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2026:CGHC:15022 अप्रतिवेद्य छत्ती सगढ़ उच्च न्यायालया
, तिलसपुर
तिर्णया सरति ति क-13/03/2026 तिर्णया उद्घो*ति+ ति क-01/04/2026 ण्डि./क अपु ल क्रमां क
-1756
/2025
1. सजी गप्ता तिपु-अजीया गप्ता, उम्र-लगभग 21 वे+, तिवेस -ति8कर र*/, अ तिकपुर, पुलिलस था-अ तिकपुर, लिजील-सरगजी, छत्ती सगढ़,
2. अजी गप्ता तिपु-अजीया गप्ता, उम्र-लगभग 21 वे+, तिवेस -ति8कर र*/, अ तिकपुर, पुलिलस था-अ तिकपुर, लिजील-सरगजी, छत्ती सगढ़ -----अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण तिवेरूद्घो छत्ती सगढ़ रज्या, द्वार पुलिलस था-अ तिकपुर, लिजील-सरगजी, छत्ती सगढ़ -----उत्तीरवे /रज्या अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण द्वार : श्री एच.एस. अहलEवेलिलया, अलिFवेक्त । उत्तीरवे /रज्या द्वार : श्री क ल8 सहH, पुIल अलिFवेक्त । न्यायामांEति श्री स जीया क मांर जीयासवेल !! स .ए.वे . तिर्णया !! 1. भर या गरिरक सर स तिह, 2023 कL Fर-415 (2) क ह प्रस् इस ण्डि./क अपु ल मांQ तिवेचरर्ण न्यायालया-तिवे8+ न्यायाF 8 {असEतिच जीति एवे असEतिच जीजीति POMAN DEWANGAN Digitally signed by POMAN DEWANGAN Date: 2026.04.01 17:25:33 +0530
2 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} (अत्याचर तिवेरर्ण) अलिFतियामां, 1989 क ह गतिV न्यायालया, लिजीस आग स पु मांQ
“तिवे8+ अलिFतियामां” स स *लिF तिकया जी रह हI}, सरगजी, अ तिकपुर (छत्ती सगढ़) द्वार तिवे8+ सत्र (तिवे8+ अलिFतियामां) प्रकरर्ण क्रमां क 25/2022 “छत्ती सगढ़ रज्या तिवेरुद्ध सजी गप्ता एवे एक अन्या” मांQ पुरिर तिर्णया ति क 28/07/2025 क* च^
गई हI । लिजीसक ह अपु लथा;गर्ण क* तिम्सर *+लिसद्ध कर ण्डि./ तिकया गया हI । लिजीस आग स पु मांQ “प्रश्F तिर्णया” स स *लिF तिकया जी रह हIb- अपु लथा; क मां *+लिसतिद्ध ./8 सजी गप्ता एवे अजी गप्ता Fर-427/34 भर या ./ स तिह, 1860 06 मांह क सश्रीमां करवेस एवे 5,000/-रूपुया क अथा./ था अथा./ रति8 अ कर कL 8 मांQ 01 मांह क अतिरिरक्त सश्रीमां करवेस कL सजी । Fर-452/34 भर या ./ स तिह, 1860 01 वे+ क सश्रीमां करवेस एवे 5,000/- रूपुया क अथा./ था अथा./ रति8 अ कर कL 8 मांQ 01 मांह क अतिरिरक्त सश्रीमां करवेस कL सजी । Fर-307/34 भर या ./ स तिह, 1860 07 वे+ क सश्रीमां करवेस एवे 10,000/-रूपुया क अथा./ था अथा./ रति8 अ कर कL 8 मांQ 03 मांह क अतिरिरक्त सश्रीमां करवेस कL सजी । सभ मांEल सजीए सथा-सथा चलQग ।
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2. उपुर*क्त “प्रश्F तिर्णया” क ह तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार अपु लथा;गर्ण क* Fर-294, 506 (भग-*) भर या ./ स तिह, 1860 एवे “तिवे8+ अलिFतियामां” कL Fर-3(2)( ) v क अपुरF मांQ *+मांक्त तिकया गया ।
3. अतिभया*जी मांमांल स पु मांQ इस प्रकर हI तिक आह स जीया चरवे (अ.स.-2), तिवेस
^र पुर, अ तिकपुर, अपु आवेस या पुरिरसर क अन्या कमांरc क* तिकरया पुर तिए हdए था । घट ति क 27/02/2022 कL रतित्र लगभग 08:00 जी उस तिकरयार तिल्लूE क घर क पुस 8*र सकर वेहh जीकर खा, जीहh अपु लथा; सजी गप्ता उसस तिवेवे कर लग, लिजीस उस समांझा-झाकर वेपुस भजी तिया, पुर उस रतित्र लगभग 11:00 जी पुb *ड़-फो*ड़ कL आवेजी सकर हर आ पुर पुया तिक अपु लथा;गर्ण, जी* आपुस मांQ भई हm, उस ग गलिलयाh हdए हर तिकल क* कह रह था था जी स मांर कL FमांकL हdए रवेजी पु टकर Fक्क कर आhग मांQ घस गए, अपु लथा;गर्ण द्वार उसक स्कoतिपुया* वेह क 8 8c क* भ *ड़कर कस पुहdhचया गया और हत्या कर कL तिया स Fरर चकE स उसक पुट मांQ वेर कर तिया, लिजीसस उसकL आhQ हर तिकल आई और अत्यालिFक रक्तस्रावे ह* लग; इस ^र उसकL पुत् लिसयास वे (अ.स.-1), पुड़*स रन्द्र रजीक (अ.स.-7) एवे तिकरयार तिवे8ल आति मां^क पुर आ गए, लिजीसक पुश्च उस उपुचर ह अस्पुल ल जीया गया जीहh उसक ऑपुर8 तिकया गया । पुत्
लिसयास वे कL सEच पुर ति क 28/02/2022 क* प्रथामां सEच पुत्र (प्र8 पु -1) जी कL गई, घटस्थाल क क्8 (प्र8 पु -2) Iयार तिकया गया, प्रथा; क जीति प्रमांर्ण-पुत्र जीब् तिकया गया, अपु लथा; अजी गप्ता क प्रकट करर्ण कथा क आFर पुर चकE था अपु लथा; सजी गप्ता क प्रकट करर्ण कथा क आFर पुर ई ट क टकड़ जीब् तिकया गया, जीब् वेस्ओं क* रसयातिक पुर र्ण ह भजी गया, मां^क-क्8 एवे
4 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} कस पु चमां (प्र8 पु -23) Iयार कर सतियाc क कथा लिलए गए, था अपु लथा;गर्ण क* तिगरफ्र कर तिवेवेच पुEर्ण कर हdए अतिभया*गपुत्र प्रस् तिकया गया ।
4.
तिवेचरर्ण क ^र आर*पु क प्रमांर्ण ह अतिभया*जी कL ओंर स अपु पु समांथा मांQ क ल 11 सतियाc क पुर र्ण करया गया था 28 स्वेजी प्रति8 तिचन्ह तिक करए गए । Fर 313 ./ प्रतिक्रया स तिह क ह कथा मांQ अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण अपु तिवेपुर आए, सतियाc क कथाc क* इ कर कर हdए स्वेया क* तिx+ ह* या और कह हI तिक प्रथा; द्वार अपु लथा; सजी गप्ता क सथा मांरपु ट कL गई था लिजीसस वेह अस्पुल मांQ भ; था उस अपुरF स च वेस् प्रथा; पु क द्वार उक तिवेरूद्घो 8 क और /र क करर्ण स झाEV रिरपु*ट लिलखाई गई हI । चवे मांQ क*ई सक्ष्या प्रस् हz तिकया । उभयापु क स जीकर तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण क* इस तिर्णया कL कण्डि./क-1 क असर *+लिसद्ध कर ण्डि./ तिकया गया हI । लिजीस इस अपु ल मांQ च^
गई हI ।
5. अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण क तिवेद्वा अलिFवेक्त क क हI तिक आह स जीया चरवे (अ.स.-2) क* क वेल एक ह च*ट करिर हdई हI । प्रथामांदृष्टया हत्या क प्रयास क अपुरF हz । याह भ क प्रस् तिकया गया हI तिक अपु लथा; अजी गप्ता लगभग 04 वे+ स अलिFक समांया स अतिभर मांQ हI । याह भ क तिकया गया हI तिक वेह मांत्र 19 वे+;या वेयावेक हI, लिजीसक क*ई पुEवे आपुरलिFक इतिहस हz हI, उस पुर पुरिरवेरिरक तियात्वे हm था प्रथा; पु स उसक क*ई पुEवे वेIमांस्या या तिवेवे भ हz रह हI । याति उस *+ पुया जी हI * भर या ./ स तिह कL Fर 307 क अ ग तिFरिर करवेस क* कमां कर हdए उसकL अतिभर अवेलिF क स तिमां तिकया जी न्याया*तिच ह*ग ।
