VIJAY SHANKAR PANDEY v. STATE OF U.P. THRU. ADDL. CHIEF SECY. DEPTT. OF HOME LKO AND 8 OTHERS
CRLR/993/2025 · 2025-09-09
Saurabh Lavania
body2025
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[ 2025 DAILYLAW 163095 (ALL) · dailylaw.ai ]
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Judgment text
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HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD LUCKNOW CRIMINAL REVISION No. - 993 of 2025 Court No. - 11 HON'BLE SAURABH LAVANIA, J.
1. Heard learned counsel for the revisionist and learned counsel for the state and perused the record. 2. Present revision has been filed for the following main relief:-
"Wherefore it is most respectfully prayed before this Hon'ble court may kindly be pleased to set aside the order dated 24.6.2025 passed by Additional Chief Judicial Magistrate court no. 2 Unnao in Complaint Case No. 2919/2024 U/S- 395, 323, 427, 504, 506, 120(B) I.P.C. P.S. Ajgain District Unnao staled as Vijay Shankar Panday versus Vivek Kumar Gupta and other and direct the trial court to summon the accused person in above said case in the interest of Justice"
3. Relevant brief facts of the case, as pointed out by the learned counsel for the parties and born out from the record, are as under:- (i) An order was passed by the revenue Court in the proceedings related to the demarcation with regard to Gata No. 652, area 5 Bigha 2 Biswan and 3 Biswansi, situated at Village-Murtaza Nagar, District-Unnao (in short 'property in issue'). This order was favorable to the private opposite parties. (ii) The order of the revenue Court was assailed in terms of Section 219 of the UP Land Revenue Act, 1901 (in short, "Act of 1901"), which was registered as Revision No. 2014100001538 of 2014 (Vijay Shankar Pandey vs. Smt. Thakurdei and others). (iii) It is relevant to indicate that the revision aforesaid was filed impleading Versus Counsel for Revisionist(s) : Gulam Mustafa Counsel for Opposite Party(s) : G.A. Vijay Shankar Pandey .....Revisionist(s) State Of U.P. Thru. Addl. Chief Secy. Deptt. Of Home Lko And 8 Others .....Opposite Party(s)
Smt. Thakurdei W/o Late Harishankar, Smt. Surajmukhi W/o Ram Kishore, Chandramukhi W/o Naval Kishore and Smt. Neelam W/o Santosh Kumar, as respondents. (iv) By an order dated 03.09.2014 passed in the said revision, the parties were directed to maintain status quo. (v) After passing the order dated 03.09.2014 directing the parties to maintain status quo, Revenue Officials, including Rakesh Kumar Verma-Revenue Inspector, Sohanlal-Lekhpal, Murtazanagar, R.K.Srivastava-Sub-Inspector.
P.S.-Ajgain and Avdhesh Kumar, Constable, P.S.-Ajgain, visited the property in issue on 15.09.2014, the date of incident indicated in the complaint filed by the revisionist, in compliance of order of SDM, Sadar, Unnao dated 05.08.2014 as there was no occasion for the above-named opposite parties to be present at the alleged place of occurrence. (vi) After the aforesaid, a complaint case was filed making allegations against the opposite parties therein, including the official respondents named above, to attract the offense under Sections 323, 395, 427, 504, 506, 120-B IPC. (vii) Before proceeding further in the matter, it would be apt to take note of some other facts, which are as under:- (a) The revisionist before the Revenue Authorities claimed his rights over the property in issue on the basis of a 'Will' of the recorded tenure holder. (b) The said claim of the revisionist was rejected by the SDM concerned. (c) The name of the revisionist, in view of aforesaid, was not entered in the revenue records related to property n issue including the Khsara, which is the proof of possession, based upon which it can be inferred that the revisionist was in possession of the property in issue on 15.09.2014, the alleged date of incident. (d) The observations aforesaid in the impugned order dated 24.06.2025 have not been impeached by placing on record the relevant evidence. (e) Aforesaid indicates that the revisionist was not in possession of property in issue. (f) According to complaint, the revisionist was in possession of the property CRLR No. 993 of 2025 2
in issue on 15.09.2014, which from the aforesaid is not correct rather false. 4.
Taking note of the allegations levelled in the complaint and the statement(s) recorded under Section 200 and 202 CrPC, the Magistrate by an order dated 17.11.2015 summoned the opposite parties namely Vivek Kumar Gupta, Rakesh Kumar Verma, Sohanlal Gupta, R.K.Srivastava, Avadhesh Kumar Chauhan, Dinesh, Vishambhar and Arvind to face trial for the offense under Sections 323, 379, 427, 504, 506 IPC. 5. The order dated 17.11.2025 was challenged before this Court by means of an Application U/S 482/378/407 No. 526 of 2016 (Vivek Kumar Gupta vs. State of UP and Another) and Sri Gulam Mustafa, Advocate, who appeared in the present revision, was heard and vide order dated 18.01.2017, the said application was allowed and the matter was remanded back to the Magistrate. 6. The Magistrate again vide order dated 28.07.2022 summoned the accused namely Vivek Kumar Gupta, Rakesh Kumar Verma, Sohanlal Gupta, R.K.Srivastava, Avadhesh Kumar Chauhan, Dinesh, Vishambhar and Arvind to face trial for the offense under Sections 323, 395, 427, 504, 506, 120-B IPC. 7. The order of the Magistrate dated 28.07.2022 was challenged by means of Criminal Revision No. 116 of 2022 before the District and Sessions Court at Unnao (in short "Revisional Court"). The Revisional Court allowed the said revision vide order dated 25.07.2023 and set aside the order dated 28.07.2022 passed by the Magistrate and again remanded the matter back to the Magistrate. 8. The Magistrate in compliance of the order of the Revisional Court dated 25.07.2023 passed the impugned order dated 24.06.2025, whereby the Magistrate rejected the complaint case in exercise of power under Section 203 CrPC. The relevant portion of the order dated 24.06.2025 is excerpted here under:-
"7. सुना तथा पत्रावली का अवलोकन िकया।
8. माननीय सत्र न्यायाधीश महोदय के आदेश िदनांिकत 25.07.2023 का ससम्मान अवलोकन िकया गया।
9. पत्रावली के अवलोकन से िविदत होता है िक पूवर् में न्यायालय द्वारा िदनांक 28.07.2022 को पिरवादी के पिरवाद को अंतगर्त धारा- 323, 395, 427, 504, 506,120 बी भा.दं.सं.
के तहत अिभयुक्तगण को तलब िकया गया था। िजससे क्षुब्ध होकर अिभयुक्तगण द्वारा िनगरानी न्यायालय माननीय अपर सत्र न्यायाधीश महोदय के समक्ष दायर की CRLR No. 993 of 2025 3
गयी। माननीय सत्र न्यायालय द्वारा अपने आदेश िदनांिकत 25.07.2023 को अवर न्यायालय के आदेश िदनांक 28.07.2022 को अपास्त िकया गया िजस पर माननीय सत्र न्यायालय द्वारा आदेश िदनांिकत 25.07.2023 पािरत कर अवर न्यायालय को िनम्न िबन्दुओं के संदभर् पर िनष्कषर् िदये जाने हेतु िनदेर्िशत िकया गया- क. क्या अपर आयुक्त के द्वारा पािरत यथािस्थित आदेश के अनुपालन में पुनरीक्षणकतार्गण मौके पर गये थे? ख. क्या लोकसेवक भी उप किमश्रर के न्यायालय में पक्षकार थे? ग. क्या धारा- 197 भा.दं.सं. की स्वीकृ ित की आवश्यकता है? माननीय सत्र न्यायालय द्वारा आदेश िदनांिकत 25.07.2023 पािरत कर अवर न्यायालय को उपरोक्त विणत िबन्दुओं के संदभर् में उभय पक्षों के िवद्वान अिधवक्ता को सुना गया। उभयपक्षों द्वारा िलिखत बहस पत्रावली पर दािखल की गयी है। माननीय सत्र न्यायालय द्वारा पािरत आदेश के अनुक्रम में िदये गये िबन्दुओं पर िनष्कषर् िनम्नवत है:- क. क्या अपर आयुक्त के द्वारा पािरत यथािस्थित आदेश के अनुपालन में पुनरीक्षणकतार्गण मौके पर गये थे? इस संबंध में िवपक्षीगण द्वारा मात्र यह कथन िकया गया है िक िवपक्षीगण सं.-2,3,4,5 सरकारी कमर्चारी है तथा उपिजलािधकारी के आदेश िदनांक 05.08.2014 के अनुपालन में भूिम की पैमाइश व िनशादेही करने गये थे। वादी द्वारा उपरोक्त िबन्दु के संबंध से यह कथन िकया गया है िक अपर आयुक्त प्रशासन लखनऊ मण्डल लखनऊ के न्यायालय में भूिम सं.
652 का िवचाराधीन था और मुकदमें में मौके पर यथािस्थित बनाये रखने का आदेश िदनांक 03.09.2014 को सक्षम न्यायालय द्वारा पािरत कराया था। आदेश की सत्यप्रितिलिप नकल प्रस्तुत पिरवाद की पत्रावली पर दािखल है। िवपक्षीगण द्वारा यह भी कथन िकया गया है िक उन्होंने उपिजलािधकारी के आदेश िदनांक 05.08.2014 के अनुपालन में भूिम की पैमाइश व िनशादेही करने उपरोक्त भूिम सं.-652 गये थे। िवपक्षीगण द्वारा उपरोक्त कथन के समथर्न में िलिखत आदेश िदनांिकत 05.08.2014 को की छायाप्रित पत्रावली पर प्रस्तुत की है िजसके अवलोकन से िविदत होता है िक उपिजलािधकारी द्वारा तहसीलदार को िनयमानुसार पुिलस बल के साथ िनशानदेही करने का आदेश िदया गया। िवपक्षीगण द्वारा यह तकर् प्रस्तुत िकया है िक उपरोक्त आदेश िदनांिकत 05.08.2014 के अनुपालन में उनके द्वारा भूिम पैमाइश का कायर् िकया गया है। िवपक्षीगण द्वारा अपने कथन में यह भी रेखांिकत िकया गया है िक उपिजलािधकारी के आदेश िदनांक 05.08.2014 के अनुपालन में भूिम सं. 652 की पैमाइश व िनशादेही का कायर् िदया था। िवपक्षीगण द्वारा श्रीमान् अपर आयुक्त प्रशासन लखनऊ मण्डल लखनऊ द्वारा पािरत आदेश 03.09.2014 द्वारा िजसमें यथािस्थित बनाये रखने का आदेश पािरत िकया गया था िजसके संबंध में िकसी प्रकार का खंडन नहीं िकया गया है। वादी द्वारा अपने िलिखत कथन में यह तथ्य को स्वीकार िकया है िक वतर्मान मुकदमें में िवपक्षीगण जो क्रमशः है िवपक्षी सं.- 01 श्रीमती ठाकु रदेई पत्नी स्व. हरीशंकर व िवपक्षी सं.- 02 श्रीमती सूरजमुखी पत्नी राम िकशोर व िवपक्षी सं.-3 चन्द्रमुखी पत्नी नवल िकशोर व िवपक्षी सं. 4 श्रीमती नीलम पत्नी संतोष कु मार है। पुनरीक्षणकतार् उक्त बाद में पक्षकार मुकदमा नहीं थे। अतः वादी के कथन के स्वीकृ ित के आधार पर यह स्पष्ट है िक िवपक्षीगण श्रीमान अपर आयुक्त प्रशासन लखनऊ मण्डल के समक्ष पक्षकार नहीं बनाये गये थे। वादी को यह िसद्ध करना है िक क्या अपर आयुक्त के द्वारा पािरत यथािस्थित आदेश के अनुपालन में पुनरीक्षणकतार्गण मौके पर गये थे?
उपरोक्त तथ्य और पिरिस्थितयों के िवश्लेषण से वादी यह िसद्ध करने में असफल रहे हैं िक अपर आयुक्त प्रशासन लखनऊ मण्डल लखनऊ द्वारा पािरत आदेश 03.09.2014 के अनुपालन में पुनरीक्षकतार् मौके पर गये थे। ख. क्या लोकसेवक भी उप किमश्नर के न्यायालय में पक्षकार थे? उपरोक्त के संबंध में वादी द्वारा यह कथन को स्वीकार िकया गया है िक उपरोक्त लोक सेवक एवं िवपक्षीगण श्रीमान् अपर आयुक्त लखनऊ मण्डल में योिजत वाद में पक्षकार नहीं बनाये गये थे। िवपक्षीगण द्वारा यह कथन िकया गया है िक उपरोक्त मुकदमे में वादी मुकदमा द्वारा न ही उन्हें कोई नोिटस प्रदान की गयी न ही वे उपरोक्त मुकदमें में पक्षकार था वादी मुकदमा द्वारा दािखल श्रीमान अपर आयुक्त प्रशासन लखनऊ मण्डल के आदेश में िवपक्षीगण को पक्षकार बनाये जाने के संबंध में कोई साक्ष्य पत्रावली से प्राप्त नहीं कराये गये हैं। न्यायालय द्वारा उपरोक्त िबन्दु के संबंध में उपिजलािधकारी सदर उन्नाव से आख्या आहूत की गयी िजसके संबंध में उपिजलािधकारी सदर उन्नाव द्वारा प्रकरण १० वषर् से अिधक पुराना होने के कारण कायार्लय में जो अिभलेख उपलब्ध हैं उसके आधार पर प्राप्त होना नहीं पाया जाता है। न्यायालय द्वारा उपिजलािधकारी सदर उन्नाव से उपरोक्त प्रकरण में िनम्न िबन्दुओं पर आख्या मांगी थी िजनका उत्तर तािलका के रूप में अंिकत िकया गया है:- न्यायालय द्वारा मांगे गये आख्या िदनांिकत 31-05- 2025 उपिजलािधकारी द्वारा प्राप्त आख्या िदनांिकत 09-06- 2025 CRLR No. 993 of 2025 4
(क) अपर आयुक्त द्वारा पािरत आदेश िदनांिकत 03.09.2014 की छायाप्रित आपके कायार्लय में प्राप्त हुई है या नहीं। यिद हाँ तो िकस िदनांक को हुई है? (क) प्रकरण 10 वषर् से अिधक पुराना होने के कारण कायार्लय में जो अिभलेख उपलब्ध है, उसके आधार पर प्राप्त होना नहीं पाया जाता है। (ख) क्या अपर आयुक्त के द्वारा पािरत यथािस्थित आदेश के अनुपालन में राजस्व िनरीक्षक राके श वमार् व सोहन लाल गुप्ता लेखपाल पक्षकार थे और उन्हे उक्त आदेश की पूवर् सूचना थी या नहीं ?
(ख) पत्रावली उपलब्ध न होने के कारण िकसी प्रकार की िटप्पणी िकया जान उिचत नहीं है। (ग) प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 04.08.2014 पर तहसीलदार सदर व उप िजलािधकारी सदर द्वारा भूिम की िनशानदेही करवाये जाने हेतु संबंिधत को िनदेर्िशत करते हुए िदनांक 05.08.2014 को आदेश पािरत िकया गया िजसकी छायाप्रित राजस्व िनरीक्षक राके श वमार् व सोहन लाल गुप्ता लेखपाल द्वारा अपने बचाव में पत्रावली पर दािखल की गयी है। (ग) पत्र के साथ संलग्न प्राथर्ना पत्र के अवलोकनोपरान्त प्राथर्ना पत्र पर अिकत आदेश तत्कालीन उप िजलािधकारी द्वारा िदया जाना स्पष्ट है, परन्तु प्राथर्ना पत्र पर कायार्लय पंिजका कमांक अंकन न होने के कारण सत्यापन िकया जाना सम्भव नहीं है। उपरोक्त उपिजलािधकारी सदर द्वारा प्राप्त आख्या तथा माननीय अपर आयुक्त लखनऊ मण्डल के आदेश की छायाप्रित के अवलोकन से वादी यह िसद्ध करने में असमथर् रहे हैं िक िवपक्षीगण उपकिमश्रर लखनऊ मण्डल के आदेश में पक्षकार बनाये गये थे? उपरोक्त तथ्यों पिरिस्थतयों यह स्पष्ट होता है िक लोक सेवक उपकिमश्नर के न्यायालय में पक्षकार नहीं थे। ग. क्या धारा- 197 द०प्र०सं० की स्वीकृ ित की आवश्यकता है?
उपरोक्त िबन्दु के संदभर् में धारा 197 द०प्र०सं० का उल्लेख िकया जाना समीिचन है। जो िनम्नवत् हैः- धारा 197 द०प्र०सं० न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अिभयोजन। जब कोई व्यिक्त, जो न्यायाधीश या मिजस्ट्रेट या लोक सेवक है या था, िजसे सरकार की मंजूरी के िबना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, िकसी ऐसे अपराध का अिभयुक्त है जो उसके द्वारा अपने पदीय कतर्व्य के िनवर्हन में कायर् करते समय या कायर् करने का तात्पयर् रखते समय िकया गया अिभकथिनत है, तब कोई न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान पूवर् मंजूरी के िबना नहीं लेगा। वादी द्वारा यह कथन िकया गया है िक िवपक्षीगण िबना िकसी उच्चािधकारी के आदेश के अनुक्रम में मौके पर यथािस्थित कायम होने के उपरान्त भी उनके द्वारा मार पीट िकये जाने, गाली गलौज करते हुए फसल नष्ट करने का कायर् कराया गया जो िक आफीिसयल ड्यूटी के अधीन नहीं होना प्रतीत होता है। इसी क्रम में वादी पक्ष द्वारा माननीय सवोर्च्च न्यायालय द्वारा राजीब रंजन आिद बनाम िवजय कु मार 2015 CLJ 267 (Supreme Court) की नजीर अपने समथर्न में दािखल की है। मा० सवोर्च्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त मुकदमें में यह िविधमत प्रितपािदत िकया गया है िक "Criminal P.C (2 of 1974), S. 197-Sanction for prosecution- discharging official duties- Public servant entering into criminal conspiracy or indulging in criminal misconduct. Such misdemeanour on his part is not to be treated as act in discharge of his official duties.- Therefore, provisions of S 197 would not be attracted".
वादी द्वारा िवपक्षीगण पर आरोप लगाया गया है िक वादीगण द्वारा उपरोक्त अपराध आिफिसयल ड्यूटी की श्रेणी में नहीं आता है। िवपक्षीगण द्वारा अपने बचाव में यह कथन िकया गया है िक उनके द्वारा कोई अपराध नहीं िकया गया है। िवपक्षीगण द्वारा अपने उच्चािधकािरयों द्वारा िदये गये आदेशों के अनुपालन में मौके पर िदये गये पैमाइस का कायर् िकया जा रहा था अपने कथनों के समथर्न में उनके द्वारा उपिजलािधकारी द्वारा आदेश 05-08- 2014 की छायाप्रित दािखल की गयी और उक्त आदेश की सत्यात्ता के संबंध में उपिजलािधकारी सदर द्वारा 09-06- 2025 को आख्या प्रस्तुत की गयी। उपरोक्त उभयपक्षों के तकों के आधार पर न्यायालय को िबन्दु (ग) क्या धारा CRLR No. 993 of 2025 5
197 द०प्र०सं० की स्वीकृ ित की आवश्यकता है, को िनस्तािरत करने का िनदेर्श प्राप्त हुआ है। इसी क्रम में मा० सवोर्च्च न्यायालय द्वारा जी.सी. नाथ एवं अन्य बनाम सीताराम आपरािधक अपील सं० 1759/2025 का उल्लेख िकया जाना समीिचन प्रतीत होता है। मा० सवोर्च्च न्यायालय द्वारा जी.सी.
मंजूनाथ एवं अन्य बनाम सीताराम आपरािधक अपील सं० 1759/2025 में िविधमत पािरत िकया गया िक "धारा 197 CrPC और पुिलस अिधिनयम की धारा 170 के तहत आवश्यक स्वीकृ ित की सुरक्षा के वल इस कारण समाप्त नहीं हो सकती िक कायर् अिधकार की सीमाओं से बाहर था।" तथा यह भी अिभमत प्रितपािदत िकया गया है िक "कोई भी कायर् जो एक सरकारी अिधकारी द्वारा िकया गया हो, भले ही वह उनके अिधकृ त दायरे से बाहर हो या उनके सरकारी कतर्व्यों की सीमाओं को पार करता हो, तब भी वैधािनक सुरक्षा प्रदान की जाएगी, यिद उस कायर् और अिधकारी के सरकारी कतर्व्यों के बीच एक युिक्तसंगत संबंध मौजूद हो।" मा० सवोर्च्च न्यायालय द्वारा पािरत िविध व्यवस्था के प्रकाश में यह स्पष्ट है िक यिद सरकारी कमर्चारी द्वारा कायर् िकया गया हो भले ही वह अिधकार से बाहर हो, और उस सरकारी कायर् का तािकक रूप से जुड़ा होना िसद्ध होता हो तो उन सरकारी कमर्चािरयों को वैधािनक सुरक्षा प्राप्त होगी। िवपक्षीगण द्वारा अपने बचाव में उपिजलािधकारी के आदेश िदनांिकत 05-08-2014 के अनुक्रम में घटनास्थल पर पैमाइश का कायर् िकये जाने का कथन िकया गया है तथा उस कथानक के समथर्न में उनके द्वारा आदेश की छायाप्रित न्यायालय में प्रस्तुत की। आदेश िदनांिकत 05-08-2014 की सत्यता के संबंध में उपिजलािधकारी द्वार आख्या िदनांिकत 09-06-2025 पत्रावली में प्राप्त है। अतः वादी यह िसद्ध करने असफल रहे हैं िक िवपक्षीगण द्वारा उपरोक्त कृ त्य िबना िकसी अनािधकािरक रूप में तथा ऑिफिसयल ड्यूटी के अधीन कािरत िकया गया है।
