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High Court of Chhattisgarh · body

2025 DAILYLAW 46899 (CHH)

STATE OF CHHATTISGARH v. MOHAN RAM BARGAH

ACQA/451/2025 · 2025-12-14

Shri Sanjay Kumar Jaiswal

body2025

Judgment text

Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.

1 / 5 {Acq. A. No.-451 of 2025} 2025:CGHC:60992 अप्रतिवेद्य छत्ती सगढ़ उच्च न्यायालया , तिलसपुर दोषमुति अपु ल क्रमु!क -451 /2025  छत्ती सगढ़ रज्या, द्वार जि-ल दोण्डाजि0कर , सरग-, छत्ती सगढ़ -----अपु लर्थी2/रज्या तिवेरूद्घ 1. मुहन रमु रगह तिपु-ठेमु, उम्र-लगभग 45 वेष:, तिनवेस -सखौ<ल , पुजिलस र्थीन-0<रपुर, जि-ल-सरग-, छत्ती सगढ़ -----उत्तीरवेदो /अतिभया अपु लर्थी2/रज्या द्वार : डा>क्टर सरन्द्र दोवे!गन, पुBनल अजि0वे । उत्तीरवेदो /अतिभया द्वार : कई उपुस्थिFर्थी नहG । मुनन या न्यायामुHति: श्री स!-या क मुर -यासवेल , न्याया0 श !! तिनर्ण:या पु ठे पुर पुरिर !! 15/12/2025 1. अपु ल कN ग्राह्य पुर सन गया । 2. दोण्डा प्रतिक्रया स!तिह, 1973 कN 0र-378 (1) क ह दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रF इस अपु ल मुX तिवेचरर्ण न्यायालया-तिवेशष न्याया0 श (अनसHतिच -ति एवे! अनसHतिच -न-ति POMAN DEWANGAN Digitally signed by POMAN DEWANGAN Date: 2025.12.16 11:29:19 +0530 2 / 5 {Acq. A. No.-451 of 2025} (अत्याचर तिनवेरर्ण) अजि0तिनयामु, 1989 क ह गतिठे न्यायालया, जि-स आग स!क्षेपु मुX “तिवेशष अजि0तिनयामु” कह गया हB), सरग-, जि-ल-अ!तिकपुर, छत्ती सगढ़ द्वार तिवेशष सत्र प्रकरर्ण क्रमु!क-92/2010 “छत्ती सगढ़ रज्या तिवेरूद्घ मुहन रमु रगह” मुX पुरिर तिनर्ण:या तिदोन!क-27/07/2015 कN वेB0 क चन< दो गई हB । जि-सक ह अतिभया-न क मुमुल प्रमुतिर्ण न पु ह`ए अतिभया क 0र-354, 323, 506(खौ) भर या दोण्डा स!तिह, 1860 एवे! तिवेशष अजि0तिनयामु कN 0र-3(1-10) र्थी 3(1-11) क अपुर0 स दोषमु तिकया गया । 3. अतिभया-न क मुमुल स!क्षेपु मुX इस प्रकर हB तिक अतिभयाक्त्र (अ.स.-2) घटन तिदोन!क 05/06/2010 क अपुन भ - (अ.स.-1) र्थी (अ.स.-4) क सर्थी शमु लगभग 04:30 - लकड़ी लन -!गल गई र्थी । उस दो<रन अतिभया मुहन रमु रगह वेहe आया और अतिभयाक्त्र क सर्थी लत्कर तिकया । अतिभया न रिरपुट: करन पुर -न स मुरन कN 0मुकN दो , चकH तिदोखौया र्थी उसक ब्लउ- एवे! कपुड़ी खौGचकर फाड़ी तिदोए । इसक पुश्च अतिभया न अतिभयाक्त्र क गल मुX पुहन ह`आ लगभग ₹16,000/- मुHल्या क सन क मु!गलसHत्र छ न जिलया और फ़रर ह गया । उ घटन क एक अन्या मुतिहल आश दोवे न भ दोखौ । अतिभयाक्त्र (अ.स.-2) द्वार तिशकया तिकए -न पुर पुजिलस र्थीन मुX रिरपुट: दो-: नहG कN गई, उसन तिदोन!क 07/06/2010 क पुजिलस मुहतिनर क्षेक, सरग- रX-, अ!तिकपुर क प्रदोश: पु -1 क रूपु मुX जिलजिखौ तिशकया प्रF कN । उ तिशकया क आ0र पुर अनसHतिच -ति कल्यार्ण र्थीन, अ!तिकपुर मुX तिदोन!क 24/06/2010 क प्रदोश: पु -2 क रूपु मुX प्रर्थीमु सHचन पुत्र दो-: तिकया गया र्थी अतिभयाक्त्र (अ.स.-2) क -न्मु प्रमुर्णपुत्र -ब् तिकया गया । सतिक्षेयाm क यान दो-: तिकए गए । स!पुHर्ण: तिवेवेचन उपुर! अतिभयाग-पुत्र प्रF तिकया गया । 3 / 5 {Acq. A. No.-451 of 2025} 4. तिवेचरर्ण क दो<रन आरपु प्रमुर्णन ह अतिभया-न कN ओर स अपुन पुक्षे क समुर्थी:न मुX 05 सतिक्षेयाm क पुर क्षेर्ण करया गया र्थी 06 दोFवे- प्रदोश: तिचन्ह!तिक करए गए । 0र 313 दोण्डा प्रतिक्रया स!तिह क ह अतिभया न अपुन तिवेपुर आए सतिक्षेयाm क कर्थीनm क इ!कर कर ह`ए Fवेया! क तिनदोoष हन र्थी झूHठे फाe सया -न या । अतिभया न चवे पुक्षे मुX Fवेया! क पुर क्षेर्ण कर ह`ए याह कह तिक अतिभयाक्त्र क भई क तिवेरुद्ध दो-: रिरपुट: क स!!0 मुX वेह मुहरमुतिनया क सर्थी र्थीन गया र्थी, जि-सस अतिभयाक्त्र क पुरिरवेर स उसकN र!जि-श उत्पुन्न ह गई । इस र!जि-श क करर्ण अतिभयाक्त्र (अ.स.-2) न उस झूHठे मुमुल मुX फाe सन कN 0मुकN दो र्थी । इस स!!0 मुX अतिभया न मुह मुई, 2010 मुX ह प्रदोश: डा -1 क रूपु मुX पुजिलस अ0 क्षेक, सरग- क तिशकया प्रF कN र्थी । 5. उभयापुक्षे क सन -कर तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार पुया गया तिक अतिभयाक्त्र (अ.स.-2), उसकN भ - (अ.स.-1) एवे! (अ.स.-4) क कर्थीन र्थी जिलजिखौ तिशकया प्रदोश: पु -1 क मुध्या ग!भ र अ!तिवे:र0 तिवेद्यमुन हu । घटन क घतिट हन क कई Fपुष्ट करर्ण अतिभया-न द्वार प्रतिपुतिदो नहG तिकया गया हB । अतिभयाक्त्र न अतिभया द्वार मुरपु ट तिकए -न क कर्थीन तिकया हB, तिक! तिचतिकत्स या पुर क्षेर्ण करए -न स इनकर तिकया हB । कहG लत्स!ग कN घटन ई गई हB, कहG लत्कर क प्रयास कN, कहG मुत्र छड़ीछड़ी कN कह गई हB । इस प्रकर अतिभया-न मुमुल मुX ग!भ र तिवेर0भस पुई गई हu । सर्थी ह , अतिभया द्वार पुHवे: मुX तिशकया प्रदोश: डा -1 दो गया र्थी , जि-समुX उस झूHठे मुमुल मुX फाe सए -न कN आश!क व्या कN गई र्थी । उपुर ग!भ र तिवेर0भसm क दृतिष्टग रखौ ह`ए तिवेचरर्ण न्यायालया न अतिभयाक्त्र क कर्थीन क स!दोह स पुर तिवेश्वेसन या नहG पुया । उ आ0र पुर तिवेचरर्ण न्यायालया न “प्रश्न0 न तिनर्ण:या” पुरिर कर ह`ए अतिभया क दोषमु तिकया, जि-स दोषमुति क इस अपु ल मुX चन< दो गई हB । 4 / 5 {Acq. A. No.-451 of 2025} 6. न्यायादृष्ट! Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 मुX मुनन या उच्चमु न्यायालया द्वार दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रF अपु ल क तिनरकरर्ण ह क छ न्यातियाक जिसद्घ! प्रतिपुतिदो तिकए गए हu - कस्थिण्डाक-42 मुX तिनम्ननसर हBz- “42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the promise that no innocent shall be condemned as guilty. All the safeguards and the jurisprudential values of criminal law, are intended to prevent any failure of justice. The principles which come into play while deciding an appeal from acquittal could be summarised as: (i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary; (ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge; (iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed; (iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal; (v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts; (vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, 5 / 5 {Acq. A. No.-451 of 2025} perversity or error of law or fact in the decision of the trial court.” 7. उपुर न्यायादृष्ट! क प्रकश मुX सक्ष्या तिवेवेचन क फालFवेरूपु याह न्यायालया पु हB तिक तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार - दोषमुति क तिनष्कष: अ!तिक तिकया गया हB वेह अतिभलखौ मुX उपुलब्0 थ्या और सक्ष्या क तिवेपुर या तिवेर0भस नहG हB र्थी प्रश्न0 न दोषमुति क तिनर्ण:या मुX कई अवेB0 या अशद्घ पुरिरलतिक्षे नहG ह । इसजिलए उसमुX हFक्षेपु कN आवेश्याक नहG पुया - । 8. अz दोषमुति क तिवेरूद्घ प्रF याह अपु ल ग्राह्य याग्या न हन स प्रर!तिभक Fर पुर खौरिर- कN - हB । 9. तिनर्ण:या कN प्रतिजिलतिपु क सर्थी तिवेचरर्ण न्यायालया क अतिभलखौ श घ्रपुHवे:क वेपुस प्रतिष ह । सह /- (स!-या क मुर -यासवेल) न्याया0 श पुमुन