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Allahabad High Court · body

2025 DAILYLAW 22344 (ALL)

DR. DEVI PRASAD DWIVEDI v. CHIEF EXECUTIVE OFFICER AND ORS.

WRIA/31125/2000 · 2025-09-23

Saurabh Shyam Shamshery

body2025

Judgment text

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उच्च न्यायालय , क्षेत्राधि कार इलाहाबाद रिरट ए संख्या-३११२५/२००० डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी …याधि(काकर्ताा* प्रधिर्ता मुख्य काय*पालक अधि कारी एवं अन्य …प्रधिर्तावादीदण याधि(काकर्ताा*ओं के अधि वक्ता : बी.एन.सिंसह, डी.एस.द्वित्रपाठी, ए(.एन सिंसह, पी.पाधिडया, वी.डी.शुक्ला, वी.एन.सिंसह, द्विवनीर्ता कु मार सिंसह प्रधिर्तावादीगण के अधि वक्ता : पी.एम.एन.सिंसह, वी.डी.ओझा, द्विवनीर्ता संकल्प प्रकाशनार्थ* स्वीकृ र्ता न्यायालय सं० - ५ मौखिAक आदेश माननीय सौरभ श्याम शमशेरी , न्यायमूर्तिर्ता १. वर्ता*मान याधि(का गर्ता् २५ वर्षोंI के अऩ्र्ताराल के पश्चार्ता, आज अंधिर्ताम रूप से द्विनस्र्ताारिरर्ता की जा रही है। २. वर्ता*मान याधि(का में द्विनम्नखिलखिAर्ता र्ताथ्य, पत्रावली पर उपस्थिस्र्थर्ता आलेA व अभिभव(नों की पृष्ठभूद्विम में अद्विववाद्विदर्ता माने जा सकर्ताे हैंः- क. याधि(काकर्ताा*, डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी को उनकी द्विव&वर्ताा, द्विक वह कम*काण्ड में द्विनष्णार्ता, व नैद्विष्ठक द्विव&ान है और भगवान का दैद्विनक अभिभर्षोंेक करने वालो में उच्च रहें है , के दृद्वि_गर्ता, श्री काशी द्विव&त्परिरर्षोंर्ता् के अध्यक्ष ने 2 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० एक पत्र द्विदनांद्विकर्ता १३.०१.१९९४, आयुक्त एवं अध्यक्ष काय*पालक सद्विमधिर्ता, काशी द्विवश्वनार्थ मस्थिन्दर, वाराणसी को प्रेद्विर्षोंर्ता करके , याधि(काकर्ताा* की पूव* स्वीकृ धिर्ता के सार्थ, भगवान द्विवश्वनार्थ की द्विवधि -द्विव ान की पूजा उनकी देA- रेA में करने के खिलए, उधि(र्ता द्विनण*य हेर्ताु द्विनवेदन द्विकया। इस द्विनवेदन की आवश्यकर्ताा का कारण पूव* में भगवान द्विवश्वनार्थ की पूजा की देA-रेA, कई गर्ता् वर्षोंI से कर रहे, पं० बंशी र का स्वग*वास होना र्था। A. उपरोक्त वर्णिणर्ता पत्र द्विदनांद्विकर्ता १३.०१.१९९४, का संज्ञान खिलया गया और याधि(काकर्ताा* की सुद्विव ानुसार और यह द्विक राद्वित्रकालीन भोग आरर्ताी के खिलए कोई शास्त्री/आ(ाय* द्विनयुक्त नहीं र्था और यह भी द्विव(ारणीय रहा द्विक याधि(काकर्ताा* को रात्रीकालीन पूजा आरर्ताी का काय* करने में बहुर्ता क_ न हो र्ताो उक्त प्रयोजन व अन्य ार्मिमक कायI के खिलए उन्हे द्विनयुक्त द्विकया जा सकर्ताा है। ग. उपरोक्त के दृद्वि_गर्ता व द्विव(ार द्विवमश* के उपरान्र्ता , मुख्य काय*पालक अधि कारी ने पत्रांक संख्या ९४१/आ०खिल० ०-९४, द्विदनांद्विकर्ता २४ जून १९९४, &ारा याधि(काकर्ताा* को , श्री काशी द्विवश्वनार्थ मंद्विदर वाराणसी में राद्वित्रकालीन भोग आरर्ताी को द्विवधि वर्ता् सम्पन्न कराने हेर्ताु 'आ(ाय*' द्विनयुक्त द्विकया र्तार्था उन्हें द्विवश्वनार्थ मंद्विदर के पुजारिरयों को कम*काण्ड आद्विद के प्रभिशक्षण का दाधियत्व भी सौंपा गया। यह भी स्प_ द्विकया गया द्विक यह द्विनयुद्विक्त/व्यवस्र्था एक वर्षों* के खिलए, अस्र्थायी रूप से रहेगी र्तार्था यह व्यवस्र्था द्विबना द्विकसी कारण कभी भी समाप्त की जा सके गी। एक मानद राभिश रू० १५००/- प्रधिर्ता माह भी द्विन ा*रिरर्ता करी गयी। घ. उपरोक्त के दृद्वि_गर्ता, याधि(काकर्ताा* ने ०१.