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6. अपु लथा; पु क तिवेद्वा अलिFवेक्त क अपु लथा; सजी गप्ता क स F मांQ क हI तिक उसक प्रथा; पु स क*ई पुEवे वेIमांस्या हz रह हI, लिजीस स्वेया प्रथा; पु द्वार भ स्वे कर तिकया गया हI । घट क ^र स्वेया प्रथा; द्वार सजी गप्ता क सथा मांरपु ट कL गई, लिजीसस उस च*टQ आई , था प्रथा; स जीया भ उस थाप्पुड़ मांर स्वे कर तिकया हI, लिजीसकL पुतिष्ट अतिभया*जी स कतिपुलवे चरवे (अ.स.-9) द्वार भ कL गई हI । याह भ क तिकया हI तिक अपु लथा; सजी गप्ता स तिकस चकE कL जीब् हz हdई हI । प्रथा; उसक तिवेरूद्घो ढ़-चढ़कर कथा तिकया हI । उस क वेल सह-अतिभयाक्त अजी गप्ता क सथा समांन्या आ8या (Fर 34 भ. .स .) क आFर पुर Fर 307 भ. .स . क अ ग *+ Vहरया गया हI, जीतिक * उस आह स जीया चरवे क* क*ई च*ट करिर कL हI और ह
सह-अतिभयाक्त क सथा उसक क*ई समांन्या आ8या प्रमांतिर्ण हI । अb उसक तिवेरुद्ध Fर 307/34 भ. .स . क अ ग कL गई *+लिसतिद्ध तिवेलिFस ग हz हI और अपुस् तिकए जी या*ग्या हI । वेIकण्डि•पुक रूपु स याह तिवे तिकया गया हI तिक याति उस तिकस अन्या अपुरF क लिलए *+ पुया जी हI, * उसकL करवेस अवेलिF, जी* लगभग 10 मांह 07 ति हI, क ह स तिमां कL जीए । तिवेद्वा अलिFवेक्त द्वार अपु क क समांथा मांQ न्यायादृष्ट
. , (2001) 4 193 Mithu Singh v State of Punjab SCC था 907
& . , Constable Surendra Singh Another v State of Uttarakhand (2025) 5 SCC 433 क हवेल तिया गया हI ।
7. रज्या/उत्तीरवे क तिवेद्वा अलिFवेक्त क क हI तिक आह स जीया चरवे (अ.स.-2) अतिभया*जी मांमांल क पुEर्ण समांथा तिकया हI, लिजीसक कथाc कL पुतिष्ट मां^क क सतियाc, जीIस उसकL पुत् लिसयास वे (अ.स.-1), पुत्र क मांर सह चरवे (अ.स.-3) एवे पुड़*स कतिपुलवे चरवे (अ.स.-9) क कथा, सथा ह तिचतिकत्स या सक्ष्या एवे रसयातिक
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A. No.-1756 of 2025} पुर र्ण प्रतिवे स ह* हI । स पुEर्ण सक्ष्या स याह स्पुष्ट हI तिक प्रथामां घट क पुश्च *c अपु लथा;गर्ण, जी* आपुस मांQ सग भई हm, समांन्या आ8या तितिमां कर चकE स ससण्डिज्जी ह*कर रतित्र लगभग 11:00 स 11:30 जी प्रथा; क घर पुहd च और घर मांQ अलिFक• प्रवे8 कर क वेल स्कoतिपुया* वेह क* तिग्रस् तिकया, ण्डि•क प्रथा; स जीया चरवे क पुट मांQ चकE स प्रहर कर उसकL हत्या क प्रयास तिकया, लिजीसस उस ग भ र च*टQ आई और उसक आ रिरक अ ग हर तिकल आए । समांस् सक्ष्या क आFर पुर अपु लथा; सजी गप्ता क भ समांन्या आ8या पुEर्णb प्रमांतिर्ण ह* हI । अपुरF कL प्रक• ति अत्या ग भ र ह* क करर्ण अपु लथा; पु क क स्वे कर या*ग्या हz हm, प्रश्F *+लिसतिद्ध एवे ./8 पुEर्णb तिवेलिFसम्मां एवे उतिच हm, इसलिलए अपु ल खारिरजी तिकया जीए ।
8. उभयापु क क श्रीवेर्ण तिकया गया और अतिभलखा क सEक्ष्मांपुEवेक पुरिर8 ल तिकया गया ।
9.
सवेप्रथामां अपु लथा; अजी गप्ता क स F मांQ तिवेचर कर पुर याह स्पुष्ट ह* हI तिक आह स जीया चरवे (अ.स.-2) अपु न्यायालया कथा मांQ अतिभया*जी मांमांल कL पुतिष्ट कर हdए या हI तिक ति क 27/02/2022 कL रतित्र लगभग 11:00 स 11:30 जी *c अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण उसक पुरिरसर क गट क ल *ड़कर प्रवे8 तिकए और वेहh खाड़ स्कoतिपुया* वेह क 8 8 *ड़कर कस पुहdhचया; 8*र सकर जी वेह हर तिकल, अपु लथा; अजी गप्ता उसक पुट मांQ चकE स प्रहर तिकया । उस समांया अपु लथा; सजी गप्ता भ चकE लिलए हdए था और उस भ उस पुर वेर कर क प्रयास तिकया, तिक चकE च तिगर गया, था मांQ अजी द्वार घ*पुQ चकE क* पुकड़कर सजी गप्ता उस घमां क प्रयास तिकया, पुर वेह सफोल हz ह* सक । चकE क वेर स उसक पुट कL ग भ र च*ट क करर्ण आhQ हर तिकल आई और अत्यालिFक रक्तस्रावे ह* लग,
7 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} लिजीसक पुश्च उसकL पुत् एवे पुड़*लिसयाc द्वार उस उपुचर ह तिमां8 अस्पुल, अ तिकपुर ल जीया गया ।
10. मां^क कL स क रूपु मांQ आह स जीया चरवे कL पुत् लिसयास वे (अ.स.-1) अपु कथा मांQ घटक्रमां कL पुतिष्ट कर हdए या हI तिक अपु लथा;गर्ण उसक घर मांQ घसकर उसक पुति क सथा चकE स मांरपु ट तिकए था स्कoतिपुया* वेह मांQ *ड़-फो*ड़ कL । इस स स्पुष्ट रूपु स कह हI तिक अपु लथा; अजी गप्ता उसक पुति क पुट मांQ चकE स प्रहर तिकया था, लिजीसक खा./ हz ह* सक हI । उसक द्वार लिलखाई गई प्रथामां सEच पुत्र (प्र8 पु -1) मांQ भ इस थ्या क स्पुष्ट उल्लूखा हI तिक अपु लथा; अजी गप्ता द्वार प्रथा; स जीया चरवे क पुट मांQ चकE स वेर तिकया गया था ।
11.
तिचतिकत्सक अच ऑथार (अ.स.-5) अपु न्यायालया कथा मांQ याह या हI तिक स जीया चरवे क पुर र्ण मांQ उसक पुट क ऊपुर भग क ई ओंर लगभग 4 इ च क घवे पुया गया, जी* भ र क घस हdआ था था पुट कL आ रिरक लिझाल्लू (ओंमांQटमां) हर तिकल हdई था । आग याह भ या हI तिक ति क 28/02/2022 क* ऑपुर8 क ^र छ*ट आ मांQ * स्थाc पुर क ल चर छ पुए गए, जी* ग भ र प्रक• ति कL च*टQ थाz । इस प्रकर, आह स जीया चरवे क* करिर च*टc कL प्रक• ति, उकL ग भ र था 8र र क अत्या स वे8 ल अ ग—पुट—पुर Fरर हलिथायार स प्रहर तिकए जी कL पुरिरण्डिस्थाति क* दृतिष्टग रखा हdए याह स्पुष्ट ह* हI तिक उस पुर प्रर्णघक हमांल तिकया गया, जी* हत्या क प्रयास कL श्रीर्ण मांQ आ हI ।
12. आह स जीया चरवे कL पुत्र क मांर सह चरवे (अ.स.-3), पुड़*स रन्द्र रजीक (अ.स.-7) था कतिपुलवे चरवे (अ.स.-9) क या स भ याह स्पुष्ट ह* हI तिक याद्यतिपु उन्हc चकE स प्रहर कर हdए प्रत्या रूपु स हz खा, थातिपु वे घट क त्कल
8 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} पुश्च स्थाल पुर पुहd च था । वेहh अतिभयाक्त अजी गप्ता कL उपुण्डिस्थाति पुई गई था , लिजीस पुकड़कर रखा गया था था मांQ पुहdhच पुलिलस उस अपु सथा ल गई । इस प्रकर उपुलब्F सक्ष्या स याह स ह स पुर स्थातिपु ह* हI तिक घट मांQ अतिभयाक्त अजी गप्ता मांख्या अतिभयाक्त क रूपु मांQ स लिलप्ता था । अb तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार उसक तिवेरुद्ध Fर 307, 452 एवे 427 भर या ./ स तिह क अ ग कL गई *+लिसतिद्ध मांQ क*ई त्रतिट पुरिरलति हz ह* हI । जीहh क ./8 क प्रश् हI, उसक स F मांQ आग तिवेचर तिकया जीयाग ।
13.
अपु लथा;/अतिभयाक्त सजी गप्ता क स F मांQ प्रथा; स जीया चरवे (अ.स.-2), मां^क कL स उसकL पुत् लिसयास वे (अ.स.-1), पुत्र क मांर सह चरवे (अ.स.-3) था पुड़*स रन्द्र रजीक (अ.स.-7) एवे कतिपुलवे चरवे (अ.स.-9) क समांग्र या क अवेल*क कर पुर याह स्पुष्ट ह* हI तिक लिजीस समांया अपु लथा; अजी गप्ता रतित्र मांQ प्रथा; क घर मांQ जीर प्रवे8 कर स्कoतिपुया* वेह क* ति पुहdhचई एवे प्रथा; स जीया चरवे क पुट मांQ चकE स प्रहर कर उसकL हत्या क प्रयास तिकया, उस समांया उसक भई अपु लथा; सजी गप्ता भ उसक सथा उपुण्डिस्था था । समांस् सक्ष्या स याह भ प्रतिपुति ह* हI तिक *c अपु लथा;गर्ण पुEवे Iयार क सथा रतित्र मांQ प्रथा; क घर मांQ प्रवे8 कर *ड़-फो*ड़ कर हdए वेह क* कस पुहdhचए था, अb Fर 452 एवे 427 भर या ./ स तिह क अपुरF मांQ अतिभयाक्त अजी गप्ता क सथा-सथा अतिभयाक्त सजी गप्ता कL स लिलप्ता भ
समां रूपु स प्रमांतिर्ण ह* हI, लिजीसक स F मांQ अपु लथा; द्वार *+लिसतिद्ध क तिवे+या मांQ क*ई तिवे8+ आपुलित्ती भ हz कL गई हI ।
14. प्रथा; स जीया चरवे कL हत्या क प्रयास मांQ अपु लथा; पु क तिवेद्वा अलिFवेक्त द्वार याह क प्रस् तिकया गया हI तिक अपु लथा; सजी गप्ता क क*ई समांन्या आ8या हz था । इस क पुर उपुलब्F सक्ष्या क आल*क मांQ सEक्ष्मांपुEवेक तिवेचर तिकया जी आवेश्याक हI ।
9 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025}
15. Fर-34 भर या ./ स तिह, 1860 लिजीसमांQ तिक समांन्या आ8या क* या गया हI वेह तिम्सर हIb-
“34. समांन्या आ8या क* अग्रसर कर मांQ कई व्यातिक्तयाc द्वार तिकए गए कया -- जीतिक क*ई आपुरलिFक कया कई व्यातिक्तयाc द्वार अपु स क समांन्या आ8या क* अग्रसर कर मांQ तिकया जी हI, ऐस व्यातिक्तयाc मांQ स हर व्यातिक्त उस कया क लिलए उस प्रकर तियात्वे क अF हI, मां वेह कया अक ल उस तिकया ह* ।"
16. ‘समांन्या आ8या’ कL अवेFरर्ण क स F मांQ मां या उच्चमां न्यायालया द्वार तिवेतिभन्न तिर्णयाc मांQ अपु अतिभमां व्याक्त तिकए हm । इस स भ मांQ Mithu Singh (पुEवेxक्त) क तिर्णया मांQ प्रतिपुति लिसद्ध मांग8क हI, लिजीसकL कण्डि./क-06 मांQ तिम्लिललिखा अतिभव्यातिक्त कL गई हI—”
“6.
To substantiate a charge under Section 302 with the aid of Section 34 it must be shown that the criminal act complained against was done by one of the accused persons in furtherance of the common intention of both. Common intention has to be distinguished from same or similar intention. It is true that it is difficult, if not impossible, to collect and produce direct evidence in proof of the intention of the accused and mostly an inference as to intention shall have to be drawn from the acts or conduct of the accused or other relevant circumstances, as available. An inference as to common intention shall not be readily drawn; the culpable liability can arise only if such inference can be drawn with a certain degree of assurance. At the worst Mithu Singh, accused-appellant, knew that his co-accused
10 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} Bharpur Singh was armed with a pistol. The knowledge of previous enmity existing between Bharpur Singh and the deceased can also be attributed to Mithu Singh. But there is nothing available on record to draw an inference that the co-accused Bharpur Singh had gone to the house of the deceased with the intention of causing her death and such intention was known to Mithu Singh, much less shared by him. Simply because Mithu Singh was himself armed with a pistol would not necessarily lead to an inference that he had also reached the house of the deceased or had accompanied the co-accused Bharpur Singh with the intention of causing the death of Gurdial Kaur. In our opinion, an inference as to Mithu Singh, accused-appellant having shared with Bharpur Singh a common intention of causing the murder of the deceased Gurdial Kaur cannot be drawn. His conviction under Sections 302/34 IPC cannot be sustained and must be set aside.”
17. Constable 907 Surendra Singh & Another (पुEवेxक्त) क प्रकरर्ण मांQ मां या सवेxच्च न्यायालया द्वार कण्डि./क-30 मांQ तिम्सर तिवेलिF लिसद्ध प्रतिपुति तिकया गया हI—
“30.
By now it is a settled principle of law that for convicting the accused with the aid of Section 34IPC the prosecution must establish prior meetings of minds. It must be established that all the accused had pre- planned and shared a common intention to commit the crime with the accused who has actually committed the crime. It must be established that the criminal act has been done in furtherance of the common intention of all the accused. Reliance in support of the aforesaid
11 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} proposition could be placed on the following judgments of this Court in the cases of: (i) Ezajhussain Sabdarhussain v. State of Gujarat, (2019) 14 SCC 339; (ii) Jasdeep Singh v. State of Punjab, (2022) 2 SCC 545; (iii) Gadadhar Chandra v. State of W.B., (2022) 6 SCC 576; and (iv) Madhusudan v. State of M.P., (2024) 15 SCC 757.”
18.
उपुर*क्त न्यायादृष्ट c क आल*क मांQ वेमां प्रकरर्ण क थ्या एवे सक्ष्या क सEक्ष्मां पुर र्ण कर पुर याह पुरिरलति ह* हI तिक प्रथा; स जीया चरवे (अ.स.-2) क न्यायालया कथा हI तिक घट कL रतित्र लगभग 09:00 जी अपु लथा; सजी गप्ता उसक आवेस या पुरिरसर मांQ पुEवे स उपुण्डिस्था था, जी* उसस तिवेवे कर लग एवे अश्ल ल गल -गल^जी कर लग, लिजीस पुर उस उस थाप्पुड़ मांरकर पुरिरसर स हर तिकल तिया और ल कर अ र चल गया । इसक पुश्च रतित्र लगभग 11:00 स 11:30 जी अपु लथा;गर्ण ल खा*लकर घस, स्कoतिपुया* वेह क* तिग्रस् कर उस चकE मांरQ । सजी गप्ता क हथा मांQ चकE था और उस उस पुर वेर कर क प्रयास तिकया, तिक चकE च तिगर गया । थातिपु, याह उल्लूखा या हI तिक तिवेवेच क ^र घटस्थाल स क*ई चकE रमां हz तिकया गया था तिवेवेचक उपुतिर क प्रमां* क मांर पु./या (अ.स.-10) भ अपु लथा; सजी गप्ता स तिकस चकE कL जीब् हz ई हI । सजी गप्ता क प्रकट करर्ण कथा क आFर पुर क वेल ई ट क आF टकड़ जीब् तिकया जी या हI, जी* अतिभया*जी कथासर स्कoतिपुया* वेह क* तिग्रस् कर मांQ प्रयाक्त हdआ । याह भ मांहत्वेपुEर्ण हI तिक आह स जीया क याह कथा हI तिक अजी द्वार मांर गए चकE क* सजी घमां क प्रयास तिकया, लिजीसक उल्लूखा * उसक पुलिलस कथा (प्र8 / -2) मांQ हI और ह प्रथामां
12 / 16 {Cr.
A. No.-1756 of 2025} सEच पुत्र (प्र8 पु -1) मांQ हI । याद्यतिपु प्रथामां सEच पुत्र मांQ *c अपु लथा;गर्ण द्वार चकE स प्रहर कर क उल्लूखा हI, थातिपु तिचतिकत्सक अच ऑथार (अ.स.-5) द्वार आह क 8र र पुर चकE क एक ह घवे पुया जी इस थ्या क* स तिग्F हI । अb आह स जीया चरवे था उसकL पुत् लिसयास वे (अ.स.-1) क याह कथा तिक अपु लथा; सजी गप्ता भ चकE स प्रहर कर क प्रयास तिकया, तिवेश्वेस या हz पुया जी, तिवे8+b जी उसक पुस स क*ई चकE रमां हz हdआ हI और ह प्रर तिभक कथा मांQ इस आ8या क स्पुष्ट उल्लूखा हI ।
19. उपुर*क्त न्यायादृष्ट c क आल*क मांQ उपुलब्F सक्ष्या क पुर र्ण कर पुर याह स्पुष्ट ह* हI तिक प्रथा; स जीया चरवे (अ.स.-2), उसकL पुत् लिसयास वे (अ.स.-1) एवे अन्या सतियाc क कथा स प्रथामां घट रतित्र लगभग 08:00–09:00 जी क मांध्या घतिट ह* स्थातिपु हI, जी अपु लथा; सजी गप्ता प्रथा; क आवेस या पुरिरसर मांQ उपुण्डिस्था पुया गया था वे-तिवेवे कL ण्डिस्थाति मांQ उसक द्वार जीतिग एवे अश्ल ल गल -गल^जी कर FमांकL
गई, लिजीस पुर स्वेया आह स जीया उस थाप्पुड़ मांरकर भग तिया । उक्त घट मांEल अपुरF क हक प्र ह* हI । इसक पुश्च रतित्र मांQ घतिट Eसर घट, लिजीसमांQ अपु लथा;गर्ण द्वार घर मांQ प्रवे8 कर स्कoतिपुया* वेह क* ति पुहdhच था सह-अतिभयाक्त अजी गप्ता द्वार आह स जीया क पुट मांQ चकE स प्रहर तिकया गया, उसक स F मांQ स पुEर्ण सक्ष्या स याह स्पुष्ट रूपु स स्थातिपु हz ह* तिक अपु लथा; सजी गप्ता क* याह जीकर
था तिक उसक भई अजी गप्ता चकE स ससण्डिज्जी था । समांन्या आ8या क गV ह
“पुEवे सहमांति” आवेश्याक ह* हI, तिकन् सक्ष्या मांQ ऐस क*ई थ्या पुरिरलति हz ह* तिक सजी गप्ता अपु भई क* चकE स प्रहर कर ह उकसया ह* या प्रहर क समांया तिकस प्रकर स उसक सहया*ग तिकया ह*, जीIस तिक आह क* पुकड़कर रखा । इसक
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A. No.-1756 of 2025} तिवेपुर , पुड़*स स कतिपुलवे चरवे (अ.स.-9) क कथा स याह थ्या भ उभरकर आ हI तिक सजी गप्ता क* भ च*टQ आई थाz, लिजीसस याह * प्रमांतिर्ण ह* हI तिक वेह घट स्थाल पुर उपुण्डिस्था था, तिकन् अजी गप्ता द्वार चकE स प्रहर कर मांQ उसक क*ई सतिक्रया सहया*ग या समांन्या आ8या स्थातिपु ह* प्रमांतिर्ण हz ह* । आह स जीया द्वार अपु कथा मांQ याह कह जी तिक सजी क हथा पुकड़ स उसकL हथाल कट गई था सजी h स उसक अ गEV क* कट लिलया, ऐस तिकस भ च*ट क तिचतिकत्सक स
अच ऑथार (अ.स.-5) द्वार समांथा हz तिकया गया हI । इस प्रकर, समांस् सक्ष्या स याह प्रमांतिर्ण हz ह* तिक अपु लथा; सजी गप्ता क अपु भई सह-अतिभयाक्त अजी गप्ता क सथा प्रथा; स जीया चरवे कL हत्या क प्रयास क लिलए समांन्या आ8या तितिमां हdआ था । अb तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार Fर 307 सहपुतिV Fर 34 भर या ./ स तिह क अ ग सजी गप्ता कL *+लिसतिद्ध उतिच हz हI । पुरिरर्णमांb अपु लथा; सजी गप्ता कL Fर 427 एवे 452 सहपुतिV Fर 34 भर या ./ स तिह क अ ग कL गई *+लिसतिद्ध कL पुतिष्ट कL जी हI, जीतिक Fर 307 सहपुतिV Fर 34 भर या ./ स तिह क अ ग कL गई *+लिसतिद्ध क* अपुस् कर हdए उस उक्त आर*पु स *+मांक्त तिकया जी हI ।
20. जीहh क ./ क प्रश् क स F हI, मां*हम्मां तिगयासद्दी मां आ ध्र प्र8 रज्या, (1977) 3 एस.स .स . 287 क प्रकरर्ण मांQ मां या सवेxच्च न्यायालया ./ तिFरर्ण क स भ मांQ सFरत्मांक लिसद्ध क* तिवे8+ मांहत्वे हdए
George Bernard Shaw क तिवेचरc क उद्धरर्ण तिकया हI, जी* इस प्रकर हI—“याति आपु तिकस व्यातिक्त क* प्रति8*Fत्मांक रूपु स ण्डि./ कर चह हm, * आपुक* उस आह कर ह*ग; तिकन्
14 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} याति आपु उस सFर चह हm, * आपुक* उस हर ह*ग, और मांष्या च*ट पुहdhच स हर हz ।” उक्त तिर्णया कL कण्डि./क-9 तिम्सर हI—
“9. Western jurisprudes and 'sociologists, from their own angle have struck a like note.
