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मुिण लय रणिे र् ले द्र् र घोषण -4 [(1)] भ रत में कोई ऐि व् यष्त त पुस् तकों य प्ों के मुिण के सल ए अपिे कब् जे में कोई मुिण लय िहीं रणेग , ष्ज ििे 5 [ष्ज ल , प्रेसि ेंिीे य उप-ण् मष्ज स् ेे.] के िमक्ष, ष्ज िकी स् ा िीेय अधि क रर त में ऐि मुिण लय है, नि मम िसल णण त घोषण िहीं की है ता उि पर हस् त क्षर िहीं कक ए है :- “ मैं, क.ण, घोिष त करत ह.ं कक मेरे प ि....................................में मुिण के सल ए मुिण लय है ” । और उपरोत त रर त त स् ा ि में, ऐि मुिण लय जह ं ष्स् ा त है उि स् ा ि के ब रे में िही और . क . क िर् र्रण भर ज एग । 6 [(2) ष्ज तिीे ब र ,र्ह स् ा ि , जह ं मुिण लय रण गय है, परर र्नतवत कक य ज त है, उतिीे ब र िई घोषण आर्श यक होगीे : परन तु जह ं ऐि परर र्तवि ि . द्रद ि िे अधि क की अर्धि के सल ए िहीं है और परर र्तवि के पश चन तम मुिण लय उपि र (1) में नि द्रदव ष् . मष्ज स् ेे. की स् ा िीेय अधि क रर त में रहत है र्ह ं िई घोषण की आर्श यकत िहीं होगीे , यद्रद - क परर र्तवि िे िम् बष्न ि त िर् र्रण परर र्तवि के चनौबीेि घं.े के भीेतर दे द्रद य ज त है : और (ण) मुिण लय रणिे र् ल व् यष्त त र्हीं रहत है । ]