०७.१९९४ को उपरोक्त वर्णिणर्ता पद का काय*भार ग्रहण द्विकया और पूण* द्विनष्ठा से उक्त पूजा-पाठ श्रृंगार आरर्ताी व अन्य कायI का द्विनवा*हन प्रारम्भ कर द्विदया। ङ श्री काशी द्विवश्वनार्थ मस्थिन्दर ट्रस्ट, वाराणसी की बैठक द्विदनाँक २७.०५.१९९५, में द्विवस्र्ताृर्ता द्विव(ार द्विवमशwपरांर्ता सव*सम्मधिर्ता से अध्यक्ष, श्री काशी द्विव&त्परिरर्षोंर्ता् के , प्रस्र्तााव द्विदनांक १३.०१.१९९४, को स्वीकार द्विकया 3 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० और याधि(काकर्ताा* को श्रृंगार- भोग आरर्ताी सम्पन्न कराने हेर्ताु र्तार्था पुजारिरयों के परीक्षण हेर्ताु, १५००/- रू० मासिसक मानद राभिश पर, 'आ(ाय*' के रूप में द्विनयुद्विक्त की स्वीकृ धिर्ता प्रदान करी र्तार्था इसी बैठक में दो और द्विनण*य सव*सम्मधिर्ता से पारिरर्ता द्विकए। पहला, याधि(काकर्ताा* का मानदेय १५०० रू० मासिसक से बढाकर ३००० रू० मासिसक द्विकया गया और दूसरा उनका काय*काल ३ वर्षोंI के खिलए बढ़ाया गया। (. उपरोक्त बैठक में याधि(काकर्ताा* के कायI की सराहना भी की गयी , द्विक मस्थिन्दर के प्रशासन, प्रगधिर्ता एवं मंद्विदर के सांस्कृ धिर्ताक द्वि{या कलापों में उनका सव*योग व उत्साह रहा एवं उनकी द्विनष्ठा, असा ारण एवं अद्विनव*(नीय रही। इसके उपरांर्ता पत्रांक द्विदनांद्विकर्ता २० नवम्बर १९९४ के &ारा याधि(काकर्ताा* &ारा उपरोक्त दाधियत्वों का द्विनवा*हन को प्रमाभिणर्ता भी द्विकया और कालान्र्तार में आयुक्त एवं अध्यक्ष, काय*पालक सद्विमधिर्ता श्री काशी द्विवश्वनार्थ मस्थिन्दर, वाराणसी &ारा एक 'प्रशस्थिस्र्ता पत्र' द्विदनांद्विकर्ता २५.०९.१९९९, याधि(काकर्ताा* को प्रदान द्विकया। छ. काशी द्विवश्वनार्थ मस्थिन्दर ट्रस्ट, वाराणसी की ३७वीं न्यास परिरर्षोंद बैठक द्विदनाँक १० नवम्बर १९९८ में सव*सम्मधिर्ता से याधि(काकर्ताा* के &ारा द्विदये गये प्रार्थ*ना पत्र पर द्विव(ारोपरान्र्ता यह द्विनण*य द्विकया गया द्विक उनके द्विनयुद्विक्त पत्र में अंद्विकर्ता एक वर्षों* की समय सीमा समाप्त की जायें व उनका मानदेय रू० ३०००/- से बढाकर रू० ३५००/- प्रधिर्तामास द्विकया जाने का द्विनण*य खिलया गया र्ताद्नुसार स्वीकृ धिर्ता भी प्रदान करी गयी। सार्थ ही सार्थ Aस्थिण्डर्ता मूर्तिर्तायों आद्विद का द्विवधि पूव*क द्विवसज*न करने के खिलए भी याधि(का कर्ताा* व एक अऩ्य को अधि कृ र्ता द्विकया गया। द्विनयुद्विक्त आदेश से एक वर्षों* की समयावधि को समाप्त करने का द्विनण*य याधि(का कर्ताा* को मुख्य पालक अधि कारी ने पत्र द्विदनांद्विकर्ता ०३.१२.१९९८ &ारा सूधि(र्ता भी द्विकया। यहाँ यह उसि•खिAर्ता करना आवश्यक है द्विक याधि(काकर्ताा* के द्विनयुद्विक्त पत्र में 'एक वर्षों*' की समयावधि समाप्त करने का द्विनण*य, मानदेय बढाने का द्विनण*य व अन्य कायI के सम्पादन के खिलए अधि कृ र्ता करना, का र्ताात्पय*, याधि(काकर्ताा* का द्विनयोजन बनाए रAना र्ताो हो सकर्ताा है परन्र्ताु इन सबका ऐसा कोई भी द्विवपरीर्ताार्थ*क र्ताात्पय* नहीं हो सकर्ताा द्विक 4 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० याधि(काकर्ताा* का द्विनयोजन द्विवस्र्ताार नहीं द्विकया गया र्था और इस कारण उसका द्विनयोजन समाप्त हो गया। अन्यर्था उक्त सभी द्विनण*य व्यर्थ* और बेमर्तालब हो जायेंगे और यह द्विक इसके उपरान्र्ता भी याधि(काकर्ताा* अद्विववाद्विदर्ता रूप से पूजा अ(*ना करर्ताा रहा। ज. प्रधिर्तावादी संख्या ५ जो र्तात्समय मुख्य सधि(व के पद पर काय* कर रहे र्थे। अ(ानक कभिर्थर्ता रूप से द्विवश्वनार्थ मंद्विदर में आकर एक द्विदन लम्बे समय र्ताक अनुष्ठान करना (ाहर्ताे र्थे, सिजसके खिलए एकान्र्ता की आवश्यकर्ताा र्थी, जो मंद्विदर के सामान्य भक्तों के दश*न रोक कर, देने में कद्विठनाई र्थी। इस कारण याधि(काकर्ताा* ने उस अधि कारी से ऐसी पूजा न करने का आग्रह द्विकया, जो उस अधि कारी को नागवार गुजरा और याधि(काकर्ताा* के द्विवरूद्ध, पूवा*ग्रह से ग्रसिसर्ता होकर एक छद्म परिरवादी को Aडा कर, एक भिशकायर्ता पत्र द्विदनांद्विकर्ता ०५.०२.२००० प्रेद्विर्षोंर्ता करवाया गया द्विक याधि(काकर्ताा* की द्विनयुद्विक्त अवै है और मंद्विदर के द्वि{या- कलापों में द्विवत्तीय अद्विनयद्विमर्तार्ताायें हुई है। झ. उक्त भिशकायर्ता पत्र का संज्ञान खिलया गया और याधि(काकर्ताा* के द्विवरूद्ध, उसकी पीठ के पीछे एक जाँ( करायी गयी और जाँ( आख्या को न्यास की बैठक द्विदनांक २२.०६.२००० में द्विव(ारण हेर्ताु रAा गया, सिजसमें यह द्विनण*य खिलया गया द्विक काशी द्विवश्वनार्थ अधि द्विनयम, १९८३ की ारा २१ (१) र्तार्था २१ (३) के अऩ्र्ताग*र्ता, मुख्य काय*पालक अधि कारी, कम*(ारी की द्विनयुद्विक्त करने र्तार्था उन्हे हटाने में सक्षम है और उसको याधि(काकर्ताा* की सेवायें समाप्त करने के सम्बन् में अस्थिन्र्ताम द्विनण*य लेने के खिलए प्राधि कृ र्ता द्विकया गया। यहाँ यह भी उसि•खिAर्ता करना आवश्यक है द्विक प्रधिर्तावादी ने कभी भी याधि(काकर्ताा* को मंद्विदर का कम*(ारी नहीं माना है। ञ. भिशकायर्ताी पत्र के आ ार पर जाँ( आख्या की प्रधिर्ता याधि(काकर्ताा* को उपलब् नहीं करायी अद्विपर्ताु भिशकायर्ता पत्र की एक प्रधिर्ता याधि(काकर्ताा* को मुख्य काय*पालक अधि कारी ने पत्र द्विदनांद्विकर्ता २७.०५.२००० के माध्यम से प्रेद्विर्षोंर्ता की। याधि(काकर्ताा* ऩे उसका एक द्विवस्र्ताृर्ता उत्तर द्विदनांद्विकर्ता १५.०६.२००० को प्रेद्विर्षोंर्ता द्विकया। 5 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० ट. उपरोक्त परिरस्थिस्र्थधिर्तायों में मुख्य काय*पालक अधि कारी ने आदेश द्विदनांद्विकर्ता १२.०७.२००० &ारा यह द्विन ा*रिरर्ता द्विकया द्विक याधि(काकर्ताा* का सेवा द्विवस्र्ताार २४.०६.१९९८ के बाद नहीं हुआ। अर्ताः उक्त धिर्ताभिर्थ से उनकी सेवायें स्वर्ताः समाप्त हो गयी। सार्थ ही सार्थ उनको दी गयी मानक राभिश भी द्विवधि सम्मर्ता नहीं र्थी और द्विवस्र्ताृर्ता परीक्षण के बाद वसूली हेर्ताु अलग से द्विवस्र्ताृर्ता आदेश पारिरर्ता करने की स्वर्तांत्रर्ताा रAी। आदेश के मुख्य अंश द्विनम्न है: “मैने अखिAल भारर्ताीय श्री पस्थिण्डर्ता परिरर्षोंद का भिशकायर्ताी प्रार्थ*ना पत्र , डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी &ारा द्विदए गए स्प_ीकरण एवं अन्य साक्ष्य र्तार्था शासन &ारा करायी गयी जां( आख्या का अवलोकन द्विकया र्तार्था श्री द्वि&वेदी को व्यद्विक्तगर्ता पत्रावली पर लगे सभी अभिभलेA का परीक्षण द्विकया और उस पर द्विव(ार द्विकया। डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी ने अपने स्प_ीकरण द्विदनांक 15.06.2000 में स्वयं स्वीकार द्विकया है द्विक " श्री काशी द्विवश्वनार्थ मस्थिन्दर काया*लक सद्विमधिर्ता की २२ वी बैठक द्विदनांक १५.०४.९४ में सव*सम्मधिर्ता से मस्थिन्दर आ(ाय* पद पर मुझे द्विनयुक्त द्विकया गया र्तार्था उसी बैठक में मुझे भोग-श्रंगार आरर्ताी सम्पन्न कराने र्तार्था पुजारिरयों को प्रभिशक्षण देने हेर्ताु आ(ाय* के रूप में द्विनयुद्विक्त की गयी। द्विनयुद्विक्त के एक वर्षों* बाद मस्थिन्दर आ(ाय* पद पर मेरी द्विनयुद्विक्त र्ताीन वर्षों* के खिलए पुनः बढा दी गयी। वह र्ताीन वर्षों* की अवधि २८ को समाप्त हो गयी। मैने मस्थिन्दर आ(ाय* पद पर सेवा एवं संर्ताुद्वि_ हेर्ताु प्रार्थ*ना पत्र दे द्विदया। द्विकन्र्ताु सेवा स्र्थायीकरण का आदेश अभी र्ताक द्विनग*र्ता नहीं हुआ। मुख्य काय*पालक अधि कारी से पूछने पर उन्होने कहा द्विक आदेश द्विनकले या न द्विनकले उससे आपका क्या मर्तालब आप मस्थिन्दर आ(ाय* पद पर द्विनयमों के र्ताहर्ता स्र्थायी र्थे। डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी के उपरोक्त कर्थन में बल नहीं है। न्यास परिरर्षोंद की ३७वीं बैठक द्विदनांक १० . ११ . ११ . ९८ के एजेण्डा मद १४ अन्य द्विवर्षोंय के द्विबन्दु ( २ ) में डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी के स्र्थायीकरण पर कोई द्विव(ार नही हुआ और न ही न्यास परिरर्षोंद ने स्र्थायीकरण करने का कोई द्विनण*य खिलया। अद्विपर्ताु 6 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी के &ारा द्विदए गए प्रा्रर्थ*ना पत्र पर द्विव(ारोपरान्र्ता उसके द्विनयुद्विक्त आदेश में त्रुद्विटपूण* ढंग से अंद्विकर्ता एक वर्षों* की समय सीमा को समाप्त करने का द्विनण*य खिलया गया। न्यास परिरर्षोंद के द्विनण*य से स्प_ पर्ताा (लर्ताा है द्विक द्विदनांक १० . ११ . ९८ को न्यास परिरर्षोंद ने डा० द्वि&वेदी के सेवा द्विवस्र्ताार करने का ही कोई द्विनण*य खिलया और न ही स्र्थायीकरण द्विकया गया। पत्रावली के अवलोकन से यह स्प_ है द्विक डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी की द्विनयुद्विक्त २४ . ६ . ९४ को श्री आर०के ० सिंसह , मुख्य काय*पालक अधि कारी &ारा के वल एक वर्षों* के खिलए की गयी र्थी और पुनः उनके सेवा के द्विवस्र्ताार ३ वर्षों* के खिलए द्विकया गया। इस प्रकार अस्थिन्र्ताम रूप से डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी का काय*काल द्विदनांक २४ . ०६ . ९८ को समाप्त हो गया। द्विदनांक २४ . ०६ . ९८ के पश्चार्ता न र्ताो कोई सेवा द्विवस्र्ताार द्विकया और न ही डा० द्वि&वेदी के पुना*द्विनयुद्विक्त का कोई आदेश ही द्विकए गए। अर्ताः उनकी सेवा अवधि स्वर्ताः द्विदनांक २४ . ०६ . ९८ को द्विनष्प्रभावी हो समाप्त हो गयी।” ठ. उपरोक्त आदेश वर्ता*मान याधि(का में आक्षेद्विपर्ता द्विकया गया है। ३. इस न्यायालय &ारा पारिरर्ता, अंर्तारिरम आदेश द्विदनांद्विकर्ता २३.०८.२००२ &ारा आक्षेद्विपर्ता आदेश को द्विनलस्थिम्बर्ता कर द्विदया गया। अंर्तारिरम आदेश का पालन हुआ और याधि(काकर्ताा* पूव* की भांधिर्ता पूजा अ(*ना इत्याद्विद करर्ताा रहा। ४. कालान्र्तार में याधि(काकर्ताा* को पद्म द्विवभूर्षोंण व पद्म श्री से सम्माद्विनर्ता द्विकया गया और वर्षों* २०१६ से २०१८ के मध्य वो उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का सदस्य भी रहा। इसके उपरान्र्ता भी याधि(काकर्ताा* अपना दाधियत्व द्विनभार्ताा रहा। ५. अंर्तारिरम आदेश के रहर्ताे हुए व इस न्यायालय की द्विबना कोई अनुमधिर्ता खिलये, काशी द्विवश्वनार्थ न्यास परिरर्षोंद ने १०४वी बैठक द्विदनांक २२.०२.२०२३ में यह द्विनण*य खिलया द्विक, (ूँद्विक याधि(काकर्ताा* की उम्र ६० वर्षों* से अधि क है , इसखिलए न र्ताो उनको मानदेय द्विदया जा सकर्ताा है और न ही उनको काय*रर्ता रAा जा सकर्ताा है, आदेश का सारांश द्विनम्न हैः- 7 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० “इस प्रकार उपरोक्त र्ताथ्यों के आलोक में यह स्प_ है द्विक डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी की द्विनयुद्विक्त २२ .०६.१९९४ को र्तात्कालीन मुख्य काय*पालक अधि कारी &ारा अस्र्थायी रूप से एक वर्षों* के खिलए की गयी र्थी सिजसे र्ताीन वर्षों* र्ताक सेवा द्विवस्र्ताार द्विदया गया। श्री द्वि&वेदी की द्विनयुद्विक्त द्विबना पद सृजन के की गयी र्थी। डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी की द्विनयुद्विक्त द्विदनांक २४.०६.१९९८ को स्वर्ताः समाप्त हो गयी। भिशकायर्ता होने के {म में शासन &ारा करायी गयी जाँ( में आरोप सत्य पाये जाने के कारण र्तात्कालीन मुख्य काय*पालक अधि कारी &ारा श्री द्वि&वेदी के द्विवरूद्ध नराभिश वसूली के आदेश पृर्थक से द्विनग*र्ता करने के आदेश द्विदये गये र्थे। श्री द्वि&वेदी &ारा मा० उच्च न्यायालय से अधि वक्ता की अनुपस्थिस्र्थधिर्ता के {म में स्टे आड*र प्राप्त कर खिलया गया। श्री द्वि&वेदी द्विदनांक २० . १० . २०१६ को अपनी अधि वर्षों*र्ताा आयु पूण* कर (ुके र्तार्था मा० उच्च न्यायालय के वसूली रोकने के आदेश का अनुपालन द्विकया जा (ुका है। ऐसी स्थिस्र्थधिर्ता में न्यास परिरर्षोंद के द्विनम*य के आलोक में द्विदनांक २० . १० . २०१६ ( अधि वर्षों*र्ताा आयु ६० वर्षों* ) के उपरान्र्ता श्री द्वि&वेदी का द्विकसी भी प्रकार से कोई मानदेय व अधि कार नहीं बनर्ताा है। श्री द्वि&वेदी की द्विनयुद्विक्त लोक सेवा आयोग में होने के कारण इनको द्विदये जाने वाले माग* व्यय का भुगर्ताान सिसर्ताम्बर २०१६ र्ताक द्विकया गया है। अक्टूबर २०१६ माग* व्यय का भुगर्ताान अवरूद्ध कर द्विदया गया। श्री द्वि&वेदी &ारा अपने प्रत्यावेदन से द्विदनांक ०४ . ११ . २०१८ को काय*भार ग्रहण करना बर्तााया गया है। परन्र्ताु वर्ता*मान में उपलब् पत्रावली में कोई रिरकाड* नहीं है। १. डा० देवी प्रसाद द्वि&वेदी की ६० वर्षों* की आयु २० अक्टूबर, २०१६ को ही पूण* हो (ुकी है। २. श्री द्वि&वेदी की द्विनयुद्विक्त द्विबना पद सृजन के र्तार्था द्विबना सक्षम अधि कारी के की गयी र्थी। ३. श्री काशी द्विवश्वनार्थ मंद्विदर न्यास के अऩ्र्ताग*र्ता अधि ग्रहण के समय सिजन पुजारीगण के प्रभिशक्षण का उ•ेA द्विकया गया है, वह स्मस्र्ता पुजारीगण सेवाद्विनवृत्त हो (ुके है। वर्ता*मान में जो भी पुजारी काय*रर्ता है सभी आ(ाय* उच्च 8 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० योग्यर्ताा ारी एवं समस्र्ता प्रकार के पूजा, आरर्ताी इत्याद्विद में दक्ष है। वर्ता*मान में कोई प्रभिशक्षण देने की कोई आवश्यकर्ताा नहीं है। अर्ताः उक्त परिरस्थिस्र्थधिर्तायों के आलोक में न्यास परिरर्षोंद यह द्विनण*य लेर्ताा है द्विक श्री द्वि&वेदी के प्रकरण में मा० न्यायालय के आदेश का अनुपालन न्यास परिरर्षोंद &ारा द्विकया जा रहा है। वर्ता*मान में सभी प्रकार के कम*(ारिरयों की सेवा शर्ताI के अनुसार अधि कर्ताम ६० वर्षों* की आयु ही अधि वर्षों*र्ताा आयु द्विनयर्ता है। (ूँद्विक श्री द्वि&वेदी अपनी अधि वर्षों*र्ताा आयु ६० वर्षों* पूण* कर (ुके है , इसखिलए न्यास परिरर्षोंद के अऩ्र्ताग*र्ता इन्हे काय*रर्ता नहीं रAा जा सकर्ताा। र्ताद्नुसार श्री द्वि&वेदी के प्रत्यावेदन पर द्विनण*य खिलया जार्ताा है।” ६. उपरोक्त परिरस्थिस्र्थधिर्तायों में याधि(काकर्ताा* ने एक अवमानना आवेदन (कं टेम्पट अपलीके शन,सिसद्विवल) संख्या १६६३ सन् २०२३, इस न्यायालय में दाखिAल करी द्विक उपरोक्त द्विनण*य इस न्यायालय के &ारा पारिरर्ता अंर्तारिरम आदेश द्विदनांद्विकर्ता २३.०८.२००२ के द्विवपरीर्ता है। उक्त अंर्तारिरम आदेश की भी अवहेलना हुई है। अर्ताः यह अवमानना का मामला बनर्ताा है। उधि(र्ता पीठ ने आदेश द्विदनांद्विकर्ता ०३.०३.२०२३ &ारा यह आदेश द्विदया द्विक याधि(काकर्ताा* पूव* की भांधिर्ता श्रृंगार भोग आरर्ताी (राद्वित्र ८ से १० बजे र्ताक) काशी द्विवश्वनार्थ मंद्विदर में करर्ताा रहेगा। काशी द्विवश्वनार्थ न्यास के द्विव&ान अधि वक्ता ने भी उक्त आदेश के प्रधिर्ता सहमधिर्ता दी। ऐसा प्रर्ताीर्ता होर्ताा है याधि(काकर्ताा* ने उक्त आदेश का पालन या र्ताो स्वः इच्छा से या अन्य परिरस्थिस्र्थधिर्तायों के कारणवश नहीं द्विकया और श्रृंगार आरर्ताी द्विनयद्विमर्ता रूप से प्रधिर्ताद्विदन नहीं करी। ७. उपरोक्त पृष्ठभूद्विम में इस न्यायालय ने एक आदेश द्विदनांद्विकर्ता २६ .०८.२०२५ पारिरर्ता करा द्विक सभी पक्षकार सौहाद*पूण* वार्ताावरण में बार्ता कर सहमधिर्ता के आ ार पर कोई द्विनण*य लें। ८. पक्षकारों के द्विव&ान अधि वक्तागण एवं याधि(काकर्ताा* जो आज न्यायालय में स्वयं उपस्थिस्र्थर्ता हैं उन्होने यह कर्थन द्विकया द्विक पक्षकारों ने दो बार आपस में सौहाद*पूण* वार्ताावरण में वार्ताा* की। पहले प्रयागराज में , द्वि—र वाराणसी में और यह भी बर्तााया 9 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० गया, द्विक आपस में खिलया गया कोई भी द्विनण*य, सव*प्रर्थम न्यास की बैठक में स्वीकृ र्ता कराना होगा और इसखिलए यह उधि(र्ता होगा द्विक पक्षकारों के पक्ष का श्रवण कर , यह न्यायालय, आदेश पारिरर्ता करे। सिजससे उसे न्यास की बैठक में स्वीकृ र्ता कराने की आवश्यकर्ताा ही न रह जाये। ९. उपरोक्त पृष्ठभूद्विम में याधि(काकर्ताा* को , उसके द्विव&ान वरिरष्ठ अधि वक्ता श्री ए(.एन.सिंसह को व उनके सहयोगी द्विव&ान अधि वक्ता श्री द्विवनीर्ता कु मार सिंसह को , प्रधिर्तावादी सं० १,२,३ के द्विव&ान अधि वक्ता श्री द्विवनीर्ता संकल्प को व प्रधिर्तावादी संख्या ४ के द्विव&ान अधि वक्ता के प्रधिर्तावेदन को ध्यानपूव*क श्रवण द्विकया। प्रधिर्तावादी सं० ५ की र्तार— से कोई अधि वक्ता प्रस्र्ताुर्ता नहीं हुआ। १०. प्रधिर्तावादी का कर्थन रहा है द्विक याधि(काकर्ताा* उसका कम*(ारी नहीं है और उसकी द्विनयुद्विक्त 'आ(ाय*' के रूप में वर्षों* १९९८ के बाद द्विवस्र्ताारिरर्ता नहीं की गयी और मुख्य काय*पालक अधि कारी 'अधि द्विनयम १९८३’ की ारा २१ (१) र्तार्था २१ (३) के अंर्ताग*र्ता याधि(काकर्ताा* के द्विवरूद्ध आदेश पारिरर्ता करने का अधि कार रAर्ताा है। यह अद्विववाद्विदर्ता है, याधि(काकर्ताा* के द्विवरूद्ध काय*वाही एक भिशकायर्ता पत्र को संज्ञान में लेर्ताे हुए प्रारम्भ करी गई र्थी। उनका यह भी कर्थन रहा है द्विक आक्षेद्विपर्ता आदेश पारिरर्ता करने के पूव* प्राकृ धिर्ताक न्याय के सिसद्धान्र्ताो का पूण* परिरपालन द्विकया और काय*वाही पूवा*ग्रह से ग्रसिसर्ता नहीं र्थी। इस न्यायालय के अंर्तारिरम आदेश के जीवान्र्ता होने के बावजूद, क्योद्विक याधि(काकर्ताा* ६० वर्षों* की उम्र से अधि क हो गये र्थे , के वल इस कारण से ही उनको अद्विग्रम काय* न कराने का आदेश द्विदनांक २३.०२.२०२५ को पारिरर्ता द्विकया गया र्था। ११. श्री द्विवनीर्ता संकल्प, न्यास के द्विव&ान अधि वक्ता ने अनुदेश के आ ार पर यह कर्थन द्विकया द्विक न्यास को याधि(काकर्ताा* के द्विव&र्ताा , उनकी द्विनष्ठा व उनके मंद्विदर में मनोयोग से पूजा अ(*ना करने के द्विवर्षोंय में किंकधि(र्ता भी संदेह नहीं है और न्यास इस न्यायालय के &ारा पारिरर्ता द्विकसी भी द्विनण*य का सम्मान करेगा। १२. याधि(काकर्ताा* स्वयं न्यायालय कक्ष में उपस्थिस्र्थर्ता हैं और न्यायालय की अनुमधिर्ता से उन्होनें अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष , भावुकर्ताा परन्र्ताु गम्भीरर्ताा से प्रस्र्ताुर्ता द्विकया। भगवान भिशव की महात्मय के द्विवर्षोंय में उन्होने उच्चारण द्विकया द्विकः- 10 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० "र्ताव र्तात्त्वं न जानाद्विम कीदृशोऽसिस महेश्वर।" "यादृशोऽसिस महादेव र्ताादृशाय नमो नमः॥" सिजसका अर्थ* है " हे महेश्वर ! मैं आपके र्तात्व (रहस्य) को नहीं जानर्ताा हूं द्विक आप कै से हो । परन्र्ताु हे महादेव ! आप सिजस द्विकसी र्तारह के हो, जैसे हो, वैसे के वैसे लगन आपको मैं बार-बार प्रणाम करर्ताा हूँ ।” १३. याधि(काकर्ताा* ने कहा द्विक उन्होने आ(ाय* के रूप में मस्थिन्दर में अपनी सेवायें द्विबना द्विकसी भेद-भाव से, सम्पूण* द्विवधि -द्विव ान से, द्विनयद्विमर्ता रूप से पूजा अ(*ना करके दी और मानदेय भी न्यास के बार-बार आग्रह करने के उपरान्र्ता ही स्वीकार द्विकया। वह कभी भी न्यास का कम*(ारी नहीं रहा। उसको, उसकी द्विवशेर्षोंर्तााओं के कारण आ(ाय* पद पर कु छ द्विवशेर्षों कायI के सम्पादन हेर्ताु द्विनयुक्त द्विकया गया। द्विवशेर्षों रूप से राद्वित्र भोग आरर्ताी को द्विवधि वर्ता् सम्पाद्विदर्ता करने के खिलए, जो उसने मनोयोग से पूण* की। आक्षेद्विपर्ता आदेश, पूवा*ग्रह से ग्रसिसर्ता है, क्योंद्विक र्तात्कालीन एक वरिरष्ठ शासकीय अधि कारी को उऩ्होने एक द्विवभिश_ पूजा करने से रोका र्था, क्योद्विक उसके कारण मंद्विदर को Aाली नहीं कराया जा सकर्ताा र्था, जबद्विक भक्त दश*न के खिलए प्रर्ताीक्षा कर रहे र्थे। वह आज भी भगवान द्विवश्वनार्थ की राद्वित्र भोग आरर्ताी, मनोयोग से करना (ाहर्ताे हैं, जब र्ताक उसका शरीर उनका सार्थ दे। वह द्विकसी भी पदाधि कारी से द्विकसी भी प्रकार की भिशकायर्ता का भाव नहीं रAर्ताे हैं। मात्र उधि(र्ता सम्मान के प्रार्थž है। १४. याधि(काकर्ताा* के द्विव&ान वरिरष्ठ अधि वक्ता श्री ए(. एन. सिंसह ने प्रधिर्तावेदन द्विकया द्विक प्रधिर्तावादी संख्या पां( ने कोई प्रत्युत्तर नहीं द्विदया है एवं प्रधिर्तावादी संख्या - १,२ एवं ३ के &ारा दाखिAल प्रधिर्ताशपर्थ पत्र में पूव* में उ•ेखिAर्ता घटना को बहुर्ता सामान्य रूप से अस्वीकार द्विकया है एवं अन्य कारकों के दृद्वि_गर्ता वो घटना ही आक्षेद्विपर्ता आदेश पारिरर्ता करने का कारण हो सकर्ताी है। द्विवधि क रूप से आक्षेद्विपर्ता आदेश पारिरर्ता नहीं द्विकया जा सकर्ताा र्था। आक्षेद्विपर्ता आदेश र्ताथ्यात्मक दृद्वि_ से भी द्विवकृ र्ता है। जब याधि(काकर्ताा* अद्विववाद्विदर्ता रूप से न्यास का कम*(ारी ही नहीं है र्ताो अधि द्विनयम - १९८३ के उपबन् उस पर लागू ही नहीं हो सकर्ताे हैं। अस्थिन्र्ताम न्यास की बैठक में खिलये गये द्विनण*यों का पूण*र्ताः द्विवपरीर्ता अर्थ* , आक्षेद्विपर्ता आदेश में द्विदया गया है जो 11 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० न्यायसंगर्ता नहीं है। इसी प्रकार याधि(काकर्ताा* ६० वर्षों* का हो गया है मात्र इस कारण 'आ(ाय*' का काय* नहीं कर सकर्ताा, यह द्विनण*य भी न्यायसंगर्ता नहीं है। १५. प्रधिर्तावादी सं० १,२ व ३ के द्विव&ान अधि वक्ता श्री द्विवनीर्ता संकल्प ने आक्षेद्विपर्ता आदेश का समर्थ*न करने की अस—ल कोभिशश करी, क्योद्विक उपरोक्त वर्णिणर्ता