Sir Samual Romilly, critical of the brutal penalties in the then Britain, said in 1817 :
"The laws of England are written in blood". Alfieri has suggested : 'society prepares the crime, the criminal commits it’. George Nicodotis, Director of Criminological Research Centre, Athens, Greece, maintains that 'Crime is the result of the lack of the right kind of education.' It is thus plain that crime is a pathological aberration, that the criminal can ordinarily be redeemed, that the State has to rehabilitate rather than avenge. The sub-culture that leads to anti-social behaviour has to be countered not by undue cruelty but by re-culturisation. Therefore, the focus of interest in penology is the individual, and goal is salvaging him for society. The infliction of harsh and savage punishment is thus a relic of past and regressive times. The human today views sentencing as a process of reshaping a person who has deteriorated into criminality and the modern community has a primary stake in the rehabilitation of the offender as a means of social defense. We, therefore consider a therapeutic, rather than an in 'terrorem' outlook, should prevail in our criminal courts, since brutal incarceration of the person merely produces laceration of his mind. In the words of George Bernard Shaw : 'If you are to punish a man retributively, you must injure him. If you are to
15 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} reform him, you must improve him and, men are not improved by injuries'. We may permit ourselves the liberty to quote from Judge Sir Jeoffrey Streatfield : “If you are going to have anything to do with the criminal Courts, you should see for yourself the conditions under which prisoners serve their sentences.”
21.
उपुर*क्त न्यायादृष्ट क प्रक8 मांQ अपु लथा; सजी गप्ता कL *+लिसतिद्ध Fर 452/34 एवे 427/34 भर या ./ स तिह क अ ग उतिच पुया गया हI था उसक तिवेरुद्ध क*ई पुEवे आपुरलिFक आचरर्ण भ अतिभलखा पुर पुरिरलति हz ह* । याह भ थ्याग हI तिक वेह तिवेचरर्ण एवे अपु ल कL ल ति अवेलिF क ^र लगभग 10 मांह 07 ति क अतिभर मांQ रह हI । अb Fर 427/34 भर या ./ स तिह क अ ग कL गई *+लिसतिद्ध एवे ./8 कL पुतिष्ट कL जी हI, जीतिक Fर 452/34 भर या ./ स तिह क अ ग प्रत्ती करवेस क* घटकर उसकL पुEवे मांQ व्या कL गई अतिभर अवेलिF, अथा’ 10 मांह 07 ति, क स तिमां तिकया जी हI । अथा./ कL रति8 याथावे रखा जी हI ।
22. जीहh क अपु लथा; अजी गप्ता क ./8 क स F हI, Fर 452/34 एवे 427/34 भर या ./ स तिह क अ ग कL गई *+लिसतिद्ध एवे ./8 कL पुतिष्ट कL जी हI । Fर 307 भर या ./ स तिह क अ ग ./8 क प्रश् हI, याह पुरिरलति ह* हI तिक घट क समांया उसकL आया लगभग 19 वे+ था , घट वे+ 2022 कL हI, उस पुर पुरिरवेरिरक तियात्वे हm, तिगरफ्र पुत्रक (प्र8 पु -19) क असर वेह स्क स्र क ति8ति हI था उसक तिवेरुद्ध क*ई पुEवे आपुरलिFक आचरर्ण अतिभलखा पुर हz हI । इ समांस् पुरिरण्डिस्थातियाc क* दृतिष्टग रखा हdए Fर 307 भर या ./ स तिह क अ ग आर*तिपु 07 वे+ क करवेस क* घटकर उसकL अ क व्या कL गई अतिभर अवेलिF, जी* ति क 28/02/2022 स तिर र अतिभर मांQ रह हdए लगभग 04 वे+ 01
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A. No.-1756 of 2025} मांह 03 ति ह* चकL हI, क स तिमां तिकया जी हI था 8+ सभ ./8, तिवे8+कर अथा./ कL रति8, याथावे रखा जी हI ।
23. अपु लथा;गर्ण/अतिभयाक्तगर्ण क* जील मांQ तिरूद्घो या गया हI । याति उकL अन्या मांमांल मांQ आवेश्याक ह* * उन्हQ त्कल रिरह तिकया जीए ।
24. तिर्णया कL प्रति क सथा तिवेचरर्ण न्यायालया क* मांEल अतिभलखा था तिर्णया कL सत्याप्रतिलिलतिपु स लिF जील अF क क* आवेश्याक कयावेह ह सEचथा एवे पुलथा 8 घ्रपुEवेक प्रति+ ह* । सह /- (स जीया क मांर जीयासवेल) न्यायाF 8 पु*मां