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Allahabad High Court · body

2025 DAILYLAW 160729 (ALL)

AANYA (MINOR ) THRU. HIS FATHER ASHUTOSH MISHRA v. STATE OF U.P. THRU. PRIN. SECY. HOME DEPTT. LKO. AND 4 OTHERS

HABC/311/2025 · 2025-08-28

Subhash Vidyarthi

body2025

Judgment text

Extracted from the PDF above. The PDF is authoritative.

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD LUCKNOW HABEAS CORPUS WRIT PETITION No. - 311 of 2025 Court No. - 13 HON'BLE SUBHASH VIDYARTHI, J. 1. यािचकाकतार् के िवद्वान अिधवक्ता श्री अजीत कु मार िसह तथा िवद्वान अितिरक्त शासकीय अिधवक्ता प्रथम श्री राजेश कु मार िसह को सुना तथा पत्रावली का अवलोकन िकया। 2. भारतीय संिवधान के अनुच्छेद 226 के अन्तगर्त एक तीन वषीर्य बािलका की तरफ से उसके िपता के माध्यम से प्रस्तुत इस बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका में, यह कहा गया है िक िवपक्ष संख्या 4 तथा 5, जो बािलका के नाना एवं नानी हैं, ने बािलका को अपनी अवैध अिभरक्षा में रखा हुआ है। बािलका का जन्म िदनांक 5/10/2022 को हुआ, उसकी मां गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने के बाद िदनांक 11/9/2024 को स्वगर्वासी हो गई। 3. िदनांक 12/9/2024 को मां के अंितम संस्कार के बाद, िवपक्ष संख्या 4 तथा 5 बािलका को अपने साथ ले गए। यािचका में यह कहा गया है िक उसके बाद से बािलका के िपता को बािलका से िमलने नहीं िदया जा रहा है। 4. िदनांक 18/7/2025 को प्राथीर् ने पुिलस आयुक्त को एक प्राथर्ना पत्र भेजकर यह कहा िक उसकी पुत्री को िवपक्ष संख्या 4 तथा 5 के अवैधािनक कब्जे से मुक्त कराकर उसकी अिभरक्षा िदलाई जाए। 5. िवद्वान अपर शासकीय अिधवक्ता प्रथम ने प्राथर्ना पत्र का िवरोध करते हुए कहा िक प्रस्तुत प्रकरण में यािचकाकतीर् एक अबोध बािलका है, जो अपनी मां की मृत्यु के बाद से िदनांक 12/9/2024 से लगातार अपने नाना-नानी के साथ रहकर बड़ी हो रहा है, तथा प्राथीर् ने प्रथम बार उसकी अिभरक्षा के संबंध में प्राथर्ना पत्र िदनांक 18/7/2025 को िलखा एवं इसे पुिलस को डाक के माध्यम से िदनांक 21/7/2025 को भेजा। यिद यह प्रकरण वास्तव में अवैध अिभरक्षा का होता, तो प्राथीर् ने शीघ्रता के साथ िविधक कायर्वाही संसिथत की होती। प्रकरण में िवशेष तथ्यों एवं पिरिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए बािलका की अिभरक्षा उसके िहतों को दृिष्टगत रखते हुए ही की जानी चािहए, जो एक साक्ष्य का प्रश्न होगा। 6. इस आपित्त के उत्तर में, यािचकाकतार् के िवद्वान अिधवक्ता ने माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा तेजिस्वनी गौड़ बनाम शेखर जगदीश प्रसाद ितवारी (2019)7 SCC 42 का िनणर्य उद्धृत िकया एवं कहा िक उक्त िनणर्य के आलोक में यािचका पोषणीय है। Versus Counsel for Petitioner(s) : Ajeet Kumar Singh, Dev Prakash Singh Counsel for Respondent(s) : G.A. Aanya (Minor ) Thru. His Father Ashutosh Mishra .....Petitioner(s) State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Deptt. Lko. And 4 Others .....Respondent(s) 7. तेजिस्वनी गौड़ के प्रकरण में, बािलका का जन्म िदनांक 14/8/2017 को हुआ, िदनांक 17/10/2018 को बीमारी से उसकी मां की मृत्यु हुई तथा बािलका अपने नाना-नानी के साथ रहती रही एवं बािलका के िपता ने िदनांक 17/11/2018 को ही पुिलस को िशकायत कर दी एवं उसके तुरंत बाद उच्च न्यायालय में यािचका प्रस्तुत करी, जो उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर ली। उच्च न्यायालय के िनणर्य के िवरुद्ध अपील िनरस्त करते हुए, माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह कहा िक प्रकरण के िवशेष तथ्यों एवं पिरिस्थितयों को दृिष्टगत रखते हुए, बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका भी पोषणीय हो सकती है। तेजिस्वनी गौड़ के प्रकरण में बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका बािलका की मां की मृत्यु के पश्चात एक माह अंदर ही सम्यक तत्पतार् से प्रस्तुत की गई थी। प्रस्तुत प्रकरण में, प्राथीर् को अपनी पुत्री के उसके नाना-नानी के साथ लगभग 1 वषर् के समय तक रहने में कोई आपित्त नहीं थी तथा अब उसको अपनी पुत्री से लगाव जागृत हो गया है एवं इस कारण से उसने यह बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका प्रस्तुत कर दी है। 8. बंदी प्रत्यक्षीकरण के अंतगर्त शिक्तयों का उपयोग करते समय न्यायालय के पास बहुत सीिमत अिधकार क्षेत्र है िजसमें िहरासत की वैधता का औिचत्य िसद्ध करना या उसकी जांच करना नहीं है। बंदी प्रत्यक्षीकरण कायर्वाही एक ऐसा माध्यम है िजसके माध्यम से बच्चे की िहरासत न्यायालय के िववेक पर छोड़ी जाती है। बंदी प्रत्यक्षीकरण एक िवशेषािधकार प्राप्त िरट है जो एक असाधारण उपाय है और िरट तब जारी की जाती है जब िकसी िवशेष प्रकरण की पिरिस्थितयों में कानून द्वारा प्रदत्त सामान्य उपाय या तो उपलब्ध नहीं होता है या अप्रभावी होता है; अन्यथा िरट जारी नहीं की जाएगी। बाल िहरासत के मामलों में, िरट जारी करने का उच्च न्यायालय का अिधकार के वल उन्हीं प्रकरणों में मान्य होता है जहां िकसी नाबािलग को ऐसे व्यिक्त द्वारा िहरासत में िलया जाता है जो उसकी कानूनी िहरासत का हकदार नहीं है। सवोर्च्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा इस मुद्दे पर िदए गए फै सले के मद्देनजर, हमारा मानना है िक बाल िहरासत के मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण िरट तभी स्वीकायर् है जब यह सािबत हो जाए िक माता-िपता या अन्य लोगों द्वारा नाबािलग बच्चे को िहरासत में रखना गैरकानूनी और िबना िकसी कानूनी अिधकार के था। 9. लंबे समय से एक पिरवार में रहकर बड़ी होती हुई बािलका के िहतों का प्रश्न, िबना साक्ष्य िलए बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका में िनणीर्त करना उिचत नहीं होगा तथा प्रकरण की िवशेष पिरिस्थितयों को दृिष्टगत रखते हुए, यह प्रश्न साक्ष्य लेने के पश्चात पािरवािरक न्यायालय द्वारा तय िकया जाना ही उिचत होगा। 10. ऐसी पिरिस्थितय में न्यायालय का मत है िक बंदी प्रत्यक्षीकरण यािचका अंगीकृ त करने का कोई पयार्प्त आधार नहीं है। तदनुसार, यािचका अंगीकरण के स्तर पर िनरस्त की जाती है। August 28, 2025 Himanshu HABC No. 311 of 2025 2 (Subhash Vidyarthi,J.) Digitally signed by :- HIMANSHU SHUKLA High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench