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High Court of Chhattisgarh · body
2025 DAILYLAW 48720 (CHH)
PRADEEP KUMAR ANANT v. STATE OF CHHATTISGARH
ACQA/185/2024 · 2025-12-04
Shri Sanjay Kumar Jaiswal
body2025
[ 2025 DAILYLAW 48720 (CHH) · dailylaw.ai ]
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Judgment text
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1 / 8 {Acq. A. No.-185 of 2024}
2025:CGHC:59245 अप्रतिवेद्य छत्ती सगढ़ उच्च न्यायालया
, तिलसपुर
दोषमुति
अपु ल क्रमु!क
-185
/2024
प्रदो पु क मुर अनं! तिपु-शुभरमु अनं!, उम्र-लगभग 36 वेष1, तिनंवेस -पुमुगढ़, पुलिलस थानं वे हस ल-पुमुगढ़, लि5ल-5!5ग र चम्पु, छत्ती सगढ़ -----अपु लथा7/प्रथा7 तिवेरूद्घ
1. छत्ती सगढ़ रज्या, द्वार पुलिलस थानं-अनंस<तिच 5ति कल्याण, 5!5ग र, लि5ल- 5!5ग र चम्पु, छत्ती सगढ़ । (रज्या)
2. इमुरनं खानं तिपु-न्ने खानं, उम्र-लगभग 39 वेष1, (अतिभया)
3. पुरवे5 खानं तिपु-न्ने खानं, उम्र-लगभग 64 वेष1, (अतिभया) उत्तीरवेदो क्रमु!क-2 एवे! 3 तिनंवेस -मुस्जिH5दो रड, वेड1 नं!र 7, अकलर, पुलिलस थानं-अकलर, लि5ल-5!5ग र चम्पु, छत्ती सगढ़ -----उत्तीरवेदो गण अपु लथा7/प्रथा7 द्वार : श्री तिवेकस क मुर पुण्डया, अलिNवे । रज्या/उत्तीरवेदो क्रमु!क-1 : श्री एच.ए.पु .एस. भतिPया, पुQनंल अलिNवे । अतिभया/उत्तीरवेदो क्रमु!क-2 एवे! 3 द्वार : श्री मुनं5 क मुर लिसन्ह, अलिNवे । मुनंनं या न्यायामु<ति1 श्री स!5या क मुर 5यासवेल
, न्यायाN शु
POMAN DEWANGAN Digitally signed by POMAN DEWANGAN Date: 2025.12.06 12:29:21 +0530
2 / 8 {Acq. A. No.-185 of 2024} !! तिनंण1या पु ठ पुर पुरिर !! 05/12/2025
1. Nर 14(क)( ) i अनंस<तिच 5ति एवे! अनंस<तिच 5नं5ति (अत्याचर तिनंवेरण) अलिNतिनंयामु, 1989 (लि5स आग स!क्षेपु मुX "तिवेशुष अलिNतिनंयामु" कह गया हQ) क ह दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रH इस अपु ल मुX तिवेचरण न्यायालया-तिवेशुष न्यायाN शु, 5!5ग र, लि5ल-5!5ग र चम्पु, छत्ती सगढ़ द्वार तिवेशुष सत्र प्रकरण क्रमु!क-09/2022
“छत्ती सगढ़ रज्या तिवेरूद्घ इमुरनं खानं वे एक अन्या” मुX पुरिर तिनंण1या तिदोनं!क-16/10/ 2023 क उस अ!शु क चनं] दो गई हQ लि5सक ह अतिभयागण क Nर-506 (भग-दो) भर या दोण्ड स!तिह एवे! Nर-3(1)(दो)(N) तिवेशुष अलिNतिनंयामु क अपुरN स दोषमु तिकया गया । लि5स आग स!क्षेपु मुX “प्रश्नंN नं तिनंण1या” स स!लिN तिकया 5 रह हQ ।
2. याह उल्लेखानं या थ्या हQ तिक उ तिनंण1या क ह अतिभयागण क तिवेचरण न्यायालया द्वार Nर-294 भर या दोण्ड स!तिह क अपुरN मुX दोषलिसतिb कर 5,000/-रूपुया क अथा1दोण्ड स दोस्जिण्ड तिकया गया था ।
3. अतिभया5नं क मुमुल स!क्षेपु मुX इस प्रकर हQ तिक अतिभया इमुरनं खानं क कया1पुलनं अतिभया!, 5ल स!सNनं स!भग 5!5ग र (मुख्यालया चम्पु) द्वार ग्रामु पु!चया भ<ईग!वे स्जिHथा 5मुतिनंया नंल मुX एनं कP तिनंमु1ण क ठक प्रप्त हfआ था । अतिभया इमुरनं खानं नं प्रथा7 प्रदो पु क मुर अनं!
(अ.स.–5) स कह तिक वेह उ कया1 क पुP ठक पुर कर ल, लि5स पुर प्रथा7 नं सहमुति व्या कi । अतिभया नं आश्वेसनं तिदोया तिक तिल प्रप्त हनं पुर वेह रतिशु क समुया पुर भगनं कर दोग । तिनंमु1ण कया1 लगभग 50% पु<ण1 ह चक था
3 / 8 {Acq. A. No.-185 of 2024} था इसक भगनं अतिभया इमुरनं खानं क प्रप्त भ ह चक था । प्रथा7 प्रदो पु क मुर अनं! क अपुनं मु5दो<रk क भगनं करनं था, इसलिलए वेह घPनं तिदोनं!क 01/07/2021 क अपुनं कमु1चरिरयाk क सथा तिनंमु1ण Hथाल पुर 5कर अतिभया इमुरनं स रतिशु कi मु!ग कi । अतिभया इमुरनं खानं था उसक भ 5 पुरवेज़ खानं प्रथा7 क अश्ल ल एवे! 5तिस<चक गलिलयाn दो हfए ल — “मुp र पुQस नंहq दो, मुचदोरचदो चमुर, 5 करनं हQ कर ल।” दोनंk अतिभयाk नं प्रथा7 क 5नं स मुरनं कi Nमुकi भ दो । उ घPनं क स!!N मुX प्रथा7 द्वार प्रदोशु1 पु -5 क रूपु मुX लिललिखा तिशुकया (तिदोनं!क- 30/08/2021) प्रH तिकए 5नं पुर थानं–अनंस<तिच 5ति कल्याण, 5!5ग र, लि5ल 5!5ग र-चम्पु, छत्ती सगढ़ मुX तिदोनं!क 14/10/2021 क प्रथामु स<चनं रिरपुP1 पु!5 b कi गई । पुश्चr सतिक्षेयाk क कथानं दो51 तिकए गए, प्रथा7 क 5ति प्रमुण-पुत्र 5ब् तिकया गया, घPनंHथाल क मु]क नंक्शु Qयार तिकया गया था स!पु<ण1 तिवेवेचनं उपुर! अतिभयाग-पुत्र प्रH तिकया गया ।
4. आरपु प्रमुणनं वेH अतिभया5नं कi ओर स अपुनं पुक्षे समुथा1नं मुX 09 सतिक्षेयाk क पुर क्षेण एवे! 09 दोHवे5 प्रदोशु1 तिचन्ह!तिक करए गए । Nर-313 दोण्ड प्रतिक्रया स!तिह क ह कथानं मुX अतिभयागण नं अपुनं तिवेपुर सतिक्षेयाk क कथानंk क इ!कर कर हfए कह हQ तिक उन्हX झू<ठ फं! सया गया हQ, 5तिक वे तिनंदोxष हp । अतिभयागण कi ओर स चवे मुX Hवेया! अतिभया इमुरनं खानं (.स.-1) और ठक दोर तिवेतिपुनं शुमु1 (.स.-2) क पुर क्षेण करया गया हQ । उभयापुक्षे क सनं 5कर तिवेचरण न्यायालया द्वार “प्रश्नंN नं तिनंण1या” पुरिर कर हfए Nर-294 भर या दोण्ड स!तिह क ह अतिभयागण क दोषलिसb कर दोस्जिण्ड तिकया गया हQ था Nर-506 (भग-दो) भर या दोण्ड स!तिह एवे! 4 / 8 {Acq.
A. No.-185 of 2024} Nर-3(1)(दो)(N) तिवेशुष अलिNतिनंयामु क अपुरN मुX दोषमु तिकया गया, लि5स दोषमुति क इस अपु ल मुX चनं] दो गई हQ ।
5. अपु लथा7/प्रथा7 क तिवेद्वानं अलिNवे क क1 हQ तिक प्रथा7 था मु]क क सक्षे मुनं ष यादोवे (अ.स.-1), अशुक रत्नंकर (अ.स.-4), तिवेश्वेनंथा गढ़वेल (अ.स.-7) एवे! व्यासनंरयाण क]तिशुक (अ.स.-9) क कथानंk स अतिभया5नं क मुमुल पु<ण1z पुष्ट ह हQ । प्रथा7 क 5ति प्रमुणपुत्र प्रदोशु1 पु -1 क रूपु मुX अतिभलखा मुX उपुलब्N हQ, लि5सक अतिभया पुक्षे द्वार कई खाण्डनं नंहq तिकया 5 सक हQ । इसक वे5<दो तिवेचरण न्यायालया नं अतिभयागण क दोषमु कर तिदोया । तिवेचरण न्यायालया द्वार उनंक सक्ष्या पुर तिवेश्वेस नं कर हfए त्रतिPपु<ण1 तिनंष्कष1 तिनंकल गया हQ 5 तिवेलिN कi दृतिष्ट मुX स्जिHथार रखा 5नं याग्या नंहq हQ । अतिभयागण क तिवेरूद्घ अतिभया5नं क मुमुल प्रमुतिण रह हQ । अz प्रश्नंN नं दोषमुति क तिनंण1या अपुH कर हfए अपु ल Hवे कर कi 5कर अतिभयागण क उनं अपुरNk मुX भ दोषलिसb कर दोस्जिण्ड तिकया 5ए ।
6. अतिभया/उत्तीरवेदो क्रमु!क–2 एवे! 3 क तिवेद्वानं अलिNवे द्वार तिवेचरण न्यायालया क प्रश्नंN नं तिनंण1या क समुथा1नं कर हfए याह क1 तिदोया गया हQ तिक तिवेचरण न्यायालया द्वार अ!तिक दोषमुति क तिनंष्कष1 पु<ण1z उतिच हQ । प्रथा7 क 5ति प्रमुणपुत्र (आतिP1कल ए-1) मुX उसकi 5ति स<या1वे!शु दोशु1या गया हQ, 5तिक उ 5तिग नंमु लकर कई गल -गल]5 नंहq तिकया गया । लि5स अन्या 5तिस<चक “चमुर” शुब्दो क उच्चरण क आरपु लगया गया हQ, वेह स!दोह स पुर प्रमुतिण नंहq रह हQ । याह भ क1 तिदोया गया तिक पुलिलस मुX रिरपुP1 अत्यालिNक तिवेल! स कi गई हQ । अतिभयागण क तिवेरुb कi गई याह रिरपुP1, उनंकi रिरपुP1 दो51 हनं क पुश्च प्रतिशुNवेशु झू<ठ रूपु स दो51 करई गई हQ । तिवेचरण
5 / 8 {Acq.
A. No.-185 of 2024} न्यायालया द्वार सक्ष्या क आNर पुर 5 तिनंष्कष1 अ!तिक तिकया गया हQ वेह उतिच हQ । अपु लथा7/प्रथा7 द्वार अपु ल मुX उठए गए क1 Hवे कर याग्या नंहq हp, क्याkतिक रकमु क लनंदोनं क लकर उनंक तिवेरुb झू<ठ रिरपुP1 दो51 करई गई था ।
7. उभयापुक्षे क क1 श्रीवेण तिकया गया और तिवेचरण न्यायालया क अतिभलखा क स<क्ष्मुपु<वे1क पुरिरशु लनं तिकया गया ।
8. न्यायादृष्ट! Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 मुX मुनंनं या उच्चमु न्यायालया द्वार दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रH अपु ल क तिनंरकरण ह क छ न्यातियाक लिसद्घ! प्रतिपुतिदो तिकए गए हp 5 कस्जिण्डक-42 मुX तिनंम्नंनंसर हQz-
“42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the promise that no innocent shall be condemned as guilty. All the safeguards and the jurisprudential values of criminal law, are intended to prevent any failure of justice. The principles which come into play while deciding an appeal from acquittal could be summarised as: (i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary; (ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge; (iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed;
6 / 8 {Acq. A. No.-185 of 2024} (iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal; (v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts; (vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, perversity or error of law or fact in the decision of the trial court.”
9. तिवेचरण न्यायालया द्वार सक्ष्या कi समु क्षे कर हfए याह तिनंN1रिर तिकया गया हQ तिक प्रथा7 प्रदो पु क मुर अनं!
(अ.स.-5) था मु]क क अन्या सक्षे मुनं ष यादोवे (अ.स.-1), अशुक रत्नंकर (अ.स.-4), तिवेश्वेनंथा गढ़वेल (अ.स.-7) और व्यासनंरयाण क]तिशुक (अ.स.-9) क कथानंk स याह थ्या Hपुष्ट ह हQ तिक उभयापुक्षे क मुध्या ठकदोर कया1 स स!!लिN रकमु क लनं–दोनं क लकर तिवेवेदो था । प्रथा7 क 5ति प्रमुणपुत्र (आतिP1कल ए- 1) क अनंसर उसकi 5ति स<या1वे!शु दो51 हQ, नं तिक “चमुर”। अतिभयागण द्वार उस स<या1वे!शु 5ति कहकर या तिकस अन्या रूपु मुX 5तिग आNर पुर अपुमुतिनं करनं अथावे क्षेभ उत्पुन्ने करनं कi मु!शु स गल -गल]5 कi गई ह, ऐस कई ठस वे तिवेश्वेसनं या थ्या सक्ष्या स Hथातिपु नंहq हfआ हQ । स्जिल्क उपुलब्N सक्ष्या स याह Hपुष्ट हfआ हQ तिक तिवेवेदो मुत्र रकमु क लनं–दोनं क लकर था । इन्हq आNरk पुर तिवेचरण न्यायालया नं याह तिनंष्कष1 तिनंकल तिक अतिभयागण क तिवेरुb तिवेशुष अलिNतिनंयामु कi Nर 3(1)(दो)(N) क ह अपुरN प्रमुतिण नंहq ह और इस आNर पुर उन्हX दोषमु तिकया गया हQ ।
10. मुध्याप्रदोशु उच्च न्यायालया नं अतिनंल क मुर पु!डया तिवेरुb दो]ल प्रसदो, 2005 (4) MPLJ 467 मुX याह प्रतिपुतिदो तिकया हQ तिक यातिदो अनंस<तिच 5ति क तिकस सदोHया क
7 / 8 {Acq. A. No.-185 of 2024} अपुमुतिनं करनं या उस उसकi 5ति क आNर पुर प्रतिƒ करनं क आशुया नं ह,
“चमुर” शुब्दो क मुत्र उच्चरण अनंस<तिच 5ति था अनंस<तिच 5नं5ति (अत्याचर तिनंवेरण) अलिNतिनंयामु, 1989 कi Nर 3(1)( ) x क अN नं अपुरN कi Hथापुनं ह पुया1प्त नंहq हQ ।
11. 5स्रथा लिस!ह एवे! अन्या तिवेरुb रज्या मुध्याप्रदोशु, 2005 (4) MPLJ 363 मुX याह प्रतिपुतिदो तिकया गया हQ तिक यातिदो तिकस व्याति क क वेल उसकi 5ति क नंमु स पुकर 5ए, और उसक सथा अपुमुतिनं करनं अथावे 5तिग आNर पुर उस प्रतिƒ करनं क कई आशुया या मु!शु सक्ष्या स प्रतिपुतिदो नं ह, मुत्र इस आNर पुर अनंस<तिच 5ति एवे! अनंस<तिच 5नं5ति (अत्याचर तिनंवेरण) अलिNतिनंयामु, 1989 कi Nर 3(1)( ) x क अN नं अपुरN क गठनं नंहq ह ।
12. इस प्रकर, प्रथा7 पुक्षे द्वार अतिभयागण क तिवेरुb 5नं स मुरनं कi Nमुकi दोनं क आरपु लगया गया हQ । तिक! उपुलब्N सक्ष्या क पुर क्षेण उपुर!
तिवेचरण न्यायालया नं याह पुया हQ तिक घPनं क समुया कई भ अतिभया नं तिकस हलिथायार स ससस्जिज्5 था और नं ह
तिकस प्रकर क अस्त्र–शुस्त्र प्रदोतिशु1 तिकए 5नं क थ्या प्रमुतिण हfआ हQ । इसक तिवेपुर , मु]क पुर अतिभयाk कi लनं मुX प्रथा7 एवे! उसक सलिथायाk कi स!ख्या अलिNक पुई गई । इनं पुरिरस्जिHथातियाk मुX याह थ्या प्रमुतिण नंहq ह सक तिक अतिभयागण द्वार प्रथा7 क वेHतिवेक रूपु स कई अतिभत्रस करिर हfआ ह । अz तिवेचरण न्यायालया नं सक्ष्या क आNर पुर भर या दोण्ड स!तिह कi Nर 506 (भग–दो) क अ!ग1 भ अतिभयागण क दोषमु करनं क तिनंष्कष1 अ!तिक तिकया हQ ।
13. न्यायादृष्ट!k क प्रकशु मुX उपुर सक्ष्या तिवेवेचनं क फंलHवेरूपु याह न्यायालया पु हQ तिक तिवेचरण न्यायालया द्वार 5 दोषमुति क तिनंष्कष1 अ!तिक तिकया गया हQ वेह अतिभलखा मुX
8 / 8 {Acq. A. No.-185 of 2024} उपुलब्N थ्या और सक्ष्या क तिवेपुर या तिवेरNभस नंहq हQ था प्रश्नंN नं दोषमुति क तिनंण1या मुX कई अवेQN या अशुद्घ पुरिरलतिक्षे नंहq ह । इसलिलए उसमुX हHक्षेपु कi आवेश्याक नंहq पुया 5 ।
14. अz दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रH याह अपु ल Hवे कर याग्या नं हनं स खारिर5 कi 5 हQ ।
15. तिनंण1या कi प्रतिलिलतिपु क सथा तिवेचरण न्यायालया क अतिभलखा शु घ्रपु<वे1क वेपुस प्रतिष ह । सह /- (स!5या क मुर 5यासवेल) न्यायाN शु पुमुनं