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High Court of Chhattisgarh · body

2015 DAILYLAW 356 (CHH)

Santosh Kumar Gupta v. State Of Chhattisgarh

ACQA/169/2015 · 2026-05-05

Shri Sanjay Kumar Jaiswal

body2015

Judgment text

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1 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} 2026:CGHC:21083 अप्रतिवेद्य छत्ती सगढ़ उच्च न्यायालया , तिलसपुर तिर्णया सरति ति क-04/05/2026 तिर्णया उद्घो*ति+ ति क-06/05/2026 *+मुति- अपु ल क्रमु क -169 /2015  स *+ क मुर गप्ता तिपु-स्वेग3या गजाधर प्रस गप्ता, उम्र-लगभग 42 वे+, स तियार यार्ड मुस्टर,  .एस.पु . तिभलई, तिवेस -मुक स ख्या-34 जा .एस., गल  र-14, सक्टर-4, पुलिलस था-तिभलई-6, लिजाल-ग, छत्ती सगढ़ -----अपु लथा3 तिवेरूद्घो 1. छत्ती सगढ़ रज्या, द्वार था प्रभर , पुलिलस था-सरकण्र्ड, तिलसपुर, लिजाल- तिलसपुर, छत्ती सगढ़ 2. श्री मु रत् गप्ता पुति-स्वेग3या या*गश गप्ता, उम्र-लगभग 25 वे+ (वेमु मुJ 26), तिवेस -कL ष्र्ण चNक, पुर सरकण्र्ड, पुलिलस था-सरकण्र्ड, तिलसपुर, लिजाल- तिलसपुर, छत्ती सगढ़ -----उत्तीरवे गर्ण अपु लथा3 द्वार : श्री अतिवेश क . तिमुश्री, अलिधवे- । रज्या/उत्तीरवे क्रमु क-1 द्वार : श्री रजा क मुर सहूR, पुSल अलिधवे- । अतिभया-/उत्तीरवे क्रमु क-2 द्वार : सश्री अतिति लिस घवे , अलिधवे- । POMAN DEWANGAN Digitally signed by POMAN DEWANGAN Date: 2026.05.06 11:43:31 +0530 2 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} न्यायामुUति श्री स जाया क मुर जायासवेल !! स .ए.वे . तिर्णया !! 1. ण्र्ड प्रतिक्रया स तिहू, 1973 कX धर-372 क हू *+मुति- क तिवेरूद्घो प्रस् इस अपु ल मुJ तिवेचरर्ण न्यायालया-सत्र न्यायाध श, तिलसपुर, लिजाल-तिलसपुर, छत्ती सगढ़ द्वार सत्र प्रकरर्ण क्रमु क-34/2014 “छत्ती सगढ़ रज्या तिवेरूद्घो श्री मु रत् गप्ता” मुJ पुरिर तिर्णया ति क-04/07/2015 कX वेSध क* चN गई हूS । लिजासक हू तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार अतिभया*जा क मुमुल प्रमुतिर्ण  पु हू^ए अतिभया- श्री मु रत् गप्ता क* स हू क लभ  हू^ए धर-306 भर या ण्र्ड स तिहू, 1860 क अपुरध स *+मु- तिकया गया हूS । लिजास आग “प्रश्ध  तिर्णया” स स *लिध तिकया जा रहू हूS । 2. याहू अतिवेवेति थ्या हूS तिक मुLक या*गश गप्ता क तिवेवेहू अतिभया- श्री मु रत् गप्ता क सथा वे+ 2005 मुJ हू^आ था । उकX एक पुत्र , च चल गप्ता हूS । मुLक या*गश गप्ता Uध क व्यावेसया कर था । घट ति क 20/11/2013 कX हूS । घट क समुया *d कL ष्र्ण चNक, पुर सरकण्र्ड, लिजाल तिलसपुर, छत्ती सगढ़ स्थिस्था अपु मुक मुJ तिवेसर था । मुLक या*गश गप्ता क पुरिरवेरजाd मुJ उसक ड़ा भई अपु लथा3 स *+ गप्ता (अ.स.-3), मु ग ग*त्र गप्ता (अ.स.-4) था   हू*ई, क्रमुशg रजा तिकश*र गप्ता (अ.स.-7), गन्द्र क मुर गप्ता (अ.स.-9) एवे रजाश गप्ता (अ.स.-10) हूi । 3. अतिभया*जा क मुमुल, स पु मुJ, इस प्रकर हूS तिक अतिभया- श्री मु रत् गप्ता क   पुरु+d, अथाk न्हू Uध वेल, तिचतिकत्सक लिसकरवेर था पुड़ा*स ललिल अग्रवेल, स अवेSध स  ध था । उ- स  धd कX जाकर जा उसक पुति या*गश गप्ता (मुLक) क* हू^ई,  इस स  ध मुJ *d क मुध्या तिवेवे हू* लग । मुLक द्वार मु तिकए जा क वेजाU 3 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} अतिभया- अन्या पुरु+d स स  ध ए रख था था अपु पुति या*गश गप्ता क* याहू कहूकर धमुकX  था तिक वेहू अपु सम्पुलित्ती उसक मु कर , अन्याथा वेहू उस एवे उसक पुरिरवेरजाd क* हूजा क प्रकरर्ण मुJ फँq सकर जाल तिभजावे ग । उ- प्रड़ा स ब्ध हू*कर या*गश गप्ता  अपु घर मुJ फँ स लगकर आत्मुहूत्या कर ल । घट कX सUच पु+ श्यामु सहूR (अ.स.-6) द्वार था सरकण्र्ड मुJ तिए जा पुर मुग प्रश पु -2 कयामु तिकया गया । त्पुश्चk अगल ति, अथाk ति क 21/11/2013 क*, क्श पु चयामु Sयार कर शवे क पुर र्ण करया गया । घटस्थाल क क्श प्रश पु -8 Sयार तिकया गया । घटस्थाल स मुLक या*गश गप्ता उफँ तिपु टU द्वार लिललिख ससइर्ड *ट (प्रश्ध  स्वेजा क्रमु क-1), वेस या (प्रश्ध  स्वेजा क्रमु क-2), ललिल अग्रवेल क मु*इल  र अ तिक स्वेजा प्रश पु -39, एक 50/- रुपुया क *ट, 20/- रुपुया क * *ट था सSमुस ग क पु क एक मु*इल जाप्ता कर जाप्ता पुत्रक प्रश पु -9 Sयार तिकया गया । ति क 01/12/2013 क* मुLक क ड़ा भई एवे अपु लथा3 स *+ गप्ता स मुLक द्वार Uध क तिहूस-तिक स  ध पु जा जाप्ता कर प्रश पु -10 Sयार तिकया गया । तिवेवेच क Nर सतियाd क कथा लखद्ध तिकए गए था मु*इल फँ* कX कtल तिर्डटल प्रप्ता कX गई । जाप्ता ससइर्ड *ट, वेस या एवे अन्या प्रश्ध  स्वेजाd क* पुर र्ण हू शसकXया स्वेजा पुर क क पुस भजा गया था स पुUर्ण तिवेवेच उपुर  अतिभया*ग-पुत्र प्रस् तिकया गया । 4. तिवेचरर्ण क Nर आर*पु क प्रमुर्ण हू अतिभया*जा कX ओर स अपु पु क समुथा मुJ क ल 11 सतियाd क पुर र्ण करया गया, 42 स्वेजा प्रश तिचन्हू तिक करए गए था प्रश्ध  स्वेजा क्रमु क-1 एवे 2 प्रस् तिकए गए । धर 313 ण्र्ड प्रतिक्रया स तिहू क अ ग जा अपु कथा मुJ अतिभया- श्री मु रत् गप्ता  अपु तिवेरुद्ध अतिभया*जा 4 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} सतियाd क कथाd स इकर कर हू^ए स्वेया क* तिv+ या हूS । अतिभया-  याहू भ कहू हूS तिक प्रस् कtल तिर्डटल्स मुJ उतिxलिख मु*इल  र उसक हूy हूS । उसक याहू कहू हूS तिक मुLक क रिरश्र, जा* अतिभया*जा स हूi, मुLक कX सम्पुलित्ती हूड़ापु क उद्देश्या स उस झूUठे प्रकरर्ण मुJ फँq स रहू हूi, जातिक वेहू तिv+ हूS । अतिभया- कX ओर स चवे मुJ क*ई सक्ष्या प्रस् हूy तिकया गया । त्पुश्चk उभयापु क* स जाकर तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार प्रश्ध  *+मुति- क तिर्णया पुरिर तिकया गया । लिजास इस अपु ल मुJ चN गई हूS । 5. तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार अतिभया*जा स पु+ श्यामु सहूR (अ.स.-6), रजान्द्र प्रस सहूR (अ.स.-5), स *+ क मुर गप्ता (अ.स.-3) आति क कथा था तिवेवेचक जावेहूर लिस हू पु*~ (अ.स.-2) द्वार पुष्ट मुग सUच प्रश पु -2 एवे तिचतिकत्सक सवे मु र (अ.स.-1) द्वार पुष्ट शवे पुर र्ण प्रतिवे प्रश पु -6 क आधर पुर याहू तिष्क+ तिकल गया हूS तिक या*गश गप्ता कX मुLत्या आत्मुहूत्या क स्वेरूपु कX था था गल मुJ पुए गए लिलगचर मुक क असर उसकX मुLत्या श्वेसवेर*ध क करर्ण हू^ई था । मुLक या*गश गप्ता द्वार फँ स लगकर आत्मुहूत्या तिकया जा अतिवेवेति रहू हूS । 6. तिवेचरर्ण न्यायालया  स पुUर्ण सक्ष्या कX समु  कर हू^ए याहू पुया हूS तिक अतिभया- श्री मु रत् गप्ता क कलिथा अवेSध स  धd क स  ध मुJ अतिभया*जा सतियाd द्वार जा* कथा तिकए गए हूi, वे सभ मुLक या*गश गप्ता क तिकट स  ध , अथाk उसकX मु, ड़ा भई एवे हू*ई, हूi । इस स  ध मुJ उकX ओर स पुUवे मुJ कभ क*ई तिशकया तिकए जा क थ्या अतिभलख पुर उपुलब्ध हूy हूS । तिवेचरर्ण न्यायालया  याहू भ पुया हूS तिक एक ससइर्ड *ट कX जाप्ता , जाप्ता पुत्रक प्रश पु -9 क असर, मुLक क घर स हू* शई गई हूS, जातिक 5 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} मुNलिखक सक्ष्या मुJ उसकX जाप्ता मुLक कX जा स हू* या गया हूS । इसक अतिरिर-, Uसर मुUल प्रति स्ट ल क र्डब् स रमु हू* या गया हूS, जातिक अतिभलख पुर क वेल एक हू ससइर्ड *ट प्रस् हूS था कलिथा क अथावे पु कX क*ई जाप्ता हूy कX गई हूS । तिवेचरर्ण न्यायालया  याहू भ पुया हूS तिक कलिथा हूजा प्रड़ा क स  ध मुJ पुUवे मुJ कभ क*ई रिरपु*ट जा हूy करई गई था । इस प्रकर, Uध वेल न्हू , तिचतिकत्सक लिसकरवेर एवे पुड़ा*स ललिल अग्रवेल क सथा अतिभया- क कलिथा अवेSध स  धd क स  ध मुJ उक क*ई कथा जा हूy तिकया गया हूS । इस प्रकर, तिवेचरर्ण न्यायालया  याहू तिष्क+ तिकल हूS तिक अतिभया- क चरिरत्रहू  हू* अथावे उसक तिकस अSतिक स  ध  समुतिच जा च हूy कX गई हूS । 7. तिवेचरर्ण न्यायालया  याहू भ पुया हूS तिक मुग सUच ति क 20/11/2013 कX हूS, तिक  शवे क पु चमु अगल ति, अथाk ति क 21/11/2013 क* Sयार तिकया गया हूS । अतिभलख स याहू भ पुरिरलति हू* हूS तिक पुलिलस क घटस्थाल पुर पुहू^ च स पुUवे हू रजान्द्र द्वार कलिथा रूपु स रवेज़े क* मुरकर *ड़ा गया था । त्पुश्चk पुलिलस क* सUच गई था पुलिलस अगल ति घटस्थाल पुर पुहू^ च , तिक  इस स  ध मुJ क*ई पुLथाक पु चमु Sयार हूy तिकया गया हूS । तिवेचरर्ण न्यायालया  याहू भ पुया हूS तिक या*गश गप्ता कX मुLत्या क पुश्च भ उसकX पुत् , अतिभया- रत् गप्ता, उस घर मुJ तिवेसर रहू , लिजासक समुथा स्वेया मुLक कX मु  अपु कथा मुJ तिकया हूS । इसक अतिरिर-, या*गश गप्ता क* अतिभया- रत् गप्ता द्वार प्रतिड़ा तिकए जा क स  ध मुJ पुUवे मुJ कभ क*ई तिशकया हूy कX गई था । अतिभलख स याहू भ पुरिरलति हू* हूS तिक कलिथा घट क पुश्च रहूवेy क समुया आया*लिजा पु चया मुJ मुL या*गश गप्ता कX सम्पुलित्ती उसकX 07 वे+3या पुत्र च चल गप्ता क सथा-सथा उसकX तिवेधवे, अतिभया- रत् गप्ता, क पु मुJ तिकए 6 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} जा क तिर्णया लिलया गया था । लिजासस याहू पुरिरलति हू* हूS तिक उस समुया अतिभया- श्री मु रत् गप्ता पुर क*ई स हू व्या- हूy तिकया गया था । तिवेचरर्ण न्यायालया  याहू भ पुया हूS तिक अतिभया*जा द्वार प्रस् कtल तिर्डटल्स रिरपु*ट तिवेलिधवे रूपु स प्रमुतिर्ण हूy करई गई हूS । अतिभया- रत् गप्ता क मु स लिजास मु*इल  र क उपुया*ग हू* या गया हूS, वेहू तिकस अन्या व्याति- क मु आवे तिट पुया गया हूS । लिजा अन्या व्याति-याd क सथा श्री मु रत् गप्ता क कलिथा अSतिक स  ध हू* या गया हूS,  * उक मु*इल फँ* जाप्ता तिकए गए हूi और  हू इस स  ध मुJ क*ई स्वे त्र प्रमुर्ण प्रस् तिकया गया हूS तिक उक मु*इल पुर क्या स वे अथावे स पुक था । सथा हू , कtल तिर्डटल्स क मुध्यामु स भ याहू प्रमुतिर्ण हूy तिकया जा सक हूS तिक अतिभया- श्री मु रत् गप्ता क उस रम्र Uरभ+ या स पुक हू* था । इसक अतिरिर-, मुLक या*गश उफँ तिपु टU गप्ता कX मुU लिलखवेट क रूपु मुJ उसक Uध क तिहूस-तिक स  ध पु जा जाप्ता कX गई था । उ- मुU लिलखवेट क प्रश्ध  ससइर्ड *ट एवे वेस या स तिमुल कर तिवेश+ज्ञ स प्रकश च द्र तित्रवे (अ.स.-11) द्वार प्रश पु -41 एवे पु -42 क रूपु मुJ पुर र्ण प्रतिवे प्रस् तिकया गया हूS, तिक  उसमुJ भ ऐस क*ई स्पुष्ट अतिभमु व्या- हूy तिकया गया हूS तिक *d लिलखवेट एक हू व्याति- कX हूS । इ समुस् पुरिरस्थिस्थातियाd क आधर पुर तिवेचरर्ण न्यायालया  अतिभया- द्वार मुLक क* प्रतिड़ा कर अथावे उस आत्मुहूत्या क लिलए ष्प्ररिर तिकए जा क थ्या क* प्रमुतिर्ण  पु हू^ए उस *+मु- तिकया हूS । 8. अपु लथा3, जा* मुLक क ड़ा भई हूS, कX ओर स उपुस्थिस्था तिवेद्वा अलिधवे-  क प्रस् तिकया हूS तिक अपु लथा3, उसकX मु था रिरश् मुJ उसक  d हू*ई  अपु सक्ष्या मुJ स्पुष्ट रूपु स याहू कथा तिकया हूS तिक घट स पुUवे स्वेया या*गश क मुर गप्ता उफँ तिपु टU  उन्हूJ याहू जाकर था तिक उसकX पुत् , अतिभया- रत् गप्ता, क   व्याति-याd क 7 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} सथा अवेSध स  ध हूi था वेहू उस याहू धमुकX  था तिक याति वेहू अपु सम्पुलित्ती उसक मु हूy करग, * वेहू उस एवे उसक पुरिरवेरजाd क* हूजा प्रड़ा क प्रकरर्ण मुJ फँq सकर जाल तिभजावे ग । याहू भ क प्रस् तिकया गया हूS तिक उ- थ्या कX पुतिष्ट कलिथा ससइर्ड *ट स भ हू* हूS, लिजासमुJ उ  d व्याति-याd क मु*इल  र भ अ तिक हूi, लिजाक सथा अतिभया- श्री मु रत् गप्ता क अSतिक स  ध हू* या गया हूS । हूस्लिलतिपु तिवेश+ज्ञ  भ अपु अतिभमु मुJ याहू उxख तिकया हूS तिक Uध क तिहूस-तिक हू स धरिर पु जा , लिजास मुU लिलखवेट क रूपु मुJ प्रस् तिकया गया था, उसस तिवेवेति ससइर्ड *ट एवे वेस या क क छ अ श मुल ख हूi । इस प्रकर, अतिभया*जा सतियाd क कथाd क* अतिवेश्वेस या मु क क*ई करर्ण हूy हूS था अतिभया*जा क मुमुल प्रमुतिर्ण हूS । याहू भ क तिया गया हूS तिक याति तिवेवेच मुJ क*ई कमु रहू गई हू*, * मुत्र उस आधर पुर पु तिड़ा पु क* न्याया स वे तिच हूy तिकया जा सक । इस स भ मुJ तिवेद्वा अलिधवे-  न्यायादृष्ट  क रूपु मुJ Amar Nath Chaubey v. Union of India and Others, (2021) 11 SCC 804 था Edakkandi Dineshan @ P. Dineshan & Others v. State of Kerala, (2025) 3 SCC 273 मुJ प्रतिपुति तिवेलिध लिसद्ध d क हूवेल  हू^ए तिवे तिकया हूS तिक तिवेचरर्ण न्यायालया  उपुलब्ध सक्ष्या क समुतिच मुUल्या क हूy तिकया और प्रश्ध  तिर्णया पुरिर कर अतिभया- क* *+मु- कर तिया । अg प्रश्ध  *+मुति- क तिर्णया त्रतिटपुUर्ण हू* स स्थिस्थार रख जा या*ग्या हूy हूS । फँलस्वेरूपु, अपु ल स्वे कर कर *+मुति- क तिर्णया अपुस् तिकया जाए था अतिभया- क* *+लिसद्ध कर तिवेलिध असर स्थिण्र्ड तिकया जाए । 9. रज्या/उत्तीरवे क्रमु क-1 कX ओर स उपुस्थिस्था तिवेद्वा अलिधवे-  क प्रस् तिकया हूS तिक अतिभया*जा  मुNलिखक एवे स्वेजा सक्ष्या क मुध्यामु स अपु मुमुल क* स हू स पुर 8 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} प्रमुतिर्ण तिकया गया हूS, थातिपु तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार पुरिर *+मुति- क तिर्णया तिवेलिध कX दृतिष्ट मुJ उतिच हूy हूS । अg अपु ल स्वे कर कX जाए । 10. अतिभया-/उत्तीरवे क्रमु क-2 कX ओर स उपुस्थिस्था तिवेद्वा अलिधवे-  क प्रस् तिकया हूS तिक तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार पुरिर तिर्णया उपुलब्ध सक्ष्या कX सम्याकk एवे उतिच समु  पुर आधरिर हूS । अतिभया*जा क मुमुल स हू स पुरिरपुUर्ण हूS । ऐस पुरिरस्थिस्थाति मुJ तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार पुरिर *+मुति- क तिर्णया तिवेलिधसम्मु एवे उतिच हूS । अपु लथा3 पु क क स्वे कर या*ग्या हूy हूS । अg अपु ल खरिरजा कX जाए । 11. उभयापु क क श्रीवेर्ण तिकया गया और अतिभलख क सUक्ष्मुपुUवेक पुरिरश ल तिकया गया । 12. न्यायादृष्ट  Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 मुJ मु या उच्चमु न्यायालया द्वार *+मुति- क तिवेरूद्घो प्रस् अपु ल क तिरकरर्ण हू क छ न्यातियाक लिसद्घो  प्रतिपुति तिकए गए हूi जा* कस्थिण्र्डक-42 मुJ तिम्सर हूSg- “42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the promise that no innocent shall be condemned as guilty. All the safeguards and the jurisprudential values of criminal law, are intended to prevent any failure of justice. The principles which come into play while deciding an appeal from acquittal could be summarised as: (i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary; (ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge; 9 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} (iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed; (iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal; (v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts; (vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, perversity or error of law or fact in the decision of the trial court.” 13. इसमुJ क*ई स हू हूy हूS तिक या*गश गप्ता कX मुLत्या आत्मुहूत्या क स्वेरूपु कX रहू हूS । घट ति क 20/11/2013 कX हूS था मुग सUच भ उस ति जा कX गई हूS, तिक  शवे पु चमु ति क 21/11/2013 क* Sयार तिकया गया हूS । सथा हू , तिवेवेचक उपुतिर क जावेहूर लिस हू पु*~ (अ.स.-2) क कथा क असर, वेहू घटस्थाल पुर अगल ति पुहू^ च था । कलिथा ससइर्ड *ट, लिजास मुहूत्वेपुUर्ण सक्ष्या या गया हूS उसकX जाप्ता भ Uसर ति 21/11/2013 कX हूS । अg इस मुमुल मुJ तिवेचरर्ण या प्रश् याहू हूS तिक क्या या*गश उफँ तिपु टU गप्ता  अपु पुत् , श्री मु रत् गप्ता, क ष्प्ररर्ण क फँलस्वेरूपु आत्मुहूत्या कX था ? 14. In the matter of Naresh Kumar v. State of Haryana reported in (2024) 3 SCC 573, Hon’ble Supreme Court has been principally laid down the factum of abetment of suicide and held that there should be clear and reliable evidence for abetment, which shows that after abetment, there was no other option left for suicide. Hon’ble Supreme Court has held as under: 10 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} “15. Section 306 of the IPC reads as under :- “306. Abetment of suicide. If any person commits ─ suicide, whoever abets the commission of such suicide, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.” 16. Thus, the basic ingredients to constitute an offence under Section 306 of the IPC are suicidal death and abetment thereof. Abetment of a thing is defined under Section 107 IPC as under:- “107. Abetment of a thing.─A person abets the doing of a thing, who─ First. Instigates any person to do that thing; or ─ Secondly. Engages with one or more other person ─ or persons in any conspiracy for the doing of that thing, if an act or illegal omission takes place in pursuance of that conspiracy, and in order to the doing of that thing; or Thirdly. Intentionally aids, by any act or illegal ─ omission, the doing of that thing. Explanation 1. A person who by wilful ─ misrepresentation, or by wilful concealment of a material fact which he is bound to disclose, voluntarily causes or procures, or attempts to cause or procure, a thing to be done, is said to instigate the doing of that thing. Explanation 2. Whoever, either prior to or at the ─ time of the commission of an act, does anything in order to facilitate the commission of that act, and thereby facilitate the commission thereof, is said to aid the doing of that act.” 17. This Court in Geo Varghese v. State of Rajasthan, (2021) 19 SCC 144, has considered the provisions of Section 306 IPC along with the definition of abetment under Section 107 IPC observed as under:- 11 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} “14. Section 306 of IPC makes abetment of suicide a criminal offence and prescribes punishment for the same. … 15. The ordinary dictionary meaning of the word ‘instigate’ is to bring about or initiate, incite someone to do something. This Court in Ramesh Kumar v. State of Chhattisgarh (2001) 9 SCC 618, has defined the word ‘instigate’ as under:- “20. Instigation is to goad, urge forward, provoke, incite or encourage to do “an act”.” 16. The scope and ambit of Section 107 IPC and its co-relation with Section 306 IPC has been discussed repeatedly by this Court. In the case of S.S. Cheena v. Vijay Kumar Mahajan (2010) 12 SCC 190, it was observed as under:- “25. Abetment involves a mental process of instigating a person or intentionally aiding a person in doing of a thing. Without a positive act on the part of the accused to instigate or aid in committing suicide, conviction cannot be sustained. The intention of the legislature and the ratio of the cases decided by the Supreme Court is clear that in order to convict a person under Section 306 IPC there has to be a clear mens rea to commit the offence. It also requires an active act or direct act which led the deceased to commit suicide seeing no option and that act must have been intended to push the deceased into such a position that he committed suicide.” 18. This Court in M. Arjunan v. State, represented by its Inspector of Police, (2019) 3 SCC 315, while explaining the necessary ingredients of Section 306 IPC in detail, observed as under:- 12 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} “7. The essential ingredients of the offence under Section 306 I.P.C. are: (i) the abetment; (ii) the intention of the accused to aid or instigate or abet the deceased to commit suicide. The act of the accused, however, insulting the deceased by using abusive language will not, by itself, constitute the abetment of suicide. There should be evidence capable of suggesting that the accused intended by such act to instigate the deceased to commit suicide. Unless the ingredients of instigation/abetment to commit suicide are satisfied, accused cannot be convicted under Section 306 IPC.” 19. This Court in Ude Singh v. State of Haryana, (2019) 17 SCC 301, held that in order to convict an accused under Section 306 IPC, the state of mind to commit a particular crime must be visible with regard to determining the culpability. 20. This Court in Mariano Anto Bruno v. The Inspector of Police, (2023) 15 SCC 560, after referring to the abovereferred decisions rendered in context of culpability under Section 306 IPC observed as under:- “45. …...It is also to be borne in mind that in cases of alleged abetment of suicide, there must be proof of direct or indirect acts of incitement to the commission of suicide. Merely on the allegation of harassment without their being any positive action proximate to the time of occurrence on the part of the accused which led or compelled the person to commit suicide, conviction in terms of Section 306 IPC is not sustainable.” 21. This Court in Gurcharan Singh v. State of Punjab, (2020) 10 SCC 200, observed that whenever a person instigates or intentionally aids by any act or illegal omission, the doing of a thing, a person can be said to have abetted in doing that thing. To prove the offence of abetment, as specified under Section 107 IPC, the 13 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} state of mind to commit a particular crime must be visible, to determine the culpability. 22. This Court in Kashibai v. The State of Karnataka, 92023) 15 SCC 751, observed that to bring the case within the purview of ‘Abetment’ under Section 107 IPC, there has to be an evidence with regard to the instigation, conspiracy or intentional aid on the part of the accused and for the purpose proving the charge under Section 306 IPC, also there has to be an evidence with regard to the positive act on the part of the accused to instigate or aid to drive a person to commit suicide. 15. इस मुमुल मुJ स पुUर्ण सक्ष्या स याहू स्थिस्थाति स्पुष्ट हूS तिक अतिभया- रत् गप्ता क तिवेरुद्ध कथा कर वेल अपु लथा3 स *+ गप्ता (अ.स.-3), मुLक कX मु ग ग*त्र गप्ता (अ.स.-4), हू*ई रजा तिकश*र गप्ता (अ.स.-7), गन्द्र क मुर गप्ता (अ.स.-8) था रजाश गप्ता (अ.स.-10), सभ मुLक क तिकटमु रिरश्र हूi । 16. स *+ गप्ता (अ.स.-3)  अपु कथा मुJ याहू स्वे कर तिकया हूS तिक या*गश गप्ता कX मुLत्या क पुश्च भ उसकX पुत् , अतिभया- रत् गप्ता, सरकण्र्ड स्थिस्था उस मुक मुJ तिवेसर था था अतिभया- द्वार गई कलिथा प्रड़ा अथावे धमुकX क स  ध मुJ उन्हूd पुलिलस मुJ क*ई तिशकया जा हूy करई था । उस याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक मुLक कX रहूवेy क अवेसर पुर समुलिजाक Sठेक आया*लिजा हू^ई था , लिजासमुJ मुLक कX सम्पुलित्ती उसकX पुत्र च चल एवे पुत् , अथाk अतिभया- रत् गप्ता, क* तिए जा क तिर्णया लिलया गया था । उस याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक रहूवेy क पुश्च भ उसकX मु था हूJ सरकण्र्ड स्थिस्था उस मुक मुJ हू तिवेसर रहूy । 17. मुLक कX मु ग ग*त्र गप्ता (अ.स.-4)  अपु कथा मुJ याहू स्वे कर तिकया हूS तिक घट वेल ति सहू अतिभया- रत् गप्ता जार गई था था उसक सथा उसकX पुत्र च चल 14 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} गप्ता भ जार गई था । इस प्रकर, घट क ठे क पुUवे अतिभया- द्वार मुLक क* क और तिकस प्रकर प्रतिड़ा तिकया गया था, इस स  ध मुJ क*ई स्पुष्ट सक्ष्या उपुलब्ध हूy हूS । ग ग*त्र गप्ता (अ.स.-4)  याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक घट क पुश्च मुLक कX पुत्र च चल गप्ता कX अतिभर प्रप्ता कर हू उसकX ड़ा पुत्र , जा* उड़ा स मुJ तिवेस कर हूS, द्वार उत्तीरलिधकर स  ध कयावेहू कX गई हूS । उस याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक घट क पुUवे गमु3 क तिd मुJ मुLक क पुट  स  ध उपुचर तिलसपुर स्थिस्था अपु*ल* अस्पुल मुJ चल था था उपुचर कर क लिलए वेहू अपु पुत् रत् गप्ता क सथा अपु ड़ा हू, जा* उड़ा स मुJ रहू हूS, क याहू भ गया था । ग ग*त्र गप्ता (अ.स.-4)  याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक मुLक कX रहूवेy क अवेसर पुर पु चd कX Sठेक आया*लिजा हू^ई था । उस याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक कलिथा प्रड़ा अथावे धमुकX क स  ध मुJ उन्हूd कभ क*ई तिशकया हूy कX था । 18. हू*ई रजा तिकश*र गप्ता (अ.स.-7)  अपु कथा मुJ याहू स्वे कर तिकया हूS तिक अतिभया- रत् गप्ता क अन्या व्याति-याd स स  ध हू* स  ध थ्या उसक पुलिलस कथा प्रश र्ड -3 मुJ उxलिख हूy हूS । अन्या हू*ई गन्द्र क मुर गप्ता (अ.स.-9)  याहू स्वे कर तिकया हूS तिक कलिथा प्रड़ा अथावे धमुकX क स  ध मुJ उन्हूd क*ई तिशकया जा हूy करई था । पुश स अलिधवे- रजाश गप्ता (अ.स.-10)  भ याहू स्वे कर तिकया हूS तिक अतिभया- क ष्प्ररर्ण क करर्ण या*गश गप्ता द्वार आत्मुहूत्या तिकए जा क स  ध मुJ उन्हूd पुलिलस मुJ क*ई तिशकया जा हूy करई था । इस प्रकर, कलिथा घट क पुUवे लगभग 08 वे+v क अतिभया- और मुLक क मुध्या पुति-पुत् क स  ध रहू क Nर उक  च तिकस प्रकर क तिवेवे उत्पुन्न हू^आ हू*, ऐस क*ई स्पुष्ट थ्या सक्ष्या मुJ पुरिरलति हूy हू* हूS । 15 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} 19. घट ति क 20/11/2013 कX हूS । शवे क पु चमु अगल ति, अथाk ति क 21/11/2013 क* Sयार तिकया गया हूS । कलिथा ससइर्ड *ट कX जाप्ता भ ति क 21/11/2013 कX हू ई गई हूS, तिक  वेहू मुLक कX जा स जाप्ता तिकया गया था अथावे उसक मुक क तिकस स्था स रमु तिकया गया था, इस स  ध मुJ जाप्ता पुत्रक प्रश पु - 9 मुJ क*ई स्पुष्ट उxख हूy हूS । अतिभलख मुJ प्रश्ध  स्वेजा क्रमु क-1 एवे 2 क* ससइर्ड *ट कX मुUल प्रति हू* शया गया हूS, तिक  सक्ष्या मुJ उसकX क प्रति हू* कX  भ समु आई हूS । थातिपु, उ- क प्रति कX क*ई पुLथाक जाप्ता अतिभलख पुर उपुलब्ध हूy हूS । तिवेवेचक उपुतिर क जावेहूर लिस हू पु*~ (अ.स.-2)  अपु कथा मुJ याहू स्वे कर तिकया हूS तिक जाप्ता पुत्रक प्रश पु -9 मुJ ऐस क*ई उxख हूy हूS तिक ससइर्ड *ट मुLक कX जा स रमु तिकया गया हू* । उस याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक उसक द्वार तिकस क अथावे पु कX जाप्ता हूy कX गई हूS । तिवेवेचक  याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक इस स  ध मुJ क*ई जा च हूy कX गई तिक अतिभया- रत् गप्ता क अन्या पुरु+d क सथा अवेSध अथावे अSतिक स  ध था अथावे हूy । उस याहू भ स्वे कर तिकया हूS तिक मुग कयामु तिकए जा क पुश्च जा च उपुर  23 ति  प्रथामु सUच पुत्र जा कX गई था । 20. अन्या तिवेवेचक क रूपु मुJ उपुतिर क प्रभकर तिवेर (अ.स.-8) द्वार कtल तिर्डटल्स रिरपु*ट, प्रश पु -13 स प्रश पु -34 क, प्रस् कX गई हूS, तिक  वेहू भर या सक्ष्या अलिधतियामु क प्रवेधd क अरूपु तिवेलिधवे प्रमुतिर्ण हूy हूS था उसक स  ध मुJ आवेश्याक प्रमुर्णपुत्र भ प्रस् हूy तिकया गया हूS । अतिभया- स तिकस मु*इल फँ* कX जाप्ता तिकया जा भ अतिभलख पुर प्रतिश हूy हूS था वेहू तिकस मु*इल  र अथावे उपुकरर्ण क उपुया*ग कर था , याहू भ स्पुष्ट हूy हू* सक हूS । इस प्रकर, हूस्लिलतिपु तिवेश+ज्ञ द्वार भ तिस्थिश्च एवे स्पुष्ट प्रकL ति क अतिभमु व्या- हूy तिकया गया हूS । 16 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} 21. A. No.-169 of 2015} 21. अपु लथा3 क तिवेद्वा अलिधवे- द्वार अमुर था चN (उपुर*-) था एर्डक्कण्र्ड तिश उफँ पु . तिश (उपुर*-) मुJ प्रतिपुति तिवेलिध लिसद्ध d क अवेल  लिलया गया हूS । अतिभलख क पुरिरश ल स स्पुष्ट हूS तिक अमुर था चN (उपुर*-) क प्रकरर्ण मुJ मु या उच्चमु न्यायालया द्वार अग्रर तिवेवेच क प्रश् पुर तिवेचर तिकया गया था, जातिक तिवेचरध  प्रकरर्ण मुJ  क वेल तिवेवेच पुUर्ण कर अतिभया*ग-पुत्र प्रस् तिकया जा चक हूS, स्थिल्क तिवेचरर्ण उपुर  अतिभया- क पु मुJ *+मुति- क तिर्णया भ पुरिर हू* चक हूS । ऐस पुरिरस्थिस्थाति मुJ उ- न्यायादृष्ट  क थ्या वेमु प्रकरर्ण स तिभन्न हू* क करर्ण उसक क*ई समुथा अपु लथा3 पु क* प्रप्ता हूy हू* हूS । 22. इस प्रकर, एर्डक्कण्र्ड तिश उफँ पु . तिश (उपुर*-) क प्रकरर्ण मुJ मु या उच्चमु न्यायालया द्वार याहू प्रतिपुति तिकया गया हूS तिक मुत्र तिवेवेच अलिधकर कX त्रतिट अथावे लपुरवेहू क आधर पुर अतिभया*जा क मुमुल क* अस्वे कर हूy तिकया जा सक था उपुलब्ध सक्ष्या क स्वे त्र रूपु स पुर र्ण तिकया जा आवेश्याक हूS । तिक  तिवेचरध  प्रकरर्ण मुJ क वेल तिवेवेच स  ध कतिमुया हू हूy पुई गई हूi, स्थिल्क अतिभया*जा क स पुUर्ण मुNलिखक एवे स्वेजा सक्ष्या मुJ भ अक मुहूत्वेपुUर्ण तिवेस गतिया , अभवे एवे स हूस्पु पुरिरस्थिस्थातिया पुरिरलति हू* हूi, लिजाक आधर पुर अतिभया- क तिवेरुद्ध *+लिसतिद्ध क तिष्क+ अतिभलिललिख कर हू पुयाप्ता, स्पुष्ट एवे तिवेश्वेस या सक्ष्या क अभवे हूS । अg उ- न्यायादृष्ट  क लभ भ अपु लथा3 पु क* प्रप्ता हूy हू* हूS । 23. इस प्रकर, तिवेलिधक प्रवेध, न्यायादृष्ट  था सक्ष्या कX तिवेवेच क फँलस्वेरूपु याहू न्यायालया पु हूS तिक अतिभलख मुJ उपुलब्ध, थ्या और सक्ष्या क* दृतिष्टग रख हू^ए तिवेचरर्ण न्यायालया द्वार जा* *+मुति- क तिर्णया पुरिर तिकया हूS उसमुJ क*ई अवेSध या अशद्घो हूy हूS । इसलिलए उसमुJ तिकस हूस्पु कX आवेश्याक हूy पुया जा । 17 / 17 {Acq. A. No.-169 of 2015} 24. अg *+मुति- क तिवेरूद्घो प्रस् याहू अपु ल स्वे कर या*ग्या  हू* स खरिरजा कX जा हूS । 25. तिर्णया कX प्रतिलिलतिपु क सथा तिवेचरर्ण न्यायालया क* अतिभलख श घ्रपुUवेक वेपुस प्रति+ हू* । सहू /- (स जाया क मुर जायासवेल) न्यायाध श पु*मु