र्ताथ्य उनके द्विकसी भी र्ताक* के द्विवरो में है। उन्होनें पुनः द्विनवेदन द्विकया द्विक यह न्यायालय वर्ता*मान प्रकरण की परिरस्थिस्र्थधिर्तायों के दृद्वि_गर्ता जो आदेश पारिरर्ता करेगा , उसका यर्थायोग सम्मान द्विकया जायेगा। १६. उपरोक्त के संदभ* में इस न्यायालय का मर्ता है द्विक याधि(काकर्ताा* के पक्ष में द्विदये र्ताक* में बल है द्विक आक्षेद्विपर्ता आदेश र्ताथ्यात्मक व द्विवधि क दोनों रूपों में त्रुद्विटपूण* है। यह भी द्विन ा*रिरर्ता द्विकया जा सकर्ताा है द्विक आदेश द्विदनांद्विकर्ता १२.०७.२००० स्वयं में द्विवरो ाभार्षोंी है। याधि(काकर्ताा* न र्ताो न्यास का कम*(ारी और न ही ६० वर्षों* की उम्र के के उपरान्र्ता भी, उपरोक्त काय* सम्पाद्विदर्ता करने में कोई द्विवधि क बा ा है परिरस्थिस्र्थधिर्तायों के दृद्वि_गर्ता आक्षेद्विपर्ता आदेश पूवा*ग्रह से ग्रसिसर्ता भी प्रर्ताीर्ता होर्ताा है। 'आ(ाय*' का पद एक परम्परागर्ता पद है या यह कहा जा सकर्ताा है द्विक यह एक 'दाधियत्व' है। उसकी मंद्विदर के द्विकसी सा ारण कम*(ारी से र्ताुलना नहीं की जा सकर्ताी है। अर्ताः आदेश द्विदनांद्विकर्ता १२.०७.२००० Aस्थिण्डर्ता द्विकया जार्ताा है और इसी कारणवश अन्य आदेश द्विदनांद्विकर्ता २२.०२.२०२३ भी न्यायसंगर्ता न होने के कारण Aस्थिण्डर्ता द्विकया जार्ताा है और समस्र्ता परिरस्थिस्र्थधिर्तायों व सभी पक्षों के प्रधिर्तावेदन के दृद्वि_गर्ता वर्ता*मान याधि(का द्विनम्न द्विनदŸशों के सार्थ द्विनस्र्ताारिरर्ता की जार्ताी हैः- क. याधि(काकर्ताा* पूव* की भांधिर्ता ही राद्वित्र भोग श्रृंगार आरर्ताी का सम्पादन द्विवधि पूव*क करर्ताा रहेगा। सिजसका कोई मानदेय नहीं होगा। A. प्रधिर्तावादी संख्या १,२ व ३ यह सुद्विनधिश्चर्ता करेंगे द्विक पूजन-अ(*न सुगमर्ताा से सम्पाद्विदर्ता होर्ताा रहे एवं याधि(काकर्ताा* उधि(र्ता सम्मान का अधि कारी रहेगा। ग. याधि(काकर्ताा* यद्विद (ाहे र्ताो सप्ताह में र्ताीन द्विदन (सोमवार, बुद्धवार व गुरूवार) को ही राद्वित्र भोग श्रृंगार आरर्ताी करने का द्विनण*य ले सकर्ताा है और इसके खिलए वो प्रधिर्तावादी को २ सप्ताह के भीर्तार सूधि(र्ता करेगा। 12 रिरट ए संख्या-३११२५/२००० घ. राद्वित्र भोग श्रृंगार आरर्ताी के समय याधि(काकर्ताा* अपने सार्थ एक सहयोगी रA सकर्ताा है बशर्ताŸ वो कम*-काण्ड व पूजा-पद्यधिर्ता का उधि(र्ता ज्ञार्ताा हो। ङ. प्रधिर्तावादी संख्या १,२ व ३ यद्विद द्विन ा*रिरर्ता करना (ाहें र्ताो मास में एक द्विदवस व कु छ समय द्विनधिश्चर्ता कर सकें गे, सिजससे याधि(काकर्ताा*, उपासकगणों को कम*-काण्ड से सम्बस्थिन् र्ता भिशक्षा दे सके । ऐसा आयोजन मंद्विदर परिरसर में ही होगा। (. याधि(काकर्ताा* स्वः इच्छा से राद्वित्र भोग श्रृंगार आरर्ताी का सम्पादन कभी भी त्याग सकर्ताे है, उसका स्वास्थ्य एक कारण हो सकर्ताा है। ऐसा करने के पूव* वह न्यास को सूधि(र्ता करेगा। छ. याधि(काकर्ताा* से अपेक्षा रहेगी द्विक वो एक वरिरष्ठ अनुभवी व्यद्विक्त होने के नार्ताे अपने उक्त कृ त्यों में सरलर्ताा बनाये रAेगा। १७. उपरोक्त द्विनदŸशों के संदभ* में द्विकसी द्विववाद की दशा में , जब द्विववाद आपसी बार्ता(ीर्ता से सुलझ न पायें र्ताो कोई भी पक्षकार, इस न्यायालय में पुन*द्विव(ार याधि(का दाखिAल करने के खिलए स्वर्तांत्र रहेगा। द्विनण*य द्विदनांक- २४.०९.२०२५ अव ेश (०२ अधिश्वन, १९४७ शक ) (सौरभ श्याम शमशेरी, न्यायमूर्तिर्ता) Digitally signed by :- AWADESH KUMAR High Court of Judicature at Allahabad