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िस्ट्तावेिों का पृ ांकि, िकि, अिुवाि या रजिस्ट्रीकरण िजत पहुंचािे के आशय से अशुद्धतः करिे के जिए शाजस्ट्त—इस अजिजियम के अिीि जियु त हर रजिस्ट्रीकताण आदिसर और इस अजिजियम के प्रयोििों के जिए उसके कायाणिय में जियु त हर व्यज त, िो इसके उपबधिों के अिीि उपस्ट्थाजपत या जिजिप् त दकसी िस्ट्तावेि के पृ ांकि, िकि, अिुवाि या रजिस्ट्रीकरण का भारसािि करते हुए ऐसी िस्ट्तावेिों को ऐसी रीजत से, जिसे वह िािता है या जव वास करता है दक वह अशुद्ध है, उस आशय से दक ति द्वारा या यह िािते हुए दक यह संभाव्य है दक वह ति द्वारा दकसी व्यज त को भारतीय िण्ि संजहता (1860 का 45) में यथापररभाजषत िजत पहुंचाएगा, पृ ांदकत करेगा, िकि करेगा, अिूदित करेगा या रजिस्ट्रीकृत करेगा, कारावास से, जिसकी अवजि सात वषण तक की हो सकेगी, या िुमाणिे से, या िोिें से, िण्ििीय होगा ।