10. मा० सत्र न्यायाधीश महोदय के आदेश िदनांिकत 25-07-2023 में उिल्लिखत 03 िबन्दुओं पर िनष्कषर् िनकालने हेतु आदेिशत िकया गया था िजसके अनुपालन में उभयपक्षों के िवद्वान अिधवक्ता महोदय को सुना गया। उपरोक्त तथ्यों एवं िवश्लेशण के आधार पर न्यायालय का यह मत है िक िवपक्षीगण घटना स्थल पर आदेश िदनांक 05-08- 2014 के अनुपालन में पैमाइश हेतु जाना िविदत होता है। उपरोक्त कृ त्य उनके उच्चािधकािरयों द्वारा आदेश के अनुपालन में िकया गया था। अतः पिब्लक सरवेन्ट द्वारा अपने आिफिसयल ड्यूटी के िनवार्हन में िकये गये कायोर्ं के संबंध में धारा 197 द०प्र०सं० के तहत पूवर् अनुमित िलया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। प्रस्तुत प्रकरण में वादी पत्र द्वारा धारा 197 द०प्र०सं० के तहत अनुपालन के संबंध में कोई साक्ष्य या कथन नहीं िकया गया है।
11.
प्रस्तुत प्रकरण में वादी मुकदमा के द्वारा मा० सत्र न्यायालय द्वारा उिल्लिखत िबन्दुओं को अपने पक्ष में िसद्ध करने में असफल रहे हैं तथा धारा 197 द०प्र०सं० का अनुपालन पिरवादी द्वारा नहीं िकया गया है। पिरवादी द्वारा अपने पिरवाद में िवपक्षीगण द्वारा पुत्र के साथ गाली-गलौज करने मार-पीट तथा जेब से दो हजार रूपये िनकाल लेने का कथन िकया है। मार-पीट व चोटों के संबंध में वादी द्वारा कोई िचिकत्सकीय उपचार पत्र पत्रावली में दािखल नहीं िकये हैं। अतः उपरोक्त िनष्कषर् के आधार पर अिभयुक्तगण को तलब िकया जाना समीिचन प्रतीत नहीं होता है। आदेश उपरोक्त िनष्कषर् के साथ प्रस्तुत पिरवाद संख्या - 2919/2014 िवजय शंकर बनाम िववेक कु मार आिद, अंतगर्त थाना - अजगैन, िजला उन्नाव, अन्तगर्त धारा- 203 दं.प्र.सं में िनरस्त िकया जाता है। पत्रावली िनयमानुसार दािखल दफ्तर िकया जाए।"
9. In view of the aforesaid background of the case, the present revision has been filed. 10. Upon due consideration of the aforesaid as also the submissions advanced by the learned counsel for the parties and a perusal of the record from where the aforesaid facts have been referred, this Court finds no force in the present revision. It is for the following reason:- (i) To a purely civil dispute, a criminal color has been given by the revisionist by making allegations, including that he was in possession of the property in issue and that he had harvested the said land. In this regard, facts have been mentioned in para 3(vii) of the order. (ii) To establish the facts aforesaid, the Khasra or Khatauni has not been CRLR No. 993 of 2025 6
placed on record. (iii) In view of aforesaid, this Court is of the opinion that complaint of the revisionist is completely frivolous and an abuse of the process of law. 11. For the reasons aforesaid, this Court finds that the revision is liable to be dismissed with costs. Accordingly, the revision is dismissed with the cost of Rs. 10,000, which shall be deposited before this Court concerned within one month, failing which, the same shall be recovered as arrears of land revenue. This amount shall be utilized by this Court for providing Legal Aid. September 9, 2025 Vinay/- CRLR No. 993 of 2025 7 (Saurabh Lavania,J.) Digitally signed by :- VINAY KUMAR High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench