुर mरिर5 कP 5 हJ । 8. ति1णे0या कP प्रतिजिलतिपु क सर्थी तिवेचरणे न्यायालया क अतिभलm श घ्रपुCवे0क वेपुस प्रतिष ह । सह /- (स!5या क मुर 5यासवेल) न्याया> श